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जीवंधर स्वामी चरित्र - नाटक

Characters:

All Scenes:

  1. राजा श्रेणिक
  2. राजा श्रेणिक का अंतर्मन

Scene 1:

  1. राजा सत्यंधर (जीवंधर स्वामी के वास्तविक पिता)
  2. रानी विजया (जीवंधर स्वामी की वास्तविक माता)
  3. धाय
  4. द्वारपाल
  5. गन्धोत्कट सेठ
  6. सुनंदा सेठानी

Scene 2:

  1. आर्यनंदी गुरु
  2. जीवंधर स्वामी

Scene 3:

  1. जीवंधर स्वामी

Scene 4:

  1. रानी विजया
  2. सेठानी सुनंदा
  3. जीवंधर स्वामी

Scene 5:

  1. जीवंधर स्वामी
  2. राजा पवनवेग
  3. राजकुमार यशोधर

Written by: सोहम शाह, वस्त्रापुर मुमुक्षु मंडल

Reference: क्षत्रचूड़ामणि ग्रन्थ

Scene 1: जीवंधर स्वामी का जन्म

[ वर्तमान शासननायक भगवान महावीर का भव्य समवसरण जब राजगृही नगरी में विपुलाचल पर्वत पर आया, उस समय समवसरण के मुख्य श्रोता - राजा श्रेणिक ने भगवान से ६० हजार प्रश्न पूछे थे। उनमे से एक प्रश्न इस युग के २४वे अंतिम कामदेव - जीवंधर स्वामी के चरित्र के सम्बन्धी भी था। वह चरित्र का श्रवण करके राजा श्रेणिक ने कैसे तत्वचिंतन किया होगा? उनके ह्रदय के क्या उदगार रहे होंगे? उसे प्रस्तुत करते हुए - चलिए शुरू करते हैं - आचार्य वादीभसिंह सूरी द्वारा रचित क्षत्रचूड़ामणि ग्रन्थ पर आधारित “जीवंधर स्वामी चरित्र” ]

राजा श्रेणिक: अहा! भरतक्षेत्र को भूषित करती हुई हेमांगद देश की यह राजपुरी नगरी कितनी सुन्दर हैं! इस दैवी नगरी के धर्मानुरागी राजा सत्यंधर और रानी विजया इसकी शोभा और बढ़ा रहे हैं। पर कैसा हैं यह पुण्य का जाल? जिसमे इतने समर्थ राजा सत्यंधर भी फस गए? रानी के साथ भोगविलास में डूबे राजा को न प्रजा का कोई विचार रहता और न ही उनके शत्रुओ का!

राजा श्रेणिक का अंतर्मन: यहाँ नीति तो यह कहती हैं कि विषयासक्त पुरुषों के कौनसे गुण नष्ट नहीं होते? भोगी पुरुष न तो स्वयं की दीनता से डरता हैं और न ही उसे निंदा तिरस्कार से कोई असर होता हैं। और क्या कहे! कामबाण से विध्वंसित जीव भोजन, दान, विवेक तो क्या अपने जीवन को भी छोड़ देते हैं!

राजा श्रेणिक: राजा सत्यंधर मोह में इतने तो कैसे अंध हो गए कि उन्होंने अपना अपना राज्य अपने काष्ठांगार नाम के मंत्री को दे दिया? अन्य मंत्रिओं ने उन्हें बहुत समझाया पर फिर भी बिना सोचे समझे कैसे दे दिया?

राजा श्रेणिक का अंतर्मन: जो होना हैं सो निश्चित ही हैं - यहाँ नीति तो यह कहती हैं कि बुद्धि भी जैसी होनहार हो वैसा ही प्रवर्तन करती हैं!

[ रानी विजय ने रात्रि में ३ स्वप्न देखे ]

रानी विजया: ये स्वामी! मैंने कल रात्रि में तीन स्वप्न देखे -

१. एक अशोक वृक्ष जो पहले दिखा और फिर अदृश्य हो गया

२. मुकुट सहित छोटा अशोक वृक्ष

३. ८ मालाएं

मेरा मन इनके फल जानने को अति उत्सुक हैं। कृपा करके इनका फल बताइये!

राजा सत्यंधर: हे प्रियतमा! मुकुट सहित छोटा अशोक वृक्ष हमारे पुण्यशाली पुत्र का सूचक हैं। और… ८ मालाएं उस पुत्र की आठ रानी होंगी यह बताता हैं।

रानी विजया: और वह अशोक वृक्ष जो पहले दिखा था और फिर अदृश्य हो गया? उस स्वप्न का फल क्या हैं?

[राजा सत्यंधर का कोई उत्तर नहीं देना ]

रानी विजया: हे प्राणनाथ! आपने इसका फल क्यों नहीं बताया? मेरा ह्रदय बहुत घबरा रहा हैं।

क्या उसका फल आपकी मृ… नहीं! (चीखना)

[ रानी का बेहोश हो जाना ]

राजा सत्यंधर: हे देवी! सिर्फ एक स्वप्न देखने से क्यों तुम मुझे तत्काल मरा हुआ समझ रही हो?

