Question Set 3
1. प्रवेश एक सफल व्यापारी था और अपने हर कार्य को करने के पहले मंगलाचरण कर समझता था कि उससे कार्य निर्विघ्न पूरा होता ही है और ऐसा मंगल करना धर्म है। उसके भ्रम का निवारण कर मोक्षमार्ग प्रकाशक ग्रंथ में बताये मंगलाचरण करने का सार्थक प्रयोजन बतायें।
सुरेश: भाई इस साल के “best businessman of the year” का अवॉर्ड भी तुम्हे ही मिला, बहुत बहुत शुभकामनाएं! वैसे तुम्हारी इस सफलता का राज़ क्या हैं?
प्रवेश: धन्यवाद भाई। सच कहूँ तो ये तो णमोकार मंत्र में कुछ अलग ही शक्ति है! कोई भी काम करने से पहले मैं इसका पाठ करता हूँ और आज तक इसने मुझे कभी भी निराश नहीं किया हैं बताओ!
सुरेश: क्या तुम्हें पता भी हैं के णमोकार मन्त्र में कीन्हे नमस्कार किया हैं? उनका स्वरुप क्या हैं? ऐसा मंगलाचरण करने का प्रयोजन क्या हैं?
प्रवेश: नहीं सुरेश भाई, ये तो मेरे दादाजी ने मुझे बताया था इसलिए मैं ज़्यादा दिमाग लगाए बिना णमोकार पढ़ लेता हूँ। इसमें कहाँ कोई नुक्सान हो रहा हैं? फायदा ही तो हैं!
सुरेश: अरे भाई! सबसे बड़ा नुक्सान तो तुम्हारी इस विषय की अज्ञानता ही ह ैं। फायदा तो तुम्हारा बस एक भ्रम हैं। मंगलाचरण का अर्थ होता हैं के “जो पाप को गाले और सुख उत्पन्न करे”। पर सुख कोई सांसारिक भोग सामग्री वाला सुख नहीं हैं, अपितु इसको करने से जो क्रोध आदि कषाय का मंदपना हुआ, उससे उत्पन्न सुख की बात हैं।
प्रवेश: तो क्या मंगलाचरण करने से मेरा कार्य सफल नहीं होगा?!
सुरेश: मंगलाचरण ही जो सांसारिक “इच्छा” से करोगे तो यह तो वास्तव में मंगलाचरण हैं ही नहीं। क्योंकि इसमें तो बस आप ने जीभ से कुछ शब्द बोले और मन में तो क्रोधादि कषाय ही थे। तोता भी तो राम-राम बोलता हैं, उसमे कैसा आश्चर्य? मंगलाचरण से तो कषाय मंद होता हैं। ५ परमेष्ठी का स्मरण कर अपने आत्मा के स्वभाव का चिंतन होता हैं। कोई किसी का क्या करे! जो बाहर में नोट इकट्ठी हो रही हैं वह तो आप के आत्मा से अत्यंत भिन्न हैं; आपके कुछ शब्द या इच्छा आपकी इस बाहरी सफलता का कारण कैसे बन सक ती हैं?
प्रवेश: मैंने तो प्रत्यक्ष अनुभव किया हैं के काम अच्छा ही होता हैं!
सुरेश: भाई ये सब कर्म का खेल हैं। जो मंगलाचरण करने से कार्य सफल होने लगे तो फिर लोग “best manglacharan कर्त्ता” का अवॉर्ड न देते? ये सब बाहर की सफलताएँ तुम्हारे पुण्य कर्मों के आधीन हैं। इन सब में कर्तापन करके तुम्हारे लिए तुम बस एक भ्रमजाल ही गूँथ रहे हो। मंगलाचरण से काम अच्छे नहीं होते, मंगलाचरण ही अच्छा काम हैं!
प्रवेश: तो फिर क्यों सब लोग कोई भी अच्छे कार्य के पहले मंगलाचरण करते होंगे? क्या ये कुप्रथा हैं?
