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Question Set 4

Q. 1

दुःख का लक्षण आकुलता है। अनाकुलता का नाम सुख है। वर्तमान में मिथ्यात्व गुणस्थान होने से ये निश्चित है कि दिवस रात पर्याय में बस दुःख का ही वेदन हो रहा है; भले ही वह दुःख दुःख लगे कि सुखाभास लगे। आकुलता इच्छा से होती है।

इच्छा अपितु होती तो मोहनीय कर्म के निमित्त से ही पर यहाँ अन्य कर्म के उदय की अपेक्षा से भी विचार किया गया है। इच्छा ४ प्रकार की कही गयी हैं -

१. विषयग्रहण की इच्छा

मोह का उदय हो और ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्म का उदय भी तीव्र हो जिससे जो विषय जानना-देखना इच्छे वह न बने तो यह जीव दुःखी होता है।

निरंतर प्रतिसमय ऐसी इच्छा का सद्भाव होता ही है। उसके मेरे जीवन से कुछ उदाहरण -

१. कोई सस्पेंस फिल्म देख रहे होते है तब निरंतर अव्यक्त को जानने की इच्छा होती है। कोई नया गीत आया होता है तो उसे सुनने की इच्छा होती रहती है।

२. तीन लोक के सम्बन्धी जैन धर्म में जो चर्चा है वह भौतिकवादीओ से बहुत अलग है। तो सूर्य-चंद्र आदि की व्यवस्था सच में कैसी होगी, साइंस कहाँ गलत है, कैसे गलत है; मैं इस जैन भूगोल की बात को कैसे अपने साधर्मिओं को बताऊ-समझाऊँ - इस विषय पर बहुत ही विकल्प चलते है।

२. कषायभाव के अनुसार कार्य करने की इच्छा

चारित्रमोह के उदय से जिस कषाय का उदय हो उस ही रूप प्रवर्तन करने की इच्छा इससे होती है। जैसे -

१. कोई वस्तु मेरे अनुसार न बने, तब मुझे उसे अपने मिथ्यात्व के कारण मेरे अनुसार परिणमाने की इच्छा होती है। वह नहीं हो और तब क्रोध का उदय हो उस समय क्रोध वश होकर दूसरे जीवो को मन-वचन-काय से भला बुरा करने की इच्छा, स्वयं को नकारात्मकरूप से दोष देने की इच्छा, पानी पीकर शांत होने की इच्छा, किसी मित्र को अपनी बात कहकर हल्का होने की इच्छा, आदि आदि क्रोध के उदय काल में उत्पन्न होती प्रत्यक्ष देखि है

२. मुझे कोई मिठान्न विशेष पसंद हो और उसे खाते समय जो लोभ कषाय का उदय तो उसे और स्वाद लेकर खाने की इच्छा, कोई विघ्न / रोक टोक न आवे ऐसी इच्छा, वह मिष्ठान्न मिलता रहे वैसी इच्छा, उसे खाने पर शरीर भी बीमार न पड़े ऐसी इच्छा, उसे खाने योग्य सामग्री चम्मच, थाली आदि अनुरूप ग्रहण होते रहे ऐसी इच्छा आदि

३. अनिष्ट संयोग दूर करने की इच्छा - पाप का उदय

मिथ्याभाव सहित वेदनीय, नाम, गोत्र, अंतराय आदि का जब पाप उदय हो तो जीव को जो अनिष्ट का संयोग होते है और उन्हें दूर करने की चेष्टा होती है। पाप का उदय चला जाय यह ही वास्तव में सबसे बड़ा पाप है!

१.  योगा / व्यायाम करते समय कोई एक आसान में शरीर को टिकाना होता है। थोड़े समय के बाद शरीर के अंगों में दर्द शुरू हो जाता है। उस समय निरंतर वह दर्द से मुक्ति जल्दी से जल्दी हो जाए (अर्थात वह १५ सेकंड का समय जल्दी पूरा हो जाए) उसकी तीव्र इच्छा होती है। इसे पाप के उदय में इसलिए रखा क्योंकि शरीर का हीन संस्थान होने से ऐसे दर्द होते है। वहाँ के शिक्षक कहते हैं कि यह दर्द आपके लिए अच्छा है। पर वास्तव में सोचा जाय तो दुःख मेरे स्वभाव से विपरीत है वह कैसे अच्छा हो सकता है?