राजा श्रेणिक: विपत्ति आने पर अज्ञानी जीव शोक मनाने लगता हैं!

राजा श्रेणिक का अंतर्मन: यहाँ नीति तो यह कहती हैं कि - क्या कोई गर्मी के क्लेश को शांत करने के लिए अग्नि में गिरता हैं भला? विपत्ति दूर करने के लिए शोक असमर्थ हैं! आपत्ति के नाश का उपाय धर्म ही हैं - क्योंकि दीपक से प्रकाशित देश में अन्धकार की स्थिति नहीं होती!

राजा श्रेणिक: हाँ, और कुछ ही समय में जब राजा ने रानी को गर्भवती जाना तो उसे निश्चित हो गया के उसका मरण अब निकट हैं।

राजा श्रेणिक का अंतर्मन: मरण अचानक ही आवेगा। जो नरभव को भोगों में ही गँवाया होगा तो अंत में घोर पश्चाताप होना ही हैं।

[ राजा सत्यंधर उनके आसान पर बैठे थे तब द्वारपाल आता हैं ]

द्वारपाल: हे राजपुरी के स्वामी! आपके ही विश्वासु मंत्री काष्ठांगार ने आपके विरुद्ध षड्यंत्र रचा हैं! उसने अपनी कुटिलता से लगता हैं सारे मंत्रीगण को अपने वश कर लिया हैं! आपको मारने के लिए आपकी ही सेना को आप ही के विरुद्ध भड़काया हैं!

राजा सत्यंधर:  युद्ध की तैयारी करो! इस दुष्ट का मेरे हाथो ही मरना लिखा हैं!

[ रानी विजया मूर्छित हो जाती हैं ]

रानी विजया: क्या आपको वह अशुभ स्वप्न के फल का स्मरण नहीं हैं? आप युद्ध के लिए नहीं जायेंगे। नहीं जायेंगे मतलब नहीं जायेंगे!

राजा सत्यंधर: हे प्राणप्रिये विजया! अब शोक मत करो, यह तुम्हे शोभा नहीं देता। पुण्यहीन मनुष्य का पापोदय उसे फल नहीं देगा? क्या दीपक बुझ जाने पर अन्धकार निमंत्रण की अपेक्षा कहाँ रखता हैं?

राजा श्रेणिक: अरे! कहाँ पूर्व के भोगो का आनंद और कहाँ भावी दुःखों का भय! जिसे मित्र माना वही शत्रु बन गया! यह संसार की कैसी विचित्रता हैं?

राजा श्रेणिक का अंतर्मन: हे आत्मन! जिसका संयोग हैं उसका वियोग निश्चित ही हैं। इस संसार में संयोग बहुत हैं पर साथी कोई नहीं हैं। जैसे पानी के बुलबुले का ठहरना आश्चर्य हैं, वैसे ही यौवन शरीर और धन का ठहरना आश्चर्य ही तो हैं! वास्तव में - त्रिकाली ध्रुव भगवान आत्मा का आश्रय लेना ही समस्त धर्म का सार हैं।

राजा सत्यंधर: हे देवी! तुम निश्चिंत हो जाओ। अब तुम्हे किसी दुष्ट से डरने की जरूरत नहीं हैं। इस केकी यंत्र में बैठ जाओ। यह यंत्र तुम्हे आकाशमार्ग से किसी अन्य कुशल देश में पहुँचा देगा। इस पापी काष्ठांगार और उसकी सेना के लिए मैं अकेला ही काफी हूँ!

[ यह कहकर राजा सत्यंधर युद्ध के लिए निकल पड़ते हैं ]

राजा सत्यंधर (युद्धभूमि में चिंतन करते हुए): अहा! मैं मोहवश युद्ध करने निकल तो पड़ा, पर मैं अकेला कैसे पूरी सेना से जीत सकूंगा? व्यर्थ ही इन मनुष्यों की हिंसा करने से क्या लाभ?

मैंने निरंतर पंचेन्द्रियों के वश होकर घनेरे भोग भोगे हैं, फिर भी तृप्ति कहाँ हुई? इन पापो का फल मेरे सामने आज प्रत्यक्ष दिख रहा हैं! ऐसे राज्य आदि भोग तो मैंने पंच परावर्तनरुपी संसार में अनंतो बार भोगकर छोड़े हैं। बहुत हुआ ये मोह का राज्य! निज साम्राज्य प्राप्त करने हेतु मैं मोह की सेना को समूल नाश करूँगा! सर्व परिग्रह के पोट उतार को कर, मैं सर्वकल्याणकारी सर्वोत्कृष्ट निर्ग्रन्थ दिगम्बर दीक्षा धारण करता हूँ। अब मैं निर्दोष समाधिमरण ग्रहण करता हूँ।

राजा श्रेणिक: धन्य हैं राजा सत्यंधर जिन्होंने मोक्षमार्ग में प्रस्थान किया! धन्य हैं यह जीव जिसने शरीर उसे छोड़े उससे पहले शरीर को छोड़ दिया! धन्य हैं यह समाधिमरण जो यमराज को भी ललकारने में समर्थ हैं! धन्य हैं यह सल्लेखना जिसके प्रभाव से उन्हें देवगति की प्राप्ति हुई और अलप काल में मोक्षसुख को भोगेंगे!

