Skip to main content

Question Set 1

१. शांतिदेवी हमेशा अशांत और बेचैन रहती थी और उसे लगता था कि भगवान उसे जाने कौनसी सज़ा दे रहे हैं? ना तो वो बहुत बुद्धिमान है, और ना ही उसके पास अपनी बहन जैसा रूप। जब भी वो कुछ करना चाहती है, पति करने नहीं देता। एक ना एक बीमारी अलग लगी रहती है। ‘कर्म’ पाठ के आधार पर उन्हें उनकी परेशानियों का कारण समझाएँ और शांति प्राप्त करने का तरीक़ा भी बतायें।

मैं: शांतिदेवी; आपका नाम हैं वैसा ही आपका स्वभाव हैं। आपको क्या समस्या हैं? क्यों उदास बैठे हो आप?

शांतिदेवी: क्या बताऊ; भगवान ने मेरे जीवन में दुनिया भर की परेशानियाँ भर दी हैं, पता नहीं वो कौनसे कर्मों का फल दे रहा हैं मुझे?

मैं: अरे! आप अपने दुःखो का ठेका भगवान के हाथ में क्यों दे रही हो? मंदिरजी में नहीं सुना था पंडितजी बता रहे थे न कि - भगवान किसी के करता-हरता नहीं हैं। हाँ, जो अभी वर्तमान में संयोग हैं वे आपके ही पहले बांधे हुए कर्मो का फल हैं ! Past तो अभी बदल नहीं सकते, पर Present तो अपने हाथ में हैं न !

शांतिदेवी: ये सब बाते मेरे समझ में आती ही नहीं! मैं तो मूर्ख हुँ; मैं जो भी करने जाती हुँ सब गलत ही हो जाता हैं ! काश मेरे पास भी बुद्धि होती तो आज मैं मेरी तकलीफों का कुछ न कुछ हल तो निकाल ही देती !

मैं: इस दुनिया में कितने ही बुद्धिमान लोग हैं; सच बताऊ तो सब के सब आकुलित ही हैं। बुद्धि तो अपने ‘ज्ञानावरण’-’दर्शनावरण’ कर्म के निमित्त से हैं; और कार्य होने में अड़चन आ जाना; वो ‘अंतराय’ कर्म के निमित्त से हैं!  पर सुख और शांति; उसका कारण तो कुछ और ही हैं !

शांतिदेवी: ये बात तो सही हैं तुम्हारी, पर कभी कभी ऐसा लगता हैं जो मैं सुन्दर होती, मेरा आवाज़ सुरीला होता तो सब मेरी बात सुनते। मैंने मेरी beauty और skincare पर पहले से ही ध्यान दिया होता; तो आज ये दिन न देखना पड़ता ! और ऊपर से मेरे पति, मुझे जो चाहिए वो करने ही नहीं देते। माँ सच ही बोल रही थी, जो बड़े घर में शादी की होती तो मैं आराम से रहती!

मैं: शरीर से आज तक कोई संतुष्ट हो पाया हैं क्या भला? आप व्यर्थ ही इसके सुन्दर होने की इच्छा करके दुःखी हो रहे हो; वास्तव में तो शरीर, आवाज़ आदि तो हमारे पहले बांधे हुए ‘नाम’-कर्म के आधीन हैं। आप तो शुद्ध आत्मा हो… और रही बात घर-परिवार जी की, वह तो ‘गोत्र’-कर्म से हैं ! बाहर के दूसरे सुखी-दुःखी करनेवाले संयोगों तो वैसे भी ‘वेदनीय’ कर्म के आधीन हैं; इसलिए तो हमे जैसा चाहिए वो हमेशा नहीं मिलता। मिलेगा भी कैसे; वस्तु का परिणमन तो स्वतंत्र ही हैं!

शांतिदेवी: हाय! ये कर्म तो बड़ा भयानक हैं! मेरे सभी दुःखो का कारण लगता हैं यही हैं। फिर तो इस दुःखो से छूटने का तो कोई उपाय ही नहीं हैं; सब कर्म ही तो कर रहा हैं! इससे अच्छा तो मैं मर ही जाती!