२. ठण्ड के मौसम में जब सर्दी लग जाती है तब नाक बहने लगता है। उस समय भी मैं सर्व प्रकार से प्रयत्न में जुट जाता हूँ कि यह झुकाम कैसे ठीक हो! दवाई लेना, नास लेना आदि की इच्छा इस पाप के उदय को दूर करने के लिए की जाती है।

३. थोड़े दिन पहले की बात है। एक दिन पता नहीं (मेरे पाप उदय के कारण) मेरे साथ सब कुछ ही जैसा चाहा उससे विपरीत हुआ। सब कुछ ही अनिष्ट हुआ। तब दिन के अंत में मैंने ऐसा सोचा कि आखिर यह दिन पूरा हुआ; अब कोई दुःख नहीं - शान्ति से सो जाऊंगा। उस समय अंतर की आवाज ने मुझे जगाया कि दुःख मुझे अनिष्ट का नहीं इच्छा का था; और सोने से शांति नहीं मिलेगी!

४. इष्ट संयोगों को भोगने की इच्छा - पुण्य का उदय

मिथ्याभाव सहित वेदनीय, नाम, गोत्र, अंतराय आदि का जब पुण्य उदय हो तो जीव को जो इष्ट का संयोग होते है और उन्हें पास रखने की, भोगने की चेष्टा होती है। पुण्य का उदय कभी चला न जाय यह ही वास्तव में सबसे बड़ा पुण्य को क्षीण करने वाला पाप है!

१. मेरे पास नेटफ्लिक्स का सब्सक्रिप्शन है। पुण्य का उदय है कि मेरे पास वह है। पर इस बाह्य निमित्त के वश होकर मैं व्यर्थ में इसे भोगने की इच्छा करता रहता हूँ। जब भोग पाता हूँ तब तो मैं पाप करता ही हूँ पर जब व्यस्त होने के कारण नहीं भोग पाता तब नहीं भोग पाने के दुःख में भोग पाने की अनंत इच्छा करके व्याकुलित भी होता हूँ!

२. पुण्य के उदय से प्राप्त गाडी, घर, फोन, परिवार आदि सारी वस्तुओं में मैं अपनत्व, ममत्व करके भवरें के माफिक एक के बाद एक भ्रमण करता हूँ पर फिर भी तृप्ति नहीं मिलती। सुबह से लेकर रात्रि तक जो भी पांच इन्द्रिय के विषय है उन्हें भोगने की इच्छा करता हूँ और पाप बांधता हूँ।

ध्यान देने वाली बात - पुण्य के उदय में प्राप्त विषय में रमे से तो जीव महा पाप बांधता है; और जो महा पुण्य से प्राप्त जिनमंदिर आदि है उनकी अवगणना करके भी महा पाप बांधता है। कदाचित धर्म क्रिया करे तो भी दिन में सिर्फ १५-२० मिनट करता है और वह भी सांसारिक विकल्पों के बोझ सहित। सच में, जीव के भविष्य को कहने के लिए कोई भविष्यवेत्ता की जरूरत नहीं; उसकी दिनचर्या ही सब कुछ कह जाती है।

Q. 2

मध्य रात्रि का समय था। तेज बारिश हो रही थी। झंडू अपने कमरे में सो रहा था। अचानक से घर के दरवाज़े को कोई ज़ोर-ज़ोर से खटका रहा हो ऐसी आवाज आयी। बेचैनी और अधिरेपने से भरे उस दस्तक को सुनकर झंडू एकदम से जाग गया। भयभीत होकर उसने मुख्य किवाड़ की ओर धीरे से अपने कदम बढ़ाये। खिड़की से देखा तो एक भैंसा दिख रहा था। उसके बाजु में एक लम्बा-चौड़ा सा आदमी भी था जो वर्षा के आवरण में धुंधला से दिख रहा था।

“जरूर ही यह दूधवाले रामु भाई होंगे! मैं व्यर्थ ही परेशान हो रहा था।” - ऐसा सोचकर झंडू ने घर के द्वार खोले तो उसने जो दृश्य देखा उससे वह भयकारी आश्चर्य में पड़ गया!