राजा श्रेणिक का अंतर्मन: यहाँ नीति तो यह कहती हैं कि - जैसी गति वैसी मति होती हैं। नहीं तो क्या किसीने सोचा था के इस भयानक युद्धभूमि में जहाँ चारो ओर दुश्मनो का वार हो और मृत्यु का साया हो; वहाँ जीव दुर्लभ रत्नत्रय की आराधना करेगा? निश्चय से - पूर्व पर्याय का वर्तमान पर्याय में अभाव ही होता हैं।

[ रानी विजया के यंत्र का स्मशान में गिर जाना ]

रानी विजया: हाय हाय! यह यंत्र कुछ काम नहीं आया। मेरे तो भाग्य ही फूट गए हैं! मेरे स्वामी! आप कहाँ हो? मुझे अकेला छोड़कर आप कहाँ चले गए? (दर्द दर्शाते हुए)

[पर्दा होता हैं और जीवंधर स्वामी का जन्म का दृश्य ]

[ रानी विजया बालक को निहारते हुए पर वह इस अवस्था के कारण दुखी भी थी ]

राजा श्रेणिक: तद्भव मोक्षगामी जीव का जन्म इतनी असहाय हालत में? स्मशान जैसी अपवित्र जगह में?

राजा श्रेणिक का अंतर्मन: अरे! इस स्मशान में यह जीव मानो जन्म-मृत्यु का ही अग्निसंस्कार करने के लिए जन्मा हो - ऐसा लगता हैं! वास्तव में देखा जाए तो जन्म के स्थान का मोक्ष प्राप्ति से क्या सम्बन्ध हैं?

[ देवी के रूप में धाय वहां आती हैं और बालक को देखती हैं ]

धाय: हे माँ! आप बिलकुल निश्चिंत हो जाइये। इस बालक का भविष्य उज्जवल हैं। यह बालक महापराक्रमी होगा। इसका लालन पालन क्षत्रिय के पुत्रो के जैसे ही होगा। ये बालक क्षत्रियों के कुल में सर्वश्रेष्ठ होगा!

[ रानी विजय का मन शांत होना ]

[ उतने में गन्धोत्कट सेठ (एक मृत बालक के साथ) को आते देखना और रानी विजया का बालक को राजमुद्रा पहनकर छिप जाना ]

गन्धोत्कट सेठ: कितना सुन्दर बालक हैं यह! अवधिज्ञानी मुनिराज की बात सत्य थी! इस स्मशान में मुझे एक जीवित पुत्र मिलेगा! और इसके लक्षण देखकर तो राजपुत्र प्रतीत हो रहा हैं। आनंद भयो - आनंद भयो!

[ पुत्र को उठाते हुए ]

गन्धोत्कट सेठ: अभी तक मेरे कितने ही पुत्र का जन्म हुआ पर दुर्भाग्यवश एक भी जीवित नहीं रहा। मुनिराज के वचन अनुसार जो बालक मुझे स्मशान में मिलेगा; उसके बाद मेरे घर जो भी बालक जन्मेंगे वे सभी जीवेंगे।

इस बालक का नाम “जीवंधर” होगा - क्योंकि यह मेरे भविष्य में होनेवाले बच्चो के जीवित रहने में निमित्त जो होगा ! चिरंगजीवी भव!

[ अपने घर पहुंचकर ]

गन्धोत्कट सेठ: अपने जीवित बालक को तुमने अज्ञान से मरा हुआ कैसे कह दिया? ये लो! सम्हालो अपने पुत्ररत्न को!

सेठानी सुनंदा: हे स्वामी! हे नाथ! आज मेरे आनंद का कोई पार नहीं हैं! पुत्र तो सहज ही प्राणो की तरह प्रीति का कारण होता हैं, फिर तो पुत्र मरकर पुनः जीवित हो जाए तो उसका कहना ही क्या?

(end of Scene 1)

Scene 2: जीवंधर स्वामी और उनके गुरु आर्यनन्दी का समागम

राजा श्रेणिक: राजपुत्र जीवंधर, सेठ गन्धोत्कट और सेठानी सुनंदा के प्रेम की छत्र-छाया में निर्दोष चंद्रमाँ की भाँती बढ़ते गए। जगत में कहते भी हैं - “पूत के पाँव पालने में”, वैसे ही बालक जीवंधर की बालक्रीड़ा, शरीर की कान्ति आदि लक्षण उनके उज्जवल भविष्य को दर्शा रही थी। समय के साथ जब बालक जीवंधर विद्याप्राप्त करने योग्य हो गए तब उनको आर्यनन्दी गुरु का समागम होता हैं और शिक्षा प्रारम्भ होती हैं।