सुरेश: देखो, मंगलाचरण करने, ५ परमेष्ठी को नमस्कार करने से (उनके जैसी दशा प्राप्त करने के हेतु) से कषाय मंद होती हैं, उससे शांति का अनुभव होता हैं। इसलिए शुभ कार्य (जिसमें पापादि की तीव्रता न हो, मुख्यरूप से धार्मिक कार्य जैसे व्याख्यान, ग्रन्थ रचना, धार्मिक नाटक/कार्यक ्रम, यात्रा आदि) उनके पहले मंगलाचरण करने के पीछे यही भावना हैं के इससे मोह की मंदता रहे और कार्य निर्विघ्न संपन्न हो। पर कोई भोगादि की कांक्षा नहीं हैं क्योंकि कर्म के उदय अनुसार ही फल मिलता हैं। सांसारिक कार्यो (जैसे विवाह आदि) में भी मंगल लोग करते हैं, तो उसका उद्देश्य बस इष्ट को याद करने और अपने परिणामों में शान्ति लाना ही हैं; कोई कार्य उससे सफल हो जाता हैं ऐसा नहीं हैं।
प्रवेश: अच्छा अब मुझे मंगल का सही अर्थ ज्ञात हुआ! मैं तो बस णमोकारादि के पाठ को ही धर्म मानता था और उससे कार्य सिद्ध होता हैं ऐसा सोचता था। पर यह ५ परमेष्ठी का स्वरुप क्या हैं?
सुरेश: जो आत्मा परम पद में स्थित हैं वह परमेष्ठी हैं। इस जीव का एक मात्र प्रयोजन सुख पाना हैं; और सच्चा सुख (मोक्ष) कैसे प्राप्त हो उसका नाम मोक्षमार्ग हैं जिसको अरिहंत परमेष्ठी ने प्रकाशित किया हैं और सिद्ध परम ेष्ठी वह जीव हैं जिसने इस मोक्ष को प्राप्त किया हैं। आचार्य उपाध्याय और साधु परमेष्ठी इस मोक्षमार्ग पे चल रहे हैं।
प्रवेश: तो क्या मैं भी यह सुख को प्राप्त कर सकता हूँ?
सुरेश: हाँ बिलकुल! जैन धर्म इसी का तो नाम हैं। मंगलाचरण करने का प्रयोजन भी यही हैं; इन पांच परमेष्ठी का ध्यान करना, उनके स्वरुप का विचार करना और उनको देखकर अपना स्वरुप जानना। मोक्षमार्ग प्रकाशक ग्रन्थ के कर्ता प. टोडरमल जी उनके मंगल करने का प्रयोजन कहते हैं कि - “एक वीतराग-विशेषविज्ञान होने के अर्थी होकर अरिहंतादिकको नमस्कारादिरूप मंगल किया हैं”
प्रवेश: बहुत बहुत धन्यवाद भाई; अब मैं भी पांच परमेष्ठी का स्वरुप जानकर सच्चा मंगलाचरण करूँगा और इस मोक्षमार्ग में “प्रवेश” करके “सुरेश” होकर वास्तव में सफल हो जाऊंगा।
2. अविनाश को लगता था कि उसके १२ और १८ साल के बेटे क ो अभी सिर्फ़ पढ़ाई और कैरीअर पर फोकस करना चाहिये, मंदिर, पाठशाला या धार्मिक शिविरों में जाने के लिये सारी उम्र पड़ी है, ये सब फ़ालतू लोगों के काम हैं जो retirement के बाद भी कर सकते हैं। ‘जबलौं न रोग जरा गहै तबलौं झटिति निज हित करौ’ - इस तथ्य के आधार पर तत्त्वज्ञान प्राप्त करने की सही उम्र कौनसी है और क्यों - अपने शब्दों में समझाएँ।
प्रिय मित्र अविनाश,
