क्रमबद्ध पर्याय
जो “स्याद्वाद” जैन दर्शन की आवाज़ है, तो “अकर्तावाद” हस्तयुगल के सामान है। क्योंकि ज हाँ हस्तयुगल से दुनिया “कर्ता” बनकर दुःखी हो रही है; वहीं इस ओर तीन लोक के नाथ हाथ पे हाथ रख के बैठे है और हमें अनंत शांति का सन्देश “अकर्ता” बनकर दे रहे है।
अकर्ता वस्तु का स्वरुप है। एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का कुछ नहीं कर सकता। इतना ही नहीं, एक द्रव्य अपनी पर्यायों का कर्ता होते हुए भी उसमे फेरफार करने का कर्ता नहीं होता। इस विश्व में जो सर्व वस्तुएँ सुंदरता को प्राप्त है तो वह इसी स्वतंत्र परिणमन के कारण है।
जो, जहाँ, जब, जैसा होना हैं सो वह, वहाँ, तब, वैसा ही होता है - यही वस्तु तत्त्व का उदघाटन है। इसी का नाम क्रमबद्ध पर्याय है। अकर्ता स्वरुप को जो एक नज़रिये से देखे तो क्रमबद्ध पर्याय दिखे बिना न रहे। इस जीव को कर्तापने का रोग अनादि का है, इसीलिए तो उस भ्रम की भावना के फल में प्रकृति उसे पुष्ट करने ८४ लाख योनियों में भ्रमा रही है। पर जब जीव इस अकर्ता स्वरुप को पहिचान क र उसमे ही लीन हो जाता है, तब स्वयमेव ही वह लोकशिखर पर जाकर अचल ध्रुव सिद्ध दशा पा जाता है। वस्तु का स्वरुप जैसा है बस वैसा ही दिखना सच्ची दृष्टि है।
आध्यात्मिक सत्पुरुष पू. गुरुदेवश्री कानजी स्वामी द्वारा इस सिद्धांत को जन-जन का विषय बनाकर शुद्ध तत्त्वज्ञान को इतना सरल बना दिया है कि मानो अनादि के सारे सत्कर्मो का फल एक साथ ही मिल रहा हो कि यह उत्कृष्ट बात हमे इतने सुन्दर रीति से बिना कोई प्रकार की मिलावट के परोसी गयी है। पू. गुरुदेवश्री की वाणी में इसी अकर्तावाद की सिंह गर्जना थी और आत्मा के आनंद की सुगंध भी थी - जो सभी जीवो को महा उपकारी थी। उनके द्वारा दी गयी इस अनुपम भेट को शब्दों में कहना सचमे असंभव जैसा ही है।
मुझे पता है कि यह पढ़कर / सुनकर आपके अंदर अनेक प्रश्न उत्पन्न हो गए होंगे। मेरा मानना है कि जो आपको सच में रूचि है तो आप इनके उत्तर ढूंढ़ने की पूरी कोशिश करोगे - जो आपको सह ज ही सुगमता से प्राप्त हो जायेंगे। पर जो आपका उद्देश्य सिर्फ हाँसी बनाना है, स्वछंदता पोषनेका है, अनध्यवसाय भाव सहित है, प्रयोजन से हटकर बस इसे मनोरंजन के विषय रूप, निंदा, राजनीती का विषय बना है, लेना है तो शायद ये प्रकरण आपके लिए नहीं है।
आ डॉ प. हुकमचंद भारिल्ल जी ने इस विषय को अलौकिक रूप से प्रस्तुत किया है। इस “क्रमबद्ध पर्याय” नामक पुस्तक में क्रमबद्ध पर्याय को आत्मार्थी जीवों को समझाने / ह्रदय में बिठाने के लिए मानो पूरा जोर लगाया हो।
यह पुस्तक ३ भाग में विभाजित है -
१. अनुशीलन
चारो अनुयोग से क्रमबद्ध पर्याय की सिद्धि, अनेक ग्रंथो के प्रमाण, युक्ति और तर्क सहित इस बात को अकाट्य रूप से प्रस्तुत किया है। अंत में मूल प्रयोजन स्वाभाव सन्मुख होने में इस क्रमनियमित पर्याय के श्रद्धान की क्या उपयोगिता है वह भी सूक्ष्मरूप से दर्शाया है।
२. प्रश्नोत्तरी
कु छ ऐसे प्रश्न हो मुख्यरूप से सभी स्वाध्यायी को सहज ही हो सकते है, सूक्ष्म तत्त्व की ओर से और practical स्तर पर भी जो इस सिद्धांत की बातें आती है - उनका सुन्दर चयन देखने को मिलता है।
३. प. गुरुदेवश्री के साथ चर्चा
इस खंड में गुरुदेवश्री के पूछे गए प्रश्नों और उनके ज्ञायक भाव को चूमकर निकले हुए उत्तरों को सुनकर इस क्रमबद्ध पर्याय की बात और गहराई से समझ आ जाती है।
हमारी इस चर्चा में अनुशीलन खंड की विषयवस्तु के ही मुख्यबिंदु को प्रस्तुत किया गया है। जो इस प्रकार है।
१. क्रमनियमित पर्याय की परिभाषा
- क्रम + नियमित - सारी पर्याय अपने अपने क्रम से ही उत्पन्न है + वे सभी नियमित है अर्थात निश्चित है
- प्रत्येक कार्य स्वकाल में ही होता है। अर्थात सभी पर्याय अपने उपादानगत योग्यता रूप से ही प्रगट होती है
- सर्व पर्यायो का उस समय का द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव सब कुछ निश्चित है - यही क्रमबद्ध पर्याय है
२. क्रमनियमित पर्याय के मुख्य आधार
- समयसार टिका - गाथा ३०८ से ३११
- स्वामी कार्तिकेय अनुप्रेक्षा - गाथा ३२१, ३२२, ३२३
- पद्मपुराण - सर्ग ११, श्लोक ४०
- रत्नकरण्ड श्रावकाचार टिका - श्लोक १३९