राजा श्रेणिक का अंतर्मन: यहाँ नीति तो यह कहती हैं कि - विद्या विनयसम्पन्न शिष्य को ही प्राप्त होती हैं, ऐसा विश्व का नियम हैं। जिस तरह कोई भूली हुई वस्तु याद आ जाती हैं इसी तरह गुरु की सेवा सुश्रुषा से जीवंधरकुमार को सर्व विद्याए सुगमता से प्राप्त हो गयी।

[ आर्यनन्दी गुरु और जीवंधर स्वामी का गुरु-शिष्य का दृश्य ]

आर्यनंदी गुरु: हे भव्य! आज हम अतिशय आनंदित और उल्लासित हैं। तुमने अपने आत्मज्ञान, विवेक और शील से सर्व शिक्षा ग्रहण कर ली हैं, अद्वितीय विद्वत्ता को प्राप्त किया हैं। क्षयोपशम ज्ञान आत्मज्ञान के बिना शून्य हैं, इसलिए निरंतर आत्मा की आराधना करो और मोक्षलक्ष्मी को शीघ्र ही वरो।

जीवंधर स्वामी: [नमन करते हुए] मेरे जीवन का प्रकाशपुंज हो आप! आप पथदर्शक हो, टोकनहार हो, आप मेरे जीवन के शिल्पी हो गुरुवर! मैं आपका उपकार किन शब्दों में व्यक्त करुँ?

आर्यनंदी गुरु: हे शास्त्रविशारद महाभाग्य जीवंधर! मैं इस समय तुम्हे किसी प्रसिद्ध पुरुष का चरित्र सुनाता हूँ, उसे ध्यान से सुनो।

[ कहानी सुनाते हुए ]

विद्याधरों की नगरी में एक लोकपाल नामक राजा न्यायपूर्वक प्रजा का पालन करता हुआ अपना समय बिता रहा था। उपादान जागृत होने पर किसी निमित्त से उस राजा को ह्रदय में वैराग्य जागृत हो गया और उन्होंने दिगम्बर दीक्षा धारण की। पूर्वकर्म के उदय से वह मुनिराज को भस्मक नामक महारोग उत्पन्न हुआ। जो भी खाये वह क्षण मात्र में भस्म हो जाता था!  शक्तिहीनपने की वजह से उन्हें मुनिदीक्षा का त्याग करना पड़ा।

राजा श्रेणिक: धन्य मुनिराज को भी ऐसे दुःख? ऐसी भयंकर पीड़ा? कर्म किसीके सगे नहीं होते!

राजा श्रेणिक का अंतर्मन: मुनिराज शरीर को में अपनत्व नहीं हैं इसलिए उन्हें ये शरीर के दुःख दुःख अनुभव नहीं होते। यहाँ नीति तो यह कहती हैं कि - आत्मकल्याणकारक कार्यो में विघ्न बहुत आते हैं।

जीवंधर स्वामी: हे गुरुदेव! फिर उस राजा की क्या दशा हुई?

आर्यनंदी गुरु: वह स्वछन्दी होकर तप के बहाने पाखंड तप करने लगा। इच्छा अनुसार इधर उधर घूमने लगा। वह भिक्षुक भूख से पीड़ित होते हुए गन्धोत्कट सेठ के घर अर्थात तुम्हारे घर पंहुचा। तुमने उस भिक्षुक को देखकर उसकी भूख को जान लिया। रसोईघर का सभी भोजन ग्रहण करने पर भी भिक्षुक की भूख शांत नहीं हुई। फिर तुमने अत्यंत दया से अपने हाथों का ग्रास उस भिक्षुक को दिया। भिक्षुक के उस ग्रास को सिर्फ चखने मात्र से ही सारी भूख शांत हो गयी!

जीवंधर स्वामी: पुण्योदय की कैसी विचित्र सामर्थ्य हैं!

आर्यनंदी गुरु: बहुत लम्बे काल पश्चात निरोगता प्राप्त करने पर वह सोचने लगा के इस महाउपकारी का मैं उपकार कैसे करुँ? फिर उस भिक्षुक ने यह निश्चय किया के मुझे इस बालक को सर्वोत्कृष्ट देनेवाले ज्ञान का ही दान देना चाहिए! उन्होंने फिर तुम्हे पढ़ा लिखाकर सर्वोत्कृष्ट विद्वान बनाने का निर्णय किया। उन्होंने अनेक वर्षो तक विद्या प्रदान की और आज उनका वह कार्य संपन्न हुआ, आज तुम्हारी शिक्षा पूर्ण होती हैं!

[ जीवंधर स्वामी गंभीर और मौन बने रहे - न बोलकर ही उनकी विशेषता व्यक्त की - प्रसन्न हावभाव व्यक्त किये और फिर धीरे से नमन किया - अश्रुधारा ]

राजा श्रेणिक: ओहो! कैसा अद्भुत था यह गुरु-शिष्य का समागम? निश्चय से ज्ञान दान ही सबसे उत्तम दान हैं। पूर्व में भस्मक रोग से पीड़ित होने के कारण आर्यनन्दी गुरु को जिनदीक्षा का त्याग करना पड़ा था। जीवंधर स्वामी की शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात गुरु आर्यनन्दी पुनः दिगम्बर जैनेश्वरी दीक्षा धारण करके उत्कृष्ट मोक्ष पद की प्राप्त करते हैं।

राजा श्रेणिक का अंतर्मन: यहाँ नीति तो यह कहती हैं कि - विद्वत्ता नियम से मोक्ष का कारण हैं! धन्य हैं आर्यनन्दी मुनिराज! धन्य हैं हमारे नग्न दिगम्बर संत!

