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Question Set 2

1. राहुल ने दशलक्षण धर्म की पूजन में ‘काय छहों प्रतिपाल, पंचेन्द्रिय मन वश करो’ यह पढ रखा था तथा वह दशलक्षण पर्व के समय यत्नाचार से रहता था की छहकाय के जीवों का उससे कम से कम घात हो तथा उसकी मान्यता थी की वह अपने को पंचेन्द्रिय के सुखों से दूर रखे। इन सब से बचने के लिए दशलक्षण पर्व के समय वह या तो अधिकांश समय सोते हुए व्यतीत करता या समाचार पत्र, टीवी आदि देखते हुए बिताता परन्तु जब उसने परमागम आनर्ज़‌ कोर्स से जुड़ने के बाद दशलक्षण धर्म पुस्तक का गहराई से अध्ययन किया तथा शिक्षकों से समझा तब उसे अपनी भूल समझ आयी।

राहुल को अपनी क्या भूल समझ आयी तथा संयम धर्म का कैसा सच्चा स्वरुप समझ आया, यह आपकी समझ से ३ महत्वपूर्ण बिन्दुओं के आधार पर बताएँ।

१. ‘परसन्मुखता’ से ‘स्वसन्मुखता’

‘उत्तम संयम धर्म’ का निश्चय स्वरुप उपयोग की सूक्ष्मता और स्वलीनता ही हैं। व्यवहार से प्राणी संयम और इन्द्रिय संयम के रूप में समझाया गया हैं। मोक्षमार्ग में ‘नय’ को समझने की उपयोगिता बहुत हैं। वास्तव में देखा जाए तो उपयोग को ‘पर’ से हटाकर ‘स्व’ में लगाने का पुरुषार्थ ही संयम धर्म हैं। सम्यग्दर्शन के बिना तो ‘संयम’ होता ही नहीं हैं!

राहुल की या मिथ्याभ्रांति थी कि सिर्फ ५ इन्द्रिय के सुख से दूर रहो और जीवो का घात कम करो - बस इतना ही ‘उत्तम संयम धर्म’ हैं। पर यह पढ़के ये तो स्पष्ट हो गया कि बाह्य क्रियाओं का नाम संयम नहीं हैं। समाचार पढ़ना, टीवी देखना, सोते रहना ये सब भी तो देखा जाए तो ‘पर’ सन्मुखता ही हैं न! इसमें कहाँ आत्मचिंतन हैं, कहाँ उपयोग की सूक्ष्मता हैं या सम्यग्दर्शन का पुरुषार्थ हैं?  इसलिए यह तो सबसे पहली भूल हैं।

२. ‘कुछ क्रियाविशेष का न करने का नाम उत्तम संयम नहीं’

अहमिन्द्र देवो को न तो मनुष्य जैसा भोजन आदि में प्राणी घात होता हैं, न तो दूसरे इन्द्रिय विषयों की उतनी आसक्ति। कषाय भी मंद होती हैं, लेश्या भी शुक्ल  होती हैं। तो भी आचार्य कहते हैं कि इनको संयम नहीं होता और मनुष्य और तिर्यंच जिनको कुछ अंश तक प्राणी घात और इन्द्रिय सेवनरूप बाह्य में दिखाई देते हो तो भी उनको ‘उत्तम संयम धर्म’ होता हैं। यह इस बात का प्रमाण हैं कि संयम का सम्बन्ध बाह्य क्रिया से नहीं अपितु आंतरिक वृत्ति से होता हैं। इस संयम के लिए तो देव भी तरसते हैं; ऐसी दुर्लभ वस्तु की स्वछन्द प्रवृत्ति करना ठीक नहीं हैं। बाहर से भले ही संयम-रूप व्यवहार हो, पर जो अंतर से आत्मा की रूचि न हो तो वह अनंतानुबंधी मायाचारी ही तो हैं; और क्या हैं? टीवी देखना, सोते रहना, लोगो से विकथाओं में उलझना, आदि तो सचमे असंयम के ही लक्षण हैं। क्योंकि सिर्फ कुछ क्रियाविशेष न करने का नाम संयम होता तो हजारों लोग भूखे-प्यासे हैं - क्या उनको संयमी कहेंगे? अनेक जीव गृहीतमिथ्यात्ववश होकर कुव्रत लेते हैं और कितनी ही अभक्ष्य वस्तुओं का त्याग करते हैं; क्या उनको संयमी कहेंगे? विचारने योग्य हैं।

३. ‘छह काय की रक्षा करो उससे पहले अपने को तो जीव अनुभवों!’