मैं: आप ऐसी अशुभ बाते क्यों करते हो aunty जी… मरना भी तो ‘आयु’-कर्म के निमित्त से हैं; उसमे भी कहा हमारी चलती हैं बोलो!

शांतिदेवी: ये सब कर्म आते कहा से हैं ये बताओ पहले! मुझे तो याद नहीं जब मैंने इन बिचारों को बाँधा हो जिसका बदला ये लोग ले रहे हैं ?!

मैं: haha… ये कर्म कोई इंसान थोड़े ही हैं ! वे तो रज-परमाणु हैं जो हमारे मोह-राग-द्वेष अर्थात इच्छा-वांछा से हमारे आत्मा के साथ चिपक जाते हैं। राग-द्वेष न करे तो कर्म भी नहीं बंधेंगे और कर्म से जो छूट गए तो मोक्ष हो गया; यानी अनंत सुख! हमारे कर्म हमे ही भोगने हैं!

शांतिदेवी: ये तो कितनी सुन्दर बात हैं। हमारा सुख तो हमारे ही हाथ में हैं! पर अब तक मैं क्यों फिर वस्तुओं में सुख ढूंढ रही थी ? जो राग-द्वेष से छूटना हो और शांति पाना हो तो क्या करना पड़ेगा ?

मैं: ‘मोहनीय’-कर्म के निमित्त से जीव संसार में सुख की वांछा के नशे में डूबा रहता हैं। जब कषाय मंद पड़ती हैं तब ये तत्त्व और मोक्षमार्ग  की बात सुनने को मिलती हैं और रुचती हैं। कर्म कोई हमारे दुःख का कारण थोड़ी हैं? वह तो सिर्फ निमित्त हैं; और कर्म भी तो हमारे ही भावो से बांधते हैं न! वास्तव में, हमारे दुःख का कारण मिथायत्व, अज्ञान और असंयम ही हैं; जो इच्छा का अभाव हो तो निराकुल सुख प्रगट होता हैं। संक्षिप्त में कहुँ तो राग और आत्मा को भिन्न जानने का नाम ही मोक्षमार्ग हैं। हमारा स्वभाव तो शुद्ध हैं, सुखमय ही हैं; राग-द्वेष से सारी आकुलता हैं बोलो !

शांतिदेवी: ओहो! आज तो मेरी आंखे खुल गयी ! आज तक मैं पर को ही दोष देती आई थी; पर अब समझ आया की दुःख का कारण और उपाय दोनों मेरे पास ही हैं। ये जानकार तो मुझे सचमे बहुत शांति मिली ! अब तो मुझे मोक्षमार्ग के बारे में और जानना हैं…

मैं: मैं अभी जिनमंदिर में सायंकालीन स्वाध्याय के लिए ही जा रहा हुँ; आप भी चलिए मेरे साथ… मोक्ष की ओर

२. अपने वर्तमान या पूर्व के जीवन में जहां गृहीत मिथ्यात्व रहा हो और आपने उससे मुक्ति पायी हो या गृहीत मिथ्यात्व का प्रसंग आया हो और आप उससे बचे हों ऐसे कोई 2 उदाहरण दीजिए। साथ में यह भी स्पष्ट कीजिए की आपने यह कैसे निर्णय किया की वह गृहीत मिथ्यात्व है एवं छोड़ने लायक़/ बचने लायक़ है?