( end of Scene 2 )

Scene 3: जीवंधर स्वामी का श्वान को सम्बोधन

राजा श्रेणिक: एक बार किसी कुत्ते द्वारा किसी हवन की सामग्री जूठी कर देने पर हवन करने वालों ने उस कुत्ते को मार मार के अधमरा कर दिया। इतना कठोर और निर्दय कोई मनुष्य कैसे हो सकता हैं?

राजा श्रेणिक का अंतर्मन: यहाँ नीति तो यह कहती हैं कि - धर्म से विमुख इन निर्दयी जीवो की दशा वास्तव में दयनीय हैं। धर्म का स्वरुप न जानने के कारण जीव विवेकहीन होकर अनेक प्रकार के खोटे काम करता हैं।

[ जीवंधर स्वामी कुत्ते के पास बैठे होते हैं और उसे सम्बोधन देते हैं ]

जीवंधर स्वामी: हे आत्मन! हे चेतन! मोह निद्रा से जागो और सम्यज्ञानरुपी सूर्य का अवलोकन करो! हे भगवान आत्मा! तुम सिद्ध समान हो, शुद्ध बुद्ध चैतन्य आनंद घन परमात्मा हो! तुमने आजतक हड्डी में से स्वाद आता हैं ऐसा माना पर वास्तव में वह तुम्हारे ही खून का स्वाद था। वैसे ही हे जीव! तुमने अनादि से विषयों में से आनंद मिलता हैं ऐसा माना - पर वास्तव में तुम्हे उन विषयों का केवल ज्ञान ही हो रहा था। उस ज्ञान के स्वाद को तुमने विषयों का स्वाद समझ लिया।

मैं श्वान हूँ, मैं पीड़ित हूँ, मैं निर्बल हूँ - ऐसी मिथ्यामान्यता को त्यागो, क्योंकि तुम तो अमूर्तिक हो, सुखमय हो, स्वभाव से निर्विकारी हैं!

काल अनादि भयो जग भ्रमते, सदा कुमरणहिं कीनो।

एक बार हू सम्यक् युत मैं, निज आतम नहिं चीनो॥

जो निज पर को ज्ञान होय तो, मरण समय दुख काई।

देह विनाशी मैं निजभासी, ज्योति स्वरूप सदाई॥

यह तन जीर्ण कुटीसम आतम! यातैं प्रीति न कीजै।

नूतन महल मिलै जब भाई, तब यामें क्या छीजै॥

मृत्यु भये से हानि कौन है, याको भय मत लावो।

समता से जो देह तजोगे, तो शुभतन तुम पावो॥

हे त्रिकाली ध्रुव! शरीर का वियोग होने से तुम अपना नाश मत मानना। तुम तो अजर अमर वस्तु हो न? अपने निज शाश्वत ज्ञायक भगवान आत्मा की दृष्टि करो! उसमे ही रूचि करो! हे प्रसिद्ध ज्ञानादि गुण के धारक! सर्व संकल्प विकल्प को त्यागो और निर्विकल्प समाधि को प्राप्त करने का पुरुषार्थ करो!

समता रस का पान करो, अनुभव रस का पान करो।

शांत रहो शांत रहो, सहज सदा ही शांत रहो।।

[ णमोकार मन्त्र का ३ बार शांति से उच्चारण करना ]

राजा श्रेणिक: णमोकार महामन्त्र के प्रभाव से समाधिमरण करके वह कुत्ते का जीव यक्षेन्द्र हुआ। वह यक्षेन्द्र ने जीवंधर स्वामी का उपकार चुकाने के लिए उनके जीवन में अनेक प्रकार से रक्षा भी की।

राजा श्रेणिक का अंतर्मन: यहाँ नीति तो यह कहती हैं कि - निश्चय से यह णमोकार महामंत्र मोक्षमार्ग पर चलने वाले पथिकों के लिए पाथेय अर्थात भोजन सामान हैं।

(end of scene 3)

Scene 4: जीवंधर स्वामी का उनकी दोनों माताओं के साथ कुछ चर्चा

[ गुरु आर्यनन्दी के निमित्त से जीवंधर स्वामी को अपने राजपुत्र होने का ज्ञान हो गया था। पर उसे अपने माता पिता कौन हैं इसका ज्ञान नहीं था। वर्षो बाद जीवंधर स्वामी को उनके मित्रो की मदद से उनकी सच्ची माता रानी विजय का समागम हो जाता हैं। जीवंधर स्वामी ने अपनी असीम बल, चतुराई और शूरवीरता से दुष्ट काष्ठांगार को परास्त करके अपना राज्य वापिस जीत लिया। इसके पश्चात वह अपनी ८ रानिओ के साथ सुखपूर्वक राज्य कर रहे थे। ]

रानी विजया: हे पुत्र! आज मेरा चित्त वैराग्य रस से पवित्र हो रहा हैं। अंतर में आत्मा के आनंद को भोगने का पुरुषार्थ उछल रहा हैं!