सादर जय जिनेन्द्र। आशा हैं के तुम्हारे यहाँ सब कुशल मंगल हैं। तुम्हारा email मुझे कल ही inbox में मिला। जानकर बहुत ख़ुशी हुई के चेतन को अच्छी कॉलेज में admission मिल गया। अमन की भी अभी पढाई अच्छी चल रही हैं। वैसे, इस दिसंबर में ‘ढाई द्वीप जिनालय, इंदौर’ में CYF शिबिर आयोजित हुआ हैं - उसमे अपने दोनों बेटों को वहां धार्मिक संस्कार प्राप्त करने हेतु जरूर से भेजना। उन्हें बहुत कुछ सिखने समझने को मिलेगा।
मुझे पता हैं के तुम्हारे इस वि षय पर विचार थोड़े अलग हैं के “धार्मिक होने के लिए तो पूरा जीवन पड़ा हैं; अभी career बनाने का वक्त हैं।” इस विषय पर मैं अपनी बात रखना चाहता हूँ।
देखो, मैं अच्छी तरह जानता हूँ के आज के भौतिकवादी युग में education और career का बच्चों और उनके माँ-बाप पर बहुत pressure रहता हैं। और उस क्षेत्र में सफलता के लिए परिश्रम भी उतना ही जरूरी हैं। पर हमें इन लौकिक बातों के साथ-साथ ये नहीं भूलना चाहिए के सच्चा सुख तो अलौकिक दुनिया में ही हैं; अर्थात धर्म मार्ग में ही हैं।
जीव जब धर्म में लगता हैं तो कितने ही पापों से स्वयमेव ही बच जाता हैं। मद्यपान आज के युवकों में एक कु-trend सा हो गया हैं; मांस भक्षण, अभक्ष्य और अन्य addictive पदार्थ की लत लगते देर कहाँ लगती हैं। जो मंदिरादि कार्यो में जुड़े होंगे तो अपने जैसे अच्छे साधर्मी मित्रों से संपर्क होगा। शिबिर में जायेंगे तो अनेक धर्म के रहस्यों को जानेंगे। बाहर अन्य पाप में ग्र स्त सांगत मिलने पर खोटे मार्ग पर लग जाना कहाँ मुश्किल हैं? सच ही हैं, युवान अवस्था में ही व्यक्ति अपने जीवन की दिशा निर्धारित कर सकने में सक्षम होता हैं।
धर्म तो एक ऐसी ढाल हैं जिससे बाहर चल रहे पाप की सेना से अपने आप को सुरक्षित किया जा सकता हैं। और इसकी सबसे ज़्यादा जरूरत युवानी में ही पड़ती हैं। जो धर्म के संस्कार इस उम्र में डाले जाए तो आत्मकल्याण के लिए इस समय से अधिक उत्तम समय कौनसा हो सकता हैं? धर्म कोई retirement प्लान नहीं हैं, बल्कि retirement की उम्र के लिए युवानी में किया गया investment हैं। संसार में सुख नहीं हैं - ये बात तो हमें अनुभव से पता लगती हैं। पर सुख कहाँ हैं उसकी परिक्षाप्रधानी बनकर खोज और उसके सम्बन्धी तर्कादि करने में यह युवान अवस्था सबसे श्रेष्ठ हैं। न रोग हैं शरीर में, न ही शक्तिहीनता हैं और न ही प्रमाद हैं। इस तेज को बस पैसे-करियर आदि में गंवाना कहाँ की बुद्धिमानी हैं? पर हाँ, इस तेज को जो आत्मा में लगाए तो तेजस्वी जरूर हुआ जा सकता हैं।
पंडित टोडरमल जी का युवान अवस्था में धर्म करने की प्रेरणारूप गन्ने का प्रसिद्ध उदहारण तो हमने प्रवचन आदि में सुना ही हैं न? गन्ने का सिर्फ बीच का हिस्सा काम का होता हैं, ऊपर और निचे के भाग एक प्रकार से व्यर्थ ही हैं। जो इस बीच के हिस्से को जमीन बोया जाए तो अनेक गन्ने उत्पन्न हो सकते हैं। इस प्रकार बाल अवस्था और बुढ़ापा तो व्यर्थ ही रहे, पर जो कोई सयाना व्यक्ति युवानी में धर्म के बीज बोये तो मोक्ष का फल अवश्य प्राप्त कर सकता हैं।