झंडू (कापंते हाथ जोड़ कर) - आ…आप? य… यहाँ?

(झंडू उसे देखकर रोने लगता है। आँख से तो दुःख जल निकल ही रहा था, पर उसके साथ उसके कपाल से भी तनाव का जल बहने लगा।)

झंडू (हाथ जोड़ कर) - हे महाराज! क्या मेरा अंतिम समय आ गया हैं? आन था यह तो पता था पर इतनी जल्दी आ जायेगा? मुझे जीना है! मुझे आपके पास मत ले चलो! मैं हाथ जोड़कर आपसे विनती करता हूँ! (पीछे हटते हुए) आप जो कहोगे मैं वह करने को तैयार हूँ!

(भैंसे पर सवार, श्याम वर्ण, मुकुट, अनेक शस्त्र आदि चिन्हों से लक्षित वह व्यक्ति और कोई नहीं मृत्यु का देवता - “यमराज” (काल्पनिक) ही था)

यमराज - हा हा हा! आज मैं यहाँ तुम्हें लेने नहीं आया हूँ। बल्कि “मुझे तुम्हे कभी लेने न आना पड़े” ऐसी विधि बताने आया हूँ। माँ सरस्वती ने मुझे कहा कि तुम्हे मेरे बारे में अनेक मिथ्या-कल्पना हो गयी है? मेरे से तुम अत्यंत भयभीत हो गए हो? उन्होंने ही मुझे तुम्हारे पास भेजा है।

झंडू - पर महाराज! आप से कौन नहीं डरता? बड़े-बड़े शूरवीर योद्धा भी अंत समय में आपके सामने हार मान ही लेते है! मैं भी उन्हीमें से हूँ। मैं भी मृत्यु से भयभीत रहता हूँ।

यमराज - मैं तो अपने समय में ही जीव को शरीर से अलग करने ही जाता हूँ। मेरे पास तो उसकी सुव्यवस्थित सूचि है। तो तुम क्यों आकुलित हो रहे हो? हे वत्स, थोड़ा विस्तार से बताओ!

झंडू - पास में जो जंगल है न; वह बहुत ही भयानक है। मेरे खेत से वापस आने का रास्ता उस ही के पास से गुज़रता है। कई बार मैंने वहाँ से जंगली प्राणीओं की आवाज सुनी है।

जिनमंदिर में जिनमुखोद्भूत सरस्वती देवी माँ द्वारा कही “क्रमबद्ध पर्याय” की बात सुनकर थोड़ी शान्ति मिली थी। पर कल ही तत्वार्थसूत्र जी के स्वाध्याय में अकाल-मरण की चर्चा सुनकर भय लौट आया है। आप अकाल में आ जाते हो न?

यमराज - हे मृत्युंजय-स्वभावी! मेरे लिए अकाल क्या और काल क्या? जिस द्रव्य का, जिस क्षेत्र में, जिस समय पे, जैसा होना है सो निश्चित ही है - केवलज्ञान में प्रत्यक्ष झलक रहा है। तीनों काल की सर्व पर्याय खचित है!

(लिस्ट दिखाते हुए) और इसीलिए तो मेरा काम बहुत ही निराकुलतामय है। अनादि से अनंत काल तक के सारे जीवों की मृत्यु के समयों की सूचि मेरे पास है। मेरा दैनिक कार्यक्रम एकदम सुनिश्चित रहता है।

झंडू (स्मित सहित विचार करते हुए) - जो आप योग्य काल में ही आते हो - अर्थात मृत्यु अपने समय में ही होता है; तो फिर मैंने जो अकाल मरण की बात सुनी थी उसका सच्चा अर्थ क्या था?