मुमुक्षु के जीवन में गृहीत मिथ्यात्व मुख्यरूप से तो अनजाने में या अविचार पूर्वक प्रमाद क्रिया से ही होता हैं। अनेक उदहारण हैं जहा पर सोचा जाए तो गृहीत मिथ्यात्व की अनुमोदना हो जाती हैं। मेरे जीवन में भी पूर्व में अनेक बार गृहीत मिथ्यात्व में जुड़ने का प्रसंग और कैसे उनसे मैं बचा या छोड़ा उसके २ उदहारण -

उदहारण १:

कॉलेज में culture celebration के नाम पर धार्मिक क्रियाएँ होती ही हैं। एक बार गणपति स्थापना-विसर्जन का कार्यक्रम था और उसके लिए सभी से दान मांगने के लिए आये कुछ मेरे सहपाठीओ को मैंने देखा। मैं इतनी तो हिम्मत नहीं जुटा सकता था की मुँह पर दान देने के लिए ना बोल दूँ; क्योंकि इसके पीछे के अभिप्राय को समझना इतना सरल नहीं हैं। कुपात्र दान और वह भी कुदेव-धर्म के लिए दिया दान तो महापाप हैं, तीव्र दर्शन मोहनिया का बंध होता हैं; ऐसा जानकार मैं चुपके से कुछ बहाना बनके वहाँ से निकल लिया।

ऐसे कॉलेज में अनेक प्रसंग और भी बने थे; जैसे वो उत्सवों में भाग न लेना, सरस्वती आदि के श्लोक को न पढ़ना, आरती आदि में न जाना, उनके प्रसाद को ग्रहण न करना आदि। इन सभी में मेरे लिए तो सबसे अच्छा उपाय तो वह स्थान छोड़के चले जाना ही रहा हैं।

गुरुदेवश्री ने अपने पूर्वभव में अपने मित्र के गलत धर्म पालन का किंचित अनुमोदन किया था जिसके फल में वे पंचम काल में जन्मे और वर्षों तक सच्चे मार्ग से वंचित रहे! लोगों की शर्म से जो हम कुदेव आदि में अनुमोदना करके जो गृहीत मिथ्यात्व पोषे तो हम से बड़ा मुर्ख कौन हो सकता हैं भला?

उदहारण २:

पंचम काल के हीनपने के फलरूप आज शुद्ध श्रमण धर्म में भी गृहीत मिथ्यात्व का पोषण हो तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। मेरे जीवन में कुछ विकट परिस्थिति में पूर्व में मैंने भी वीतरागता और भेद-ज्ञान की शरण लेने के बजाये मार्ग से भटकने का प्रसंग आया था। इतना ही नहीं, एक बार जीव मार्ग से भटक जाता हैं फिर वह छोटी छोटी चीज़ो में भी गृहीत मिथ्यात्व के दलदल में फस जाता हैं।

भक्तामर स्तोत्र का पाठ करने से कार्य की सिद्धि, मनोकामना-विघ्नहर्ता आदि कुविशेषणों सहित भगवान को अपनी इच्छा पूर्ति के लिए पूजा, नवग्रह शांति आदि की बात सुनी तो वह विकल्प भी गृहीत मिथ्यात्व नहीं भासित हुआ। इसमें मुर्ख बनने का मुख्य कारण यह था कि पूज तो हम जिनेन्द्रदेव को ही रहे हैं तो हमे वह गलत नहीं लगता हैं; परन्तु बंध तो अभिप्राय का लगता हैं न !

इस उपरान्त, ऐसी मिथ्या मान्यताओं का सीधा सम्बन्ध सच्चे गुरु का समागम न होने का, environment के प्रभाव का, स्वाध्याय की और तत्त्व-श्रद्धान की कमज़ोरी से हैं।

पर तत्त्व-विचार करने पर और आगम प्रमाणों के अनुसार अपना श्रद्धान ठीक करने पर ये सब मिथ्या मान्यताए सहज ही छूट जाती हैं। परमागम होनोर्स कोर्स से तो अब योग्य ज्ञान और वातावरण भी प्राप्त हैं, जिससे सच्चे धर्म की श्रद्धा और दृढ़ हो गयी हैं। इसलिए ऐसे गृहीत मिथ्यात्व का जीवन में प्रवेश होना अब मेरे लिए असंभव सा ही हो गया हैं !