राहुल का ध्यान पूरा दिन ‘यह न खो वो न पहनू, वहाँ न जाऊ, ये न करुँ’ आदि में ही व्यतीत हो रहा था। यहाँ पर भूल ये हो गयी की वह अपने को ही भूल गया। जिसके आश्रय से संयम प्रगट होता हैं, वह अचिन्त्य तत्व मैं हु ऐसी अनुभूति से दूर सिर्फ दूसरे जीवों की रक्षा में ही मन लगा रहा। वैसे रक्षा के भाव तो शुभ हैं; पर जब तक जीव अकर्ता स्वभाव को न जाने, ‘मैं किसी की रक्षा नहीं कर  सकता’ ऐसा न समझे - तब तक तो मिथ्यात्व हैं ही; और जहाँ मिथ्यात्व हो वहाँ संयम कैसे हो सकता हैं? इसलिए राहुल ने इस भूल को समझकर अपने आत्मा पर दृष्टि करके भेदविज्ञान की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया।

४. ‘हिंसा में प्रमाद परिणति मूल हैं’

सिर्फ जीवो के घात का नाम ही हिंसा हैं; ऐसा नहीं हैं। जहाँ प्रमाद अर्थात ‘कषाय के योग से अपने और पर के प्राणों का व्यपरोपण’ हो, वह हिंसा हैं; और वहां असंयम हैं। टीवी देखते या सोते रहते समय अपने प्रतिसमय होनेवाले भावमरण पर लक्ष्य जाता हैं? क्या अपने आत्मा की हिंसा का नाम प्राणीघात नहीं हैं? ऐसा विचार करने पर राहुल को अपनी गलती की सूझ पड़ी।

2. प्रागभाव और प्रध्वंसाभाव को जानने से हम अवसाद (depression) से कैसे बच सकते है और अत्यंताभाव को जानने से हम निर्भार कैसे हो सकते है, यह अपने जीवन के 2-2 प्रायोगिक उदाहरणों से बताएँ।

‘पूर्व पर्याय का वर्तमान पर्याय में अभाव’ - प्रागभाव

‘भविष्यकालीन पर्याय का वर्तमान पर्याय में अभाव’ - प्रध्वंसाभाव

‘एक द्रव्य का दूसरे द्रव्य में अभाव’ - अत्यंताभाव

हम इसे २ दृष्टांत से समझेंगे -

Example 1 (प्रागभाव):

Depressed patient: डॉ साब! क्या बताऊ आपको; मैं बहुत ही टेंशन और स्ट्रेस से गुज़र रहा हूँ!

Therapist: क्यों भाई, क्या हुआ आपके साथ?

Depressed patient: कुछ गलत संगत के असर से मुझे मदिरा पान और स्मोकिंग का addiction हो गया हैं। इससे मुझे कई भयानक बीमारिया भी आ गयी हैं और मानसिक संतुलन भी बिगड़ा रहता हैं। और तो और गए हफ्ते मेरी जॉब भी छूट गयी; पर ये बुरी आदत नहीं छूट रही हैं। मुझे लगता हैं कि ये तो कभी छूटेगी भी के नहीं?

Therapist: कोई बात नहीं; जो हो गया वह हो गया। वर्तमान पर ध्यान दो। तो अभी…

Depressed patient: अरे पर जो भूतकाल में मेरे से पाप हो गए उनका क्या? वह तो मेरे वर्तमान को बिगाड़ रहे हैं न! उनका बोझ मेरे ह्रदय पर बहुत हैं!