(माँ जिनवाणी वहाँ प्रगट होती है। झंडू और यमराज दोनों उन्हें आनंदित होकर नमन करते है)

माँ जिनवाणी - हे ****पुत्र, अकाल मृत्यु का अर्थ “असमय में मरण होना” ऐसा नहीं है। जो ऐसा होता तो फिर “असमय में जन्म”, “असमय में युवानी” आदि क्रियाये होनी चाहिए, जो नहीं होती। अकाल मृत्यु का सम्बन्ध आयुकर्म के अपकर्षण से है, वास्तविकता से नहीं।

झंडू - ये अपकर्षण क्या होता है?

माँ जिनवाणी - पहले तो यह समझना पड़ेगा कि -

आयुष्य २ प्रकार का होता है

१. भुजयमान - जो वर्तमान में भोगा जा रहा हो

२. बध्यमान - जो इस भव में बंध कर अगले भव में भोगा जायेगा

अपकर्षण का अर्थ - पहिले बांधी हुए कर्म की स्थिति का घट जाना अपकर्षण है।

तत्त्वार्थसूत्र जी में कहा है -

औपपादिकाचरमोत्तमदेहासंख्येयवर्षायुषोऽनपवर्त्यायुषः ॥53॥

औपपादिक देहवाले देव व नारकी, चरमोत्तम देहवाले अर्थात् वर्तमान भव से मोक्ष जानेवाले, भोग भूमियाँ तिर्यंच व मनुष्य अनपवर्ती आयु वाले होते हैं। अर्थात् उनकी अपमृत्यु नहीं होती।

इसका अर्थ ये होता है कि -

बध्यमान आयु में अपकर्षण सभी जीवों का हो सकता है;

पर भुज्यमान आयु का अपकर्षण सिर्फ कुछ जीवों का होता है और कुछ का नहीं (ऊपर बताये अनुसार)।

अकाल मृत्यु बस इसीलिए कहा जाता हैं कि जितनी स्थिति बाँधी थी; अपकर्षण के कारण स्थिति के घट जाने से कर्म अपेक्षा से पूर्व निर्धारित समय से पहले मृत्यु हो गया। वास्तविकपने से मृत्यु जिस समय होना था उस ही समय हुआ; और उसके अनुसार ही आयु कर्म में अपकर्षण आदि हुआ। और तो और विषभक्षण आदि बाह्य कारण भी मृत्यु होनी थी इसलिए उपस्थित हुए।

यमराज - सही बात! मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मुझे जीव को मरणशैया से लेने जाना है या बाघ के मुँह में से! न मुझे इस बात से कोई मतलब है कि कर्म परमाणुओं की क्या स्थिति हुई! मैं तो बस एक सत्य हूँ; संसारी मिथ्यादृष्टि विषयासक्त जीवो के अहंकार को चूर्ण करने वाला एकमात्र सत्य। परिग्रही मुर्खजन को एक साथ सब छूट जाने के अहसास को देनेवाला एकमात्र सत्य। लोग मुझे “कटु” कहते है; पर “कटुता” मेरे में नहीं उनकी चेष्टा में है।

झंडू (हाथ जोड़ कर) - हे स्याद्वादी माँ! मेरा अकाल मृत्यु के विषय में जो भ्रम था सो दूर हो गया है! ****अब समझ में आया कि अकाल में ‘अ’ का अर्थ “काल से अन्य किसी दूसरे कारण की मुख्यता से हुआ हो वैसा मरण” है! जैसे पर्वत से गिर जाना, शेर द्वारा खा जाना आदि अकाल मरण है और कोई बूढ़े व्यक्ति की मृत्यु शांत परिणाम से हो जाये तो वह काल के प्रताप से हुआ ऐसा कहा जाता है।

ऐसी मृत्यु नामक क्रिया होने में कौन-कौन से कारण होते है?