छह-ढाला में भी प. दौलतराम जी कहते हैं न कि - “बालपने में ज्ञान न लह्यो, तरुण समय तरुणीरत रह्यो, अर्धमृतकसम बुढ़ापनो कैसे रूप लखे आपनो”
आगे जाके सम्यक्त की प्रेरणा देते हुए कहते हैं के - “दौल समझ सुन चेत सयाने काल वृथा मत खोवे, यह नरभव फिर मिलन कठिन हैं जो सम्यक नहीं होव े” कहकर समझाया के काल को व्यर्थ गंवाना ठीक नहीं हैं। शायद इसीलिए सम्राट चंद्रगुप्त ने जो १६ अशुभ स्वप्न देखे थे उसमे एक स्वप्न “२ युवा बैल धर्म का रथ खिंच रहे हैं” उसका फल पंचम काल में धर्म का रथ युवा ही खिंचेंगे और धर्म (संयम, मुनिदशा) धारण करेंगे।
यह मनुष्य भव दुर्लभ हैं। जिनवाणी के वचन सुनने मिलना तो महा दुर्लभ हैं।
कहा भी हैं न - यह मानुष-परजाय, सुकुल सुनिवो जिन-वानी। इह विधि गये न मिलैं,सुमणि ज्यों उदधि समानी ||
अंत में उपदेश देते हैं के - ‘जबलौं न रोग जरा गहै तबलौं झटिति निज हित करौ’ अर्थात जब तक रोग और बुढ़ापा न आ जावे तब तक फटाफट से अपना हित कर लेना चाहिए। क्योंकि रोग में इस जीव का चाहते हुए भी पीड़ा के कारण आत्मा में उपयोग नहीं लगता; लक्ष्य शरीर में ही रहता हैं। बुढ़ापे में इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं, तेज कम हो जाता हैं, रोगादि होने से मन नहीं लगता, बहुत साड़ी पूर्व ग्रंथि बन गयी होती हैं - तो इस समय में नया कुछ धर्म का सीखना और उसको अपनाना बहुत कठिन होता हैं। इसलिए तो - ‘निज हित’ में कौन बुद्धिमान पुरुष देरी करता हैं?
विचित्रता यह हैं के बालक युवान होना चाहता हैं, युवा युवानी में मस्त हैं और साथ-साथ युवानी की जिम्मेदारी से त्रस्त भी हैं - बस समय काट रहा हैं और बूढ़ा व्यक्ति रोगादि से पीड़ित फिरसे एक बालक बनना चाहता हैं। बात ये हैं के इस पार या उस पार, सुख तो कही नहीं हैं। बात यह हैं के वास्तव में हितरूप क्या हैं उसकी सच्ची जानकारी नहीं हैं। ‘आतम को हित हैं सुख सो सुख आकुलता बिन होई’ अर्थात इस जीव के लिए निराकुल सुख ही हितकारी हैं। और यह सिर्फ और सिर्फ धर्म ही इस जीव को प्राप्त करवाने में समर्थ हैं।
सूक्ष्म स्तर पर विचार करने पर यह ज्ञात होता हैं कि धर्म करने लिए कोई भी एक समय उत्तम नहीं हैं; अर्थात हर एक समय ही उत्तम समय ह ैं। क्योंकि अनादि-अनंत आत्मा की कोई उम्र नहीं हैं, यह तो शरीर की उम्र हैं और उसकी बाहरी स्थिति अनुसार कथन होता हैं। इस मनुष्य पर्याय की आयु का क्या ठिकाना हैं? रोग कब आ जाये किसे पता हैं? ऐसा तो हैं नहीं के सिर्फ बुढ़ापे में ही मृत्यु या रोग आता हैं, पाप का उदय तो कभी भी आ सकता हैं। पैसा करियर आदि तो पुण्य के आधीन हैं, उनमे कहाँ हमारी चलती हैं? और न ही वे सुख के साधन हैं। इसलिए धर्म मार्ग में लगना और लगाना श्रेष्ठ हैं।