Therapist: वस्तु का स्वरुप ऐसा नहीं हैं! भूतकालीन अवस्था (पर्याय) का वर्तमान अवस्था (पर्याय) का सर्वथा अभाव ही होता हैं। जैसे - दही की अवस्था में उसकी पूर्व दूध की अवस्था का कोई हस्तक्षेप नहीं हैं; वैसे ही आपकी भूतकालीन व्यसनीपने की अवस्था का वर्तमान की इस बुरी आदतों को त्यागने के लिए तत्पर सज्जनता की अवस्था में अभाव ही तो हैं!

हम अपना जीवन भूतकाल में बहुत व्यतीत करते हैं; और दुखी होते हैं। भूतकाल में मुझसे ये पाप हो गए, वो पाप हो गए - ऐसा सोचके दुखी होने से बेहतर वर्तमान में ही पुरुषार्थ द्वारा उनसे भिन्न अनुभव करे तो ही उन पापों का वास्तव में पश्चाताप होता हैं।

और इतना ही नहीं, पूर्व में शुभ भाव किये हो उनको भी वर्तमान में याद करके अभिमान करना वर्तमान की पर्याय में आत्मा का घात करने के बराबर ही हैं!

‘समाधी-भावना’ की यह पंक्ति द्रष्टव्य हैं -

‘भोगे जो भोग पहले उनका न होवे सुमिरन,

मैं राज्य सम्पदा या पद इंद्र का न चाहू’

आत्मार्थी जीव ऐसा तत्वविचार करता हैं कि - भूतकाल की पर्याय का वर्तमान पर्याय में अभाव हैं, तो व्यर्थ में मेरे वर्तमान को क्यों विभावों से कलुषित करू? मैं तो वर्तमान की पर्याय को स्वभाव के सन्मुख मोड़ने का पुरुषार्थ करूँगा!

Example २ (प्रध्वंसाभाव):

Anxiety patient: डॉ साब! क्या बताऊ आपको; मैं बहुत ही टेंशन और स्ट्रेस से गुज़र रहा हूँ!

Therapist: क्यों भाई, क्या हुआ आपके साथ?

Anxiety patient: पता नहीं; आगे आनेवाले जीवन की जब कल्पना करता हु तब लगता हैं कि बहुत कुछ करना हैं। मेरे पास इतनी अच्छी पगार नहीं हैं कि मैं मेरे घर का कर्ज़ा चूका पाऊ; और अगले साल तो मेरी शादी भी हो जाएगी; वह एक और जिम्मेदारी। कहा पैसा रोकू, कैसे ज़्यादा धन कमाऊ पता नहीं!

Therapist: जैसा होने योग्य होगा, वह ही होगा; वर्तमान में क्यों उसकी चिंता करते हो?

Anxiety patient: अरे पर भविष्य में कुछ अनहोनी हो गयी तो? उसकी चिंता तो रहती ही हैं न! भविष्य की चिंता वर्तमान में न करू तो भूतकाल में थोड़ी करूँगा?

Therapist: वस्तु का स्वरुप ऐसा नहीं हैं! भविष्यकालीन अवस्था (पर्याय) का वर्तमान अवस्था (पर्याय) का सर्वथा अभाव ही होता हैं। जैसे - दही की अवस्था में उसकी भविष्य छाछ की अवस्था का कोई हस्तक्षेप नहीं हैं; वैसे ही आपकी भविष्य निर्धन/धनवान अवस्था का वर्तमान अवस्था में पूर्णतः अभाव ही हैं। वर्तमान में योग्य बाह्य जो भी कमाने के विकल्प हो वह करें, पर कोई चिंता या घबराकर नहीं - सहजता से जो होता हैं उसको स्वीकार करे!

भविष्य में मेरे साथ क्या होगा? मेरी आयु कितनी होगी? कैसे आजीविका चला पाउँगा? कैसे अपने आत्मा के लिए समय निकाल पाउँगा? इस दुर्लभ मनुष्य भव को व्यर्थ में तो नहीं गवा दूंगा क्या? सम्यग्दर्शन कब होगा? होगा भी के नहीं होगा?

