Question Set 4
Q. 1
दुःख का लक्षण आकुलता है। अनाकुलता का नाम सुख है। वर्तमान में मिथ्यात्व गुणस्थान होने से ये निश्चित है कि दिवस रात पर्याय में बस दुःख का ही वेदन हो रहा है; भले ही वह दुःख दुःख लगे कि सुखाभास लगे। आकुलता इच्छा से होती है।
इच्छा अपितु होती तो मोहनीय कर्म के निमित्त से ही पर यहाँ अन्य कर्म के उदय की अपेक्षा से भी विचार किया गया है। इच्छा ४ प्रकार की कही गयी हैं -
१. विषयग्रहण की इच्छा
मोह का उदय हो और ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्म का उदय भी तीव्र हो जिससे जो विषय जानना-देखना इच्छे वह न बने तो यह जीव दुःखी होता है।
निरंतर प्रतिसमय ऐसी इच्छा का सद्भाव होता ही है। उसके मेरे जीवन से कुछ उदाहरण -
१. कोई सस्पेंस फिल्म देख रहे होते है तब निरंतर अव्यक्त को जानने की इच्छा होती है। कोई नया गीत आया होता है तो उसे सुनने की इच्छा होती रहती है।
२. तीन लोक के सम्बन्धी जैन धर्म में जो चर्चा है वह भौतिकवादीओ से बहुत अलग है। तो सूर्य-चंद्र आदि की व्यवस्था सच में कैसी होगी, साइंस कहाँ गलत है, कैसे गलत है; मैं इस जैन भूगोल की बात को कैसे अप ने साधर्मिओं को बताऊ-समझाऊँ - इस विषय पर बहुत ही विकल्प चलते है।
२. कषायभाव के अनुसार कार्य करने की इच्छा
चारित्रमोह के उदय से जिस कषाय का उदय हो उस ही रूप प्रवर्तन करने की इच्छा इससे होती है। जैसे -
१. कोई वस्तु मेरे अनुसार न बने, तब मुझे उसे अपने मिथ्यात्व के कारण मेरे अनुसार परिणमाने की इच्छा होती है। वह नहीं हो और तब क्रोध का उदय हो उस समय क्रोध वश होकर दूसरे जीवो को मन-वचन-काय से भला बुरा करने की इच्छा, स्वयं को नकारात्मकरूप से दोष देने की इच्छा, पानी पीकर शांत होने की इच्छा, किसी मित्र को अपनी बात कहकर हल्का होने की इच्छा, आदि आदि क्रोध के उदय काल में उत्पन्न होती प्रत्यक्ष देखि है
२. मुझे कोई मिठान्न विशेष पसंद हो और उसे खाते समय जो लोभ कषाय का उदय तो उसे और स्वाद लेकर खाने की इच्छा, कोई विघ्न / रोक टोक न आवे ऐसी इच्छा, वह मिष्ठान्न मिलता रहे वैसी इच्छा, उसे खाने पर शरीर भी बीमार न पड़े ऐसी इच्छा, उसे खाने योग्य सामग्री चम्मच, थाली आदि अनुरूप ग्रहण होते रहे ऐसी इच्छा आदि
३. अनिष्ट संयोग दूर करने की इच्छा - पाप का उदय
मिथ्याभाव सहित वेदनीय, नाम, गोत्र, अंतराय आदि का जब पाप उदय हो तो जीव को जो अनिष्ट का संयोग होते है और उन्हें दूर करने की चेष्टा होती है। पाप का उदय चला जाय यह ही वास्तव में सबसे बड़ा पाप है!
१. योगा / व्यायाम करते समय कोई एक आसान में शरीर को टिकाना होता है। थोड़े समय के बाद शरीर के अंगों में दर्द शुरू हो जाता है। उस समय निरंतर वह दर्द से मुक्ति जल्दी से जल्दी हो जाए (अर्थात वह १५ सेकंड का समय जल्दी पूरा हो जाए) उसकी तीव्र इच्छा होती है। इसे पाप के उदय में इसलिए रखा क्योंकि शरीर का हीन संस्थान होने से ऐसे दर्द होते है। वहाँ के शिक्षक कहते हैं कि यह दर्द आपके लिए अच्छा है। पर वास्तव में सोचा जाय तो दुःख मेरे स्वभाव से विपरीत है वह कैसे अच्छा हो सकता है?