इसी बात से मैं अपनी बात को विराम दूंगा। आशा हैं के मेरी बात पर तुम अच्छे से विचार करोगे, अपने आत्मकल्याण को priortize करोगे; और चेतन और अमन को भी इसी मार्ग में आगे बढ़ने में प्रेरित करोगे। तुम्हारे reply की प्रतीक्षा रहेगी। जय जिनेन्द्र।
तुम्हारा साधर्मी मित्र,
सोहम
3. "संयोग है सर्वत्र पर साथी नहीं संसार में, संयोग की आराधना संसार का आधार है, एकत्व की आराधना आराधना का सार है" – इन तीन तथ्यों के आधार पर स्वयं के जीवन से एक-एक उदाहरण प्रस्तुत करें।
१. संयोग है सर्वत्र पर साथी नहीं संसार में
संयोग का सरल शब्दों में अर्थ यह हैं के कुछ द्रव्यों का किसी विशिष्ट समय पर किसी विशिष्ट क्षेत्र में एक दूसरे के कुछ विशिष्ट कार्य में निमित्त बनना। यह जीव इन सभी संयोगों को उन कार्यो को कर्ता मान लेता हैं और उनसे अपनत्व कर बैठता हैं। बल्कि संयोगो का स्वरुप ही क्षणभंगुरता हैं। संयोग; क्योंकि वह परद्रव्य हैं - कभी सहयोग करने में समक्ष नहीं होते हैं। इनको साथी मानना ही इस जीव की भूल हैं! बोलने में तो लोग बोल देते हैं के हम जनम जनम के साथी हैं; पर कोई इन्हे बताये के आगे के भव में तुम्हारा साथी नरक जायेगा; तो क्या फिर भी उसका साथ चाहोगे? ये जीव वास्तव में सहयोग नहीं सुख चाहता हैं।
इसमें परीक्षा का दृष्टांत ले सकते हैं। भले ही परीक्षा हॉल में १० ० विद्यार्थी परीक्षा देते हो, पर वे आसपास घिरे होने पर भी सहयोग करने में समर्थ नहीं हैं। उनसे आशा करना के वे नित्य रहे, शरण दे आदि सब व्यर्थ हैं। जो सहयोग कर ही नहीं सकता उससे आशा बनाये बैठना मूर्खता नहीं तो और क्या हैं? इसलिए समझदार विद्यार्थी ये भलीभांति जानते हैं के उनके स्वयं से अन्य कोई भी इस परीक्षा लिखने में समर्थ नहीं हैं, अन्य कोई भी साथी नहीं हैं। संयोग तो हैं, पर सहयोग नहीं।
आज तक मैंने कितने सारे पकवान खाये, पर आज तक कोई भी साथ नहीं हैं। सब के सब संयोगरूप थे और नाश को पा गए। हम आशा लगाए बैठे थे के ये मेरा सहयोग करेंगे पर वे दे गए तो बस और क्षुधावेदना, रोग और आकुलता।
इसलिए ठीक ही हैं, संयोग + सहयोग = साथ - जो सिर्फ अपना निज त्रिकालीध्रुव शुद्धात्मा ही एकमात्र हैं।
२. संयोग की आराधना संसार का आधार है
इस संसार किस आधार पर टिका हुआ हैं? जैन धर्म कहता हैं के तुम्हारे सं सार का आधार मोह हैं। मोह अर्थात मिथ्यात्व अज्ञान असंयम द्वारा आत्मा की विराधना - दूसरे शब्दों में संयोगों की आराधना में व्यस्त रहना। मोह के नाश से ही मोक्ष हैं और मोह ही महिमा ही संसार हैं।