जीवंधर स्वामी: हे पूज्यनीय माता! यह तो उत्तम भाव हैं। मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हु?

रानी विजया: बेटा! हमने इस जीवन में जीते जी अपने सर्वोत्तम और इकलौते पुत्र को अपने पिता का राज्य प्राप्त कर राज्याधिकारी के रूप में देख लिया हैं। और क्या चाह बाकी हो सकती हैं? मैं सर्व प्रकार से निशल्य हो गयी हूँ। अब मुझे बस अपने आत्मा की आराधना करनी हैं।

जीवंधर स्वामी: हे माते! अब आप सारे विकल्प छोड़ दो! धर्म की सब व्यवस्था हम आपके लिए कर देंगे। क्या आपको जिनमंदिर में सुन्दर वजिन्द्रो सहित पूजन करनी हैं? या सम्मेद शिखर आदि तीर्थों की वंदना करने चलना हैं?

रानी विजया: इन शुभ भावों में संतुष्ट तो यह जीव अनादि से होता आया हैं, पुत्र। अब तो एक शुद्ध भाव का आश्रय लेकर व्रतों को धारण करना हैं, तप साधना करनी ने।

“यह तन पाए महातप कीजै यामें सार यही हैं”

सेठानी सुनंदा: पर राजमाता? अभी तो आप को तो अभी बहुत कुछ देखना बाकी हैं? कितना सारा राज्य सुख भोगना बाकी हैं? महलों के सुख को छोड़कर आप अकेले विरान स्थानों में कैसे रहोगे?

रानी विजया: शास्त्रों का पठन किये बिना ही मैंने पुण्य-पाप का खेल देख लिया हैं, अब इस विचित्र संसार में और विशेष क्या देखना बाकी रह हैं? हे शुद्धात्मा! इस जीव का किसी से कोई सम्बन्ध नहीं हैं, बस भ्रम हैं। संसार में प्रशंसनीय ऐसे पुत्र मोह के कारण मैंने कितना संताप सहा हैं! भिन्न भिन्न पद पाने के लिए कितने पाप किये हैं?

कहा रच्यो पर-पद में न तेरो पद यहै क्यों दु:ख सहै।

अब ‘दौल’ होउ सुखी स्व-पद रचि, दाव मत चूकौ यहै ।।

अब तो मैं सिद्धों के पथ पर चलूँगी! निर्दोष आर्यिका दीक्षा धारण करुँगी! और इस स्त्री पर्याय को छेद कर अल्प काल में मोक्ष पद को प्राप्त करुँगी।

सेठानी सुनंदा: राजमाता! इस स्त्री पर्याय में मैंने कितनी सारी भूमिका भजी? कभी पुत्री की तो कभी माँ की; कभी पत्नी की तो कभी बहु की - इन सब भूमिका की ममता से मुझे आकुलता ही मिली। मैंने अपने स्वरुप का तो विचार किया ही नहीं? ओहो, पर अब नहीं; मैं भी अब सिद्धों से मिलने के मार्ग पर चलूँगी, मैं भी स्त्री-पर्याय में उत्कृष्ट आर्यिका दीक्षा को अंगीकार करुँगी!

जीवंधर स्वामी: हे पूज्य माता! आप धन्य हो क्योंकि अपने जगत्पूज्य बनने के मार्ग का चयन किया हैं!  धन्य हैं आपके यह विचार! धन्य हैं आपका वैराग्य! मुझमे भी ऐसा वैराग्य प्रगट हो ऐसा आशीर्वाद दीजिये!

राजा श्रेणिक: कैसा अभूतपूर्व दृश्य था! पुत्र को तो माता से दीक्षा की आज्ञा लेते हुए कई बार देखा था, पर दोनों माताएं का एक साथ दीक्षा लेने के भाव अपने पुत्र से व्यक्त करना? यह सचमें कितना वैराग्य उत्पन्न कराने वाला हैं!

राजा श्रेणिक का अंतर्मन: नीति तो यह कहती हैं कि निश्चय से संसार के स्वभाव को जानकर भी इस संसारूपी गड्ढे में पड़े रहना नीच पुरुषों की चेष्टा हैं। उच्च आत्मा को तो भोगों से उदासीनता का भाव होता हैं।

(end of scene 4)

Scene 5: जीवंधर स्वामी का वैराग्य

[ जीवंधर स्वामी जलक्रीड़ा के पश्चात उद्यान में प्रशंसनीय बंदरों की क्रीड़ा को देख रहे थे ]

राजा श्रेणिक: इन बंदरो की चेष्टा को तो देखो? लगता हैं इस बन्दर की प्यारी बंदरी उससे किसी कारण क्रोधित हो गयी हैं। यह बन्दर उसे प्रसन्न करने लिए क्या नहीं कर रहा हैं? फूल लाकर दे रहा हैं, प्रेम भरे हावभाव कर रहा हैं। उसे मनाने के लिए नृत्य भी कर रहा हैं!