माँ जिनवाणी - हे भव्य! सिर्फ मृत्यु का ही नहीं; कोई भी कार्य होने में ५ कारण की उपस्थिति नियम से होते है - जिसे शास्त्रीय भाषा में “समवाय” कहा जाता है। जो इसे मृत्यु पर घटाए तो -

१. स्वभाव - मरण पुद्गल का नहीं, आकाश का नहीं; जीव का होता है। उसमे भी मुक्त जीव का नहीं सिर्फ संसार जीव का होता है।

२. निमित्त - आयु कर्म, रोग, विषभक्षण आदि

३. पुरुषार्थ - जीव की उस समय की पर्याय ही उसका पुरुषार्थ है। संक्लेश परिणाम सहित हो तो मिथ्या पुरुषार्थ और जो स्वभाव सन्मुख दृष्टि हो तो सम्यक पुरुषार्थ।

४. काल लब्धि - जिस समय में मरण नामक कार्य हुआ वह

५. भवितव्यता - मृत्यु नामक कार्य होने की योग्यता / होनहार

झंडू - इतने सारे कारण को एक साथ कौन लाता है?

माँ जिनवाणी - जब कार्य होता है, ये पांचो समवाय स्वयं ही उपस्थित होते ही है। कोई इन्हे खिंच कर लाता नहीं है। यही तो वस्तु का अद्भुत स्वरुप है!

झंडू - अहो! कैसा अलौकिक हैं यह वस्तु तत्त्व का स्वरुप! फिर भी, मुझे एक प्रश्न है। जो सब पर्याये क्रमनियमित है तो फिर मुझे पुरुषार्थ क्या करना होगा?

माँ जिनवाणी - हे ध्रुव! जैसे तुम द्रव्य और गुण से अचल हो वैसे ही एक समय की पर्याय से भी अचल हो! तुम अपनी पर्यायो के कर्ता तो हो पर फेरफार कर्ता नहीं हो! ऐसे क्रमबद्ध पर्याय का सम्यक निर्णय करना ही वास्तव में पुरुषार्थ है। कुछ करने का विकल्प ही तुम्हे स्वभाव से दूर रख रहा है। इसलिए एकदम निर्भार हो जाओ और अपने को ज्ञाता-दृष्टा मात्र देखो!

झंडू (जिनवाणी माँ को नमन करके यमराज को कहता है) - हे यमराज! आपका बहुत बहुत धन्यवाद! अब मैं आपसे बिलकुल भी भयभीत नहीं हूँ!

यमराज - हे अजर-अमर! मेरे से वही डरते हैं जो अपराध करते है। नहीं तो मुझे (मृत्यु) निरपराधी ज्ञानी जीव अपना मित्र क्यों कहते? उनके तो परम समाधी रत्न के सामने मैं अपना मुकुट उनके चरणों में नतमस्तक पूर्वक अर्पित करता हूँ। आखिर मृत्यु के देवता को एक शाश्वत ज्ञायक के अलावा कौन झुका सकता है!

आप अब मुझसे नहीं डरते, यह सुनकर आनंद हुआ। हमारी कभी भी मुलाकात न हो ऐसी मंगल भावना से मैं अब आगे बढ़ता हूँ!

(यमराज अपने भैंसे पर बैठकर आकाशमार्ग में अदृश्य हो जाता है)

झंडू (बार बार नमन करते हुए)- हे द्वादशांगी माता! आपकी महिमा सचमे अपरमपार है! मुझे मेरे अकर्ता स्वरुप की सम्यक प्रतीति हो गयी हैं! अब मैं आपके द्वारा बताये मुक्ति के मार्ग पर चलने में पूर्ण रूप से निशंकित हो गया हूँ! मैं सर्व प्रकार से निर्भय हो गया हूँ। जिनवाणी माता की जय हो! जिनवाणी माता की जय हो!

(जिनवाणी माँ आशीर्वाद देकर अदृश्य हो जाती है)

उतने में, मिथ्यात्वरुपी विभावरी बीतने पर झंडू ज्ञानरूपी सूर्योदय का अवलोकन करता है।

तत्त्वज्ञानरुपी झरने और मुक्त पक्षिओं ने अपनी ध्वनि द्वारा यह दृश्य का वर्णन कुछ इस प्रकार किया -

“है ज्ञान-सूर्य का उदय जहां, मंगल प्रभात कहलाता है।

मिथ्यात्व महातम हो विनष्ट, सम्यक्त्व कमल विकसाता है।”