ऐसे सवाल मोक्षार्थी को आते ही हैं। कभी कभी जीवन के ऐसे प्रश्नों से मन बहुत चंचल हो जाता हैं और ये जीव overthink करने लगता हैं। पर वास्तव में जब समझे कि भविष्यकालीन पर्याय का वर्तमान पर्याय में अभाव हैं तो फिर वर्तमान पर्याय में अपने आत्मा के सन्मुख दृष्टि करने का पुरुषार्थ जागृत होता हैं। ऐसे ही प्रध्वंसाभाव को जानने से अपने चित्त को शांत करके भेदविज्ञान करना चाहिए।

कोई ऐसा सोचे कि…

‘वर्तमान को ही पूरा enjoy कर लेना चाहिए फिर तो’

ऐसा सोचने वाले मुर्ख स्वच्छंदी जीवो को आचार्यदेव कहते हैं कि ‘वर्तमान में पर वस्तु में सुख ढूंढ़ता हुआ आत्मा को विभाव भावों से परिणमन करता हुआ - अपना ही घात प्रतिसमय करता हैं; क्या इसको तू ‘enjoyment’ या सुख मानता हैं?’

सचमे, परद्रव्य में सुख हैं ही नहीं। एक द्रव्य का दूसरे द्रव्य में अत्यंत-अभाव हैं! न तो ये जीव दूसरे द्रव्य का कुछ करता हैं, न भोगता हैं - तो फिर सुख पाने का तो सवाल ही नहीं उत्पन्न होता!

न पर-वस्तु पर निर्भर, न पूर्व पर्याय का बोझा और न ही भविष्य पर्याय की चिंता;

जो इस अत्यन्ताभाव को समझे वह हो जाए निर्भार।

जिस पर्याय का जिस समय में जो होना हैं वह निश्चित ही हैं। ऐसा श्रद्धान करके मोक्षार्थी स्व में पुरुषार्थ करके आत्मानुभूति को प्राप्त होता हैं।

3. ‘परद्रव्य कोई जबरन तो बिगाड़ता नहीं है, अपने भाव बिगड़ें तब वह भी बाह्य निमित्त है’,  अपने जीवन में अगले २ दिनों में ध्यान से निरीक्षण करें कि कब-कब आप पर द्रव्य को अपने भाव बिगड़ने का कारण मानने लग जाते हैं?एवं निमित्त-उपादान की सच्ची समझ के बाद आपकी सोच में क्या परिवर्तन आया है?

  • मेरी ऑफिस में मेरे बॉस में मुझे मेरे काम के विषय में कुछ टिपण्णी दी थी। इसके कारण मुझे बहुत दुःख हुआ था और मेरे भाव बिगड़ गए थे। पूरा दिन मेरा दुखी-दुखी ही निकल गया। कोई पूछे कि क्यों इतने चिंतित हो तो मैं कहता था कि ऑफिस में कुछ ठीक नहीं चल रहा हैं। और तो और मेरा स्वाध्याय में भी मन नहीं लग रहा था। निमित्त उपादान की वास्तविक समाज एक संजीवनी हैं। इससे कार्य के सच्चे कारण का ज्ञान होता हैं। इस पर विचार करते ही मुझे ज्ञात हो गया कि मेरे भाव सिर्फ मेरे मिथ्यात्व, राग, द्वेष आदि विभावो के कारण ही बिगड़े हैं - पर द्रव्य तो निमित्त मात्र हैं। उन भावों का कारण मेरी वर्तमान पर्याय की योग्यता ही हैं; अन्य कुछ भी नहीं। क्योंकि उस समय की ऐसी योग्यता थी, बाहर संयोग भी ऐसे प्राप्त हो गए - जो सिर्फ निमित्त मात्र थे।
  • मुझे २ दिन से पेट में दर्द हो रहा था। जब ही दर्द हो तब मुझे क्रोध आदि विभाव परिणाम आते थे। पूरा दिन स्वास्थ्य की चिंता और उसे ठीक करने के उपाय में ही अशुभ भाव होते रहते हैं। विचार करने पर ये तो निश्चित ही हैं की इन भावो का कारण तो मेरे आत्मा की वह समय की योग्यता ही हैं। निमित्तरूप शरीर का ऐसा परिणमन, योग्य उपचार का न मिलना आदि हैं। पूरा दिन शरीर को दोष देकर मैं अपने क्रोध और शोक को justify करुँ वह कैसे योग्य हैं? इससे विपरीत - वर्तमान में तत समय की योग्यता का सहजपने स्वीकार होना ही निमित्त-उपादान के सिद्धांत की सही समझ हैं!