२. ठण्ड के मौसम में जब सर्दी लग जाती है तब नाक बहने लगता है। उस समय भी मैं सर्व प्रकार से प्रयत्न में जुट जाता हूँ कि यह झुकाम कैसे ठीक हो! दवाई लेना, नास लेना आदि की इच्छा इस पाप के उदय को दूर करने के लिए की जाती है।
३. थोड़े दिन पहले की बात है। एक दिन पता नहीं (मेरे पाप उदय के कारण) मेरे साथ सब कुछ ही जैसा चाहा उससे विपरीत हुआ। सब कुछ ही अनिष्ट हुआ। तब दिन के अंत में मैंने ऐसा सोचा कि आखिर यह दिन पूरा हुआ; अब कोई दुःख नहीं - शान्ति से सो जाऊंगा। उस समय अंतर की आवाज ने मुझे जगाया कि दुःख मुझे अनिष्ट का नहीं इच्छा का था; और सोने से शांति नहीं मिलेगी!
४. इष्ट संयोगों को भोगने की इच्छा - पुण्य का उदय
मिथ्याभाव सहित वेदनीय, नाम, गोत्र, अंतराय आदि का जब पुण्य उदय हो तो जीव को जो इष्ट का संयोग होते है और उन्हें पास रखने की, भोगने की चेष्टा होती है। पुण्य का उदय कभी चला न जाय यह ही वास्तव में सबसे बड़ा पुण्य को क्षीण करने वाला पाप है!
१. मेरे पास नेटफ्लिक्स का सब्सक्रिप्शन है। पुण्य का उदय है कि मेरे पास वह है। पर इस बाह्य निमित्त के वश होकर मैं व्यर्थ में इसे भोगने की इच्छा करता रहता हूँ। जब भोग पाता हूँ तब तो मैं पाप करता ही हूँ पर जब व्यस्त होने के कारण नहीं भोग पाता तब नहीं भोग पाने के दुःख में भोग पाने की अनंत इच्छा करके व्याकुलित भी होता हूँ!
२. पुण्य के उदय से प्राप्त गाडी, घर, फोन, परिवार आदि सारी वस्तुओं में मैं अपनत्व, ममत्व करके भवरें के माफिक एक के बाद एक भ्रमण करता हूँ पर फिर भी तृप्ति नहीं मिलती। सुबह से लेकर रात्रि तक जो भी पांच इन्द्रिय के विषय है उन्हें भोगने की इच्छा करता हूँ और पाप बांधता हूँ।
ध्यान देने वाली बात - पुण्य के उदय में प्राप्त विषय में रमे से तो जीव महा पाप बांधता है; और जो महा पुण्य से प्राप्त जिनमंदिर आदि है उनकी अवगणना करके भ ी महा पाप बांधता है। कदाचित धर्म क्रिया करे तो भी दिन में सिर्फ १५-२० मिनट करता है और वह भी सांसारिक विकल्पों के बोझ सहित। सच में, जीव के भविष्य को कहने के लिए कोई भविष्यवेत्ता की जरूरत नहीं; उसकी दिनचर्या ही सब कुछ कह जाती है।
Q. 2
मध्य रात्रि का समय था। तेज बारिश हो रही थी। झंडू अपने कमरे में सो रहा था। अचानक से घर के दरवाज़े को कोई ज़ोर-ज़ोर से खटका रहा हो ऐसी आवाज आयी। बेचैनी और अधिरेपने से भरे उस दस्तक को सुनकर झंडू एकदम से जाग गया। भयभीत होकर उसने मुख्य किवाड़ की ओर धीरे से अपने कदम बढ़ाये। खिड़की से देखा तो एक भैंसा दिख रहा था। उसके बाजु में एक लम्बा-चौड़ा सा आदमी भी था जो वर्षा के आवरण में धुंधला से दिख रहा था।
“जरूर ही यह दूधवाले रामु भाई होंगे! मैं व्यर्थ ही परेशान हो रहा था।” - ऐसा सोचकर झंडू ने घर के द्वार खोले तो उसने जो दृश्य देखा उससे वह भयकारी आश्चर्य में पड़ गया!