  • मंगल प्रभात, ब्र. प. रविंद्र जी आत्मन

Q. 3

प्रस्तुत है एक विवाद-गोष्टी “भौतिकवादी साइंटिस्ट” और “जैन दार्शनिक” के बीच में।

भौतिकवादी साइंटिस्ट -

हम तो वैसे उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी जैसा कुछ मानते ही नहीं पर आपके लिए कह देते है - यह काल निश्चय से उत्सर्पिणी ही है। कौन मुर्ख होगा जो कहेगा कि यह ह्रास का काल है? अरे! अभी तो यह विकास की शुरुआत है। आगे-आगे देखो क्या होता है! दुनिया चाँद पर पहुँच गयी हैं और आप लोग अभी तक ये पुरानी किताबों में ही अटके हो?

देखो, हम मानते हैं कि पेट्रोल-डीजल से वातावरण निरंतर तो बिगड़ रहा है। जल, वायु आदि प्राकृतिक तत्त्व विकृत होते जा रहे है। रिसर्च स्वयं कह रही हैं कि जो ऐसे चलता रहा तो २०५० तक ये दुनिया जीने लायक ही नहीं रहेगी। समंदर में से सारी मछलियाँ गायब हो जाएगी। मनुष्यों की शारीरिक शक्ति और स्वास्थ्य भी काफी कमजोर हो गया है। पर इसके सामने आज एक जगह से दूसरी जगह जाना कितना आसान हो गया है! दुनिया कितनी तेज़ हो गयी है! और हम अभी इलेक्ट्रिक की ओर बढ़ रहे हैना! और दूसरा सब तो होता रहेगा; आप सकारात्मक बनिए न!

देखो, हम मानते है कि कम्यूटर-इंटरनेट के आने से शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के रोग बढ़ रहे है। डिप्रेशन, एंग्जायटी की गोलियां आज आम हो गयी है। बुद्धि कमजोर हो गयी है। व्यसन बढ़ गए है। अयोग्य और बिभत्स वस्तुएँ आज लोगों की हथेली में है। पाप और जुर्म बढ़ रहे है। वास्तविक रिश्ते आज इतने प्रेमभरे नहीं रहे। जूठ को फैलाना बहुत आसान हो गया है। सच्ची बात परखना और मुश्किल होता जा रहा है। पर इसके सामने आज जो मांगो वह पढ़ना-जानना चाहो आपके हाथों में है! जिससे बात करना चाहो कर सकते हो। और दूसरा सब तो होता रहेगा; आप सकारात्मक बनिए न!

देखो, हम मानते है कि AI एक खतरनाक वस्तु है, जो एक मानव को नहीं पूरी मानवजाति को नष्ट करने में समर्थ है। आज AI आपकी फोटो, आवाज, बर्ताव, आदतें, सोच सब कुछ कॉपी कर सकता है। कई क्षेत्रों में तो AI ने मनुष्य को ही बिनजरूरी सिद्ध कर दिया है। आपके फोन का सारा का सारा डेटा उसके पास जा रहा है और बड़ी बड़ी कम्पनियाँ उनके निजी फायदे के लिए उपग्योग कर रही है। पर इसके सामने आप AI से जो करवाना चाहो, सोचवाना चाहो, लिखवाना चाहो, आपके काम आसान करवाना चाहो जो भी करना हो सब कुछ वह कर देगा। आप निश्चिंत हो जाइये! दुनिया AGI अर्थात AI जो स्वयं ही अपना कार्य करने में सक्षम है की तरफ जा रही है। और दूसरा सब तो होता रहेगा; आप सकारात्मक बनिए न!

देखो हम मानते है कि कैंसर आदि रोग बढ़ रहे है, आयुष्य घट रही है, पहले से अस्पताल में ज्यादा समय बीत रहा है, दवाई आदि की दैनिक कार्यो में जरूरत बढ़ रही है फिर भी आज के बच्चे-युवा शारीरिकरूप से कमजोर होते जा रहे है। भले ही एलॉपथी की दवाई मूल रोग को तो दूर नहीं करती पर जरूर उसके बाह्य दशा को तो ठीक करती ही है। आज के मेडिकल साइंस की यह दशा है। पर उसके सामने दवाई के क्षेत्र में कितना विकास हुआ है, सभी रोगों की दवाई ढूंडी जा रही है, तुरंत राहत मिले ऐसे इलाज आज उपलब्ध है आदि। मेडिकल साइंस आज तरक्की कर रहा है। और दूसरा सब तो होता रहेगा; आप सकारात्मक बनिए न!