हा! अचानक से इसे क्या हो गया? ये बंदर तो मर गया ऐसा लगता? देखो देखो इसकी बंदरी अब उसकी सेवा करने लगी, उसका क्रोध भी दूर हो गया ऐसा लगता हैं। अरे! ये बंदर तो उसकी बंदरी को मनाने के लिए मरने का ढोंग कर रहा था! तिर्यंचों में भी ऐसी मायाचारी? अब ये बंदर हर्षित हो गया और उसने अपनी बंदरी को एक कटहल का फल दे रहा हैं! ये क्या हो गया? वनपाल आया और उस बंदरी को भगा कर वह फल छीन लिया!

राजा श्रेणिक का अंतर्मन: निश्चित ही यह प्रसंग जीवंधर स्वामी के ह्रदय को स्पर्श करनेवाला होगा।

जीवंधर स्वामी: यह कैसा विचित्र दृश्य था? इतनी मायाचारी करने के बाद यह बंदर को कुछ सुख मिलनेवाला था। कितनी चेष्टा करने के बाद वह फल उसकी बंदरी को दे रहा था; और वह भी किसी बलवान ने उससे छीन लिया! ये मेरे जीवन की कथा से कुछ अलग थोड़ी हैं? वह बंदर काष्ठांगार के सामान हैं, मैं वनमाली के सामान और ये राज्य कटहल फल के सामान हैं!

पहले यह राज्य मेरे पिताजी राजा सत्यंधर के पास था। उसका कपट द्वारा नाश करके राज्य काष्ठांगार ने छीन लिया। अब मैं बलवान हुआ तो मैंने काष्ठांगार को मारकर राज्य पर अधिकार कर लिया। मुझसे भी कोई बलवान होगा तो वह मुझसे राज्य छीन सकता हैं। इस राज्य के राग की आग में मैंने कितने पाप किये? यह नश्वर राज्य मेरे द्वारा ही छोड़ने योग्य हैं।

राजा श्रेणिक:  जगत अनित्य हैं, अशरण हैं। संसार निस्सार हैं। जीव अकेला ही हैं, कोई साथ देनेवाला नहीं हैं। देह के प्रति ममत्व से ही तो सर्व बंधन हैं!

राजा श्रेणिक का अंतर्मन: वास्तव में आस्रव दुःखदायक हैं और संवर निर्जरा सुखदायक। लोक में एक आत्मा ही निहारने योग्य हैं। यह आत्मज्ञान सचमे दुर्लभ हैं और रत्नत्रय ही वास्तविक धर्म हैं। ध्रुवधाम की आराधना ही आराधना का सार हैं।

[ जीवंधर स्वामी जिनेन्द्र भगवान की पूजा करते हैं और उसके पश्चात चारणऋद्धिधारी मुनिराज के दर्शन प्राप्त होते हैं ]

राजा श्रेणिक: वैराग्य चित्त जीवंधर स्वामी अपने परम इष्ट जिनेन्द्र भगवान की पूजा करते हैं। महाभाग्य से एक ऋद्धिधारी मुनिराज के श्रीमुख से धर्मश्रवण करते हैं।

राजा श्रेणिक का अंतर्मन: नीति तो यह कहती हैं कि जिसप्रकार स्वभाव से चमकदार रत्न को कोई चतुर जोहरी शाण पर चढ़ाकर उसे और घिसे तो उसकी चमक बढ़ जाती हैं, वैसे ही मुनिराज के वचन सुनकर जीवंधर स्वामी का चित्त अत्यंत निर्मल हो गया।

जीवंधर स्वामी: हे महामुनिराज! मुझे अपने पूर्व भाव का वृतांत जानने की बहुत जिज्ञासा हैं। कृपा करके मुझे इसका ज्ञान दे।

ऋद्धिधारी मुनिराज: हे आत्मन! पूर्वभव में तुम धातकीखण्ड द्वीप के भुमीतिलक नगर के राजा पवनवेग के पुत्र यशोधर थे।

[ यशोधर हंस के बच्चे को खेलने के लिए उसके घोसले से लाकर पिंजरे में बंध कर उसका पालन पोषण करने लगा ]

यशोधर: पिताजी! ये देखिये! यह कितना सुन्दर हंस हैं? इसके छोटे छोटे पंख को तो देखो कैसे आनंद से फड़फड़ा रहा हैं? इस नन्हे से हंस के बच्चे की आँखे कितनी बड़ी बड़ी हैं!

राजा पवनवेग: बेटा, ये हंस का बच्चा तुम्हे कहाँ से मिला?