२. सो ऐसी दशा न हो तब तक प्रशस्त राग रूप प्रवर्तन करो परन्तु श्रद्धान तो ऐसा रखो कि - यह भी बंध का कारण है - हेय है’ - पंडित टोडरमलजी के इस कथन के अनुसार ऐसे कौन कौन से प्रशस्त राग हैं जो अभी आपके जीवन में होते हैं पर उन्हें बंध का कारण मानना है? ये राग कब पूरी तरह से छूटेंगे और इनकी श्रद्धा कब पूर्ण रूप से छूटेगी?   

‘शुभ राग भी बंध का कारण हैं, इसलिए हेय हैं’ - यह श्रद्धा होने का नाम ही तो सम्यक्त्व हैं। ‘शुभ राग को उपादेय’ मानना आस्त्रव तत्त्व सम्बन्धी भूल हैं।

वर्तमान में कही न कही शुभ राग को उपादेय मानकर अनेक कार्यों में उपादेयबुद्धि हो ही जाती हैं। जैसे मैं शिबिर में गया तब शुद्ध भोजनालय में ही भोजन ग्रहण किया। तब मुझे ये मेरा नियम बहुत इष्ट लगा, अपने इस कार्य को मैंने बहुत अच्छा किया ऐसा माना। और दूसरे भी कई खाने-पीने की शुद्धता के नियम लेकर मैंने अपने आपको धर्मात्मा माना ऐसा अंदर मिथ्याश्रद्धान बैठा हैं। पूजा, स्वाध्याय आदि करके ‘अच्छा काम हो गया आज तो’ ऐसी अंदर से उपादेयबुद्धि हैं जो मिथ्यात्व हैं।

आचार्यकल्प पंडित टोडरमलजी कह रहे हैं कि ‘जब तक पूर्ण दशा न हो तब तक प्रशस्त रागरूप प्रवर्तन करो परन्तु श्रद्धान तो ऐसा रखो कि - यह भी बंध का कारण है - हेय है’ - इस कथन से वह हमें ऐसा कहना चाह रहे हैं कि श्रद्धान से तो सम्यक्पना धारण करो; श्रद्धा गुण का निर्मल परिणमन ही सम्यक्त्व हैं - मोक्षमहल की प्रथम सीढ़ी हैं। चारित्र तो मोक्षमार्ग में भूमिका अनुसार आंशिक-रूप से शुद्ध होता चला जाता हैं - जहा पर मोक्षार्थी को प्रशस्तराग में प्रवर्तन के भाव आये बिना रहते नहीं हैं - तो अपने चारित्र गुण की निर्बलता जानकार उनको करता हैं; पर आश्रय तो स्वभाव का ही लेता हैं; क्योंकि सुख तो वही से मिलेगा न! फिर श्रेणीमांडकर ११-१२ गुणस्थान प्रगट करके पूर्ण सुखी हो जाता हैं; १३-१४वे में अनंत सुखी और सिद्ध दशा में कृतकृत्य दशा को प्राप्त हो जाता हैं। इस प्रकार बीच की भूमिका में साधक जीव का शुभराग में प्रवर्तन देखा जाता हैं पर श्रद्धा एकदम सम्यक होती हैं।

इस प्रकार,

४था गुणस्थान - सच्ची श्रद्धा

११-१२वा गुणस्थान - पूर्ण वीतराग दशा (मोहनीय कर्म का उपशम/क्षय)

१३-१४वा गुणस्थान - अरिहंत दशा - अनंत सुख (४ घाति कर्म का क्षय)

गुणस्थानातीत - सिद्ध दशा (८ कर्म का क्षय - अव्याबाध सुख )