आराधना अर्थात महिमा। अब कुछ दृष्टांत देखते हैं। जब तक पैसे कमाने की चाह हैं तब तक संसार हैं। जब तक बड़ा बंगला, बड़ी गाडी, बड़ा नाम, बड़ा कारोबार आदि की महिमा हैं तब तक संसार जीवित हैं। किसी के परिग्रह को देखकर उसकी महिमा आने लगती हैं - इसमें सुखबुद्धि होना ही संसार का कारण हैं। मेरा घर मंदिर से नजदीक हो, कोई रोग न सताए, मेरे भाई की अच्छी जॉब लग जाए, निर्विघ्न से यह काम हो जाए, मेरा वजन इतना बढ़ जाए, मुझे ये व्यक्ति सहाय कर दे, मेरे सभी काम में परिवार मेरा साथ दे आदि कितने ही ऐसे भाव हम करते हैं। इतना ही नहीं, दया, दान, पूजा आदि शुभ भावो में भी जब तक आसक्ति हैं, उन कार्यो ही महिमा हैं त ब तक संसार हैं। इनके पीछे का कारण खोटी मान्यता ही हैं।
सचमे देखा जाए तो जब तक आत्मा की आराधना नहीं हैं तब तक निश्चय से संयोगों की आराधना होगी ही।
३. एकत्व की आराधना आराधना का सार है
संसार की आराधना न करके फिर किसकी आराधना करनी चाहिए? सर्व आराधना का सार क्या हैं, अर्थात सारभूत क्या हैं? कहते हैं के एकत्व ही सारभूत हैं। क्यों? क्योंकि एकत्व ही आत्मा (और सभी द्रव्यों) का स्वभाव हैं। एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का कुछ नहीं कर सकता हैं यह निश्चय हैं। इसलिए निज शुद्धात्मा की आराधना को सर्व आराधना का सार कहा हैं। आराधना पाठ में ५ परमेष्ठी, जिनवाणी, दसलक्षण धर्म, व्रत, तीर्थ, कल्याणक आदि की आराधना की भावना व्यक्त की हैं, पर इस पाठ का सार देखने जाए तो बस एक आत्मा को प्राप्त करना ही हैं। इस प्रकार करनेयोग्य कार्य आत्मा की, एकत्व की आराधना ही हैं।
एक त्व कोई दुखदायी नहीं हैं। जब मैं किसी विवाह आदि के प्रसंग में जाता हूँ और मेरे कोई पहचानने वाले नहीं होते तो बहुत अकेला महसूस होता हैं। बहुत बार ऐसा भी होता हैं के मैं अकेला रात्रि में नहीं भोजन करता तो फिर अकेले ही चौविहार करना पड़ता हैं। यह मान्यता अंदर अंदर छिपी हैं के अकेलापन यानि आकुलता या दुःख; पर वास्तव में स्वभाव का ज्ञान हो तो अकेलापन सुख का सूचक हैं।
एकत्व ही सार हैं। “Wrong is wrong, even if everyone is doing it. Right is right, even if no one is doing it” अर्थात कोई सत्य को स्वीकारे के न स्वीकारे, अनुसरण करे या न करे; साँच को आंच नहीं! जैन होने से जितने भी मित्र आदि के साथ कही भोजन का प्रसंग होता हैं तो कंदमूल का ग्रहण कभी नहीं करता हूँ। न ही मदिरा, मांस का विचार आता हैं। न ही अन्य व्यसनों का सेवन करने का स्वप्न में भी सोचा हैं। इसमें कोई बड़ी बात नहीं हैं, न ही इसमें कोई आकुलता हैं, सहज ही होता हैं। यह हैं सत्य बात को स्वीकारने की शक्ति। हिंसा में दोष दीखता हैं इसलिए अभक्ष्य का त्याग बहुत सहज ही हैं। वैसे ही क्या हमे संयोगों की आराधना में दोष नहीं दीखता? जब विचार-विमर्श करके “एकत्व ही सार हैं” इस सत्य बात को स्वीकारेंगे तब सहज ही पर से ममत्व टूट जायेगा और एकत्व भावना भावरूप प्रगट हो जाएगी।