३. आचार्य अमृतचन्द्र रचित पुरुषार्थ सिद्धि उपाय पर आधारित 'अहिंसा : एक विवेचन' के आधार पर बताएं कि किसी जीव की जान बचाने रूप क्रिया करके पहले आपके मन में क्या भाव आते थे ? अब आप उस स्थिति में क्या सोचते/मानते हैं और क्यूँ?

जो कोई जीव पीड़ा में हो, मर रहा हो; तो उसे बचाने का भाव सज्जन पुरुष को आये बिना रहता नहीं हैं। अहिंसा का व्यवहारिक अर्थ तो अपने आचरण से किसी भी जीव को पीड़ा न पड़े, जान न जाय । ‘जीव को बचाना कैसे’ उससे पहले वास्तव में तो जीव जीता कैसे हैं, वह जानना अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यह विचारधारा आचार्य अमृतचन्द्र रचित पुरुषार्थ सिद्धि से ही ज्ञान में प्रकाशित हुई हैं।

जीव कैसा जीता हैं फिर?

‘जीव तो अपने चैतन्य प्राणों से जीता हैं’; इसलिए वह अनादि-अनंत तत्त्व हैं जो न कभी जन्म लेता हैं और न कभी मरण को प्राप्त होता हैं।

पर जीव को शरीर में रह रहा है न! उस जीव को शरीर से निकलने से अर्थात मरने से तो हम बचा सकते है न!

जी नहीं; क्योंकि आयुकर्म का जब तक उदय हैं, तब तक उसके निमित्त से जीव वह पर्याय में रहता हैं; और जब इस भव के सभी आयुकर्म परमाणु की निर्जरा हो जाय तो जीव यह पर्याय छोड़कर दूसरी पर्याय में चला जाता हैं।

अच्छा, मरने से बचा तो नहीं सकते तो उस जीव की पीड़ा को तो दूर कर सकते हैं न ?

जीव के दुःख संयोगो से हैं ही नहीं, अपितु वे उसके मिथ्यात्व-मोह-राग-द्वेष से हैं। जब तकराग की भूमिका हैं, तब तक जीव के दुःख दूर नहीं हो सकते।

तो जीव मर रहा हो तो उसे मरने छोड़ दे क्या? कुछ भी न करे?

श्रावक की भूमिका में दया के शुभ भाव आते हैं; और निमित्त बनके योग्य उपाय करने से जीवों को बचा भी सकते हैं; परन्तु यह अहिंसा नहीं हैं।

राग-द्वेष आदि विकारी भाव की हिंसा हैं और इनका उत्पन्न न होना ही अहिंसा हैं। कोई किसी का क्या करे? कौन किसकी जान बचाये? किसे जीवतदान दे? सब अपनी योग्यता से हैं।

यह बात भी पूर्णतः सत्य हैं की जब तक राग-द्वेष की तीव्रता हैं तब तक संयम/अहिंसा पालने के भाव आते ही नहीं हैं। तो सबसे पहले तो सच्चे अभिप्राय और तत्वनिर्णय के साथ बड़ी-बड़ी हिंसा का त्याग करने का उद्यम करना चाहिए। उसका त्याग न हो तो फिर सूक्ष्म हिंसा कैसे छूटे?

अहिंसा का सत्य स्वरुप को पढ़कर मैं अभक्ष्य-भक्षण के त्याग की ओर और प्रेरित हुआ हुँ। क्योंकि राग हैं इसीलिए तो अभक्ष्य खाने का भाव आता हैं। रात्रिभोजन त्याग, बाज़ार के भोजन आदि का त्याग अत्यंत आवशयक हैं, इससे विशुद्धि में वृद्धि भी होती हैं; पर अभिप्राय सही होना चाहिए।

अहिंसा का निश्चय स्वरुप जानने से थोड़े-बहुत व्रत-संयम भी हो तो भी उसमें मान नहीं होता। क्योंकि जब तक राग हैं, उस उस अंश में भाव-मरण चल ही रहा हैं और वह हिंसा हैं। इस प्रकार ‘अहिंसा’ का सच्चा स्वरुप जानने से ही वास्तव में अहिंसा का पालन हो सकता हैं।