और इन सब में टेक्नोलॉजी से आपका धर्म भी तो अच्छे से प्रचारित हो रहा है! हमारा आपसे बस इतना ही कहना है कि आप विज्ञान को सकारात्मक रूप से देखो; क्योंकि यह विकास का ही दौर है।

जैन दार्शनिक -

जैन धर्म न सकारात्मक है न नकारात्मक; वह तो जैसी वस्तु है वैसा उसे प्रतिपादित करता है, कहता है। उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी नाम न तो धर्म के बढ़ने घटने से है और न ही बाह्य सामग्री, टेक्नोलॉजी कितनी शक्तिशाली बन रही है। न ही इसका सम्बन्ध मकान, गाड़ी से है और न ही इसका सम्बन्ध आपकी इंटरनेट स्पीड से हैं।

उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी काल का निर्णय मनुष्यादि की शारीरिक क्षमता के मायने जैसे बुद्धि, बल, आहार आदि से है। आप भी यह स्वीकार कर रहे हो कि इन सब में ह्रास जरूर दिख रहा है। रही बात धर्म की तो - वह कितने आसानी से आपके मोबाइल में उपलब्ध है, ज्ञानिओं के प्रवचन यूट्यूब पर लाइव है, ऑनलाइन तत्त्वज्ञान का प्रचार कितना हो रहा है, कौन कितना लाभ टेक्नोलॉजी से ले रहा है उससे धर्म की बढ़ती हो रही है कि नहीं उसका निर्णय नहीं किया जा सकता। आज इतना शास्त्र ज्ञान उपलब्ध होने पर भी उस ज्ञान को पचाने वाले कितने है? अरे इतने ग्रन्थ होने पर भी उन्हें सचमे पढ़ते कितने लोग है? इतने प्रवचन होने पर भी सचमे सुनते कितने है? इससे सम्यग्दृष्टि बढ़ गए क्या? संयम मार्ग पर चलने वाले कितने है? संयम छोडो, श्रावक का सामान्य आचरण भी इस भौतिकवादी दुनिया के जीव नहीं कर पाते! व्रती-मुनिधर्म में शिथिलाचार भी इसी के कारण आज समाज में बढ़ रहा है।

देखो, वास्तव में ६ महीना ८ समय में सिर्फ ६०८ ही मोक्ष जायेंगे। और किसी समय में कौनसे गुणस्थान में कितने जीव होंगे वह भी निश्चित ही है। मैं यह नहीं कह रहा कि धर्म बढ़ रहा हैं कि नहीं, पर यह तो निश्चित है कि ऐसे बाह्य निमित्त तब ही निमित्त कहलायेंगे जब धर्म प्रभावना का कार्य होगा! और हमने अभी ही इसकी परिभाषा में देखा कि उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी का निर्णय मनुष्य के शरीरादि से है; धर्म से नहीं। जो धर्म से होता जो जब ४थे काल में १०वे से लेकर १६वे तीर्थंकर तक धर्म की व्युच्छुती हुई थी तब उस कालखंड को हमें ६ठा काल मानना पड़ेगा या अन्य कुछ मानना पड़ेगा।

इसलिए इसमें कोई दो राय नहीं है कि वर्तमान में अवसर्पिणी काल ही है। आपके ही वर्णन में आपके अनुसार जो विकास है उसमे क्या नुक्सान है वह बता दिया। वास्तव में, काल अवसर्पिणी हो या अवसर्पिणी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; हमारे परिणाम निरंतर वर्धमान भाव को प्राप्त होते रहे और हम इस कालचक्र के चक्र को तोड़कर अनंत काल तक अविचल दशा को प्राप्त हो ऐसी मंगल भावना के साथ विराम लेता हूँ।