यशोधर: यही पास के तालाब में वह तैर रहा था। कौन इसे खाना देता होगा? कौन इसकी देखभाल करता होगा? यह सोचकर मैं इसे अपने साथ ले आया। इसका मैं बहुत अच्छे से पालन पोषण करूँगा।

राजा पवनवेग: पुत्र यशोधर! तुमने अनजाने में बहुत बड़ा पाप किया हैं, जिसके कारण तुम्हे आगे जाके घोर दुःख भोगना पड़ेगा। इस जगत में सभी जीव स्वतंत्रता को चाहते हैं, बंधन किसे पसंद हैं? क्या तुम इस हंस के बच्चे के माता पिता का विचार नहीं आया? वे कितने दुखी होंगे, कितने चिंतित होंगे? प्रकृति की सौंदर्य में सुख ढूँढना एक भ्रम हैं, क्योंकि सच्चा सुख तो तुम्हारे अंदर हैं। इसलिए अपने आत्मा के सौंदर्य को देखो और उसमे रम जाओ। यही सर्व अध्यात्म का सार हैं!

[ यशोधर उन हंस के बच्चे को पिंजरे से आज़ाद कर देते हैं ]

ऋद्धिधारी मुनिराज: राजा यशोधर ने जिनदीक्षा धारण करके घोर तप साधना की ।से उनके साथ उनकी ८ रानिओ ने भी दीक्षा ली। उस घोर तप के प्रभाव से वैमानिक देव हुए और वहां से अपनी आयु पूर्ण करके मनुष्य लोक में अपनी ८ स्त्री सहित उत्पन्न हुए।

हे भव्य, पूर्व जन्म में हंस के बच्चे को उसके स्थान और उसके माता पिता से वियोग करने के फल में इस मनुष्य भव में तुम्हारा जन्म स्मशान में हुआ, राज्य के अधिकारी होने पर भी उस राज्यपद नहीं मिला। और अनेको वर्ष तक सच्चे माता-पिता कौन हैं उसकी खबर नहीं थी और उनके वियोग का दुःख भोगना पड़ा।

राजा श्रेणिक: जीवो की विराधना का फल कैसा विचित्र हैं! सच में, किसी भी जीव को उसके माता पिता से दूर करना महापाप हैं। हमे कभी कभी लगता हैं कि हम पालतू जानवर को अपने पास रखकर उनपर उपकार कर रहे हैं पर सच्चाई तो कुछ और ही हैं!

राजा श्रेणिक का अंतर्मन: जैन दर्शन का कर्म सिद्धांत अद्भुत हैं। परिणामों का फल इस जीव को अवश्य ही मिलता हैं! इसलिए हे जीव! अपने परिणामों की संभाल करो!

[ जीवंधर स्वामी मुनिराज को नमोस्तु करके विचार करते करते आगे बढ़ते हैं ]

जीवंधर स्वामी: ओहो! अपना स्वरुप भूलकर मैंने क्या कुछ नहीं सहा? मैं हमेशा काष्ठांगार को ही दुष्ट और दोषी समझता रहा। अपने को क्षत्रिय मानकर राजपाठ में अँधा कितना त्रस्त हुआ? ब्रह्म स्वरूपी आत्मा को छोड़कर ८-८ विवाह करके भी मुझे कहाँ सुख मिला? ये राज्य तो महादुःखदायक हैं। जो मैंने इस मनुष्यभव को भोगो में ही लगा दिया तो मेरी कैसी दुर्दशा होगी? ये दुर्लभ मनुष्यभव फिरसे कब मिलेगा?

समय आ गया हैं अब मैं इस मोहराजा की कर्मसेना का समूल नाश करूँगा। संसार के चक्रव्यूह को तोड़कर धर्म का ध्वज लहराऊंगा। प्रज्ञाछैनीरुपी शस्त्र से आत्मा और बंधन को भेद कर मुक्ति के पथ पर बढूंगा। आयुधशाला में प्रगट सम्यक रत्न होगा, जिससे मैं कर्म ने जो अनादि से छिना था जो मेरा राज्य, उसे हराकर मैं अपना स्वराज्य पा जाऊंगा। रणभूमि में फिर कैवल्य सूर्य का उदय होगा तब मैं क्षत्रिय नहीं क्षायिक हो जाऊंगा!

[ जीवंधर स्वामी भगवान महावीर के समवसरण में जाते हैं ]

जीवंधर स्वामी: हे महावीर स्वामी भगवान! हे त्रिलोकीनाथ परमात्मा! आपकी साक्षी में मैं सर्वोत्कृष्ट सर्वकल्याणकारी संसारतरणी निर्दोष निर्ग्रन्थ दिगम्बर मुनि दीक्षा धारण करता हूँ ।

[ जीवंधर स्वामी अपना मुकुट आदि निकालते हैं ]

राजा श्रेणिक: मुकुट के मणि के सामान जीवंधर कुमार सभी क्षत्रिय राजाओं में चूड़ामणि के सामान श्रेष्ठ थे। ऐसे राजा जीवंधर कुमार घोर तप और आत्मसाधना से अशरीरी सिद्ध दशा प्राप्त की। उनकी ८ रानियों ने भी आर्यिका दीक्षा धारण की।

राजा श्रेणिक और राजा श्रेणिक का अंतर्मन: भगवान जीवंधर ****स्वामी की जय हो! भगवान जीवंधर ****स्वामी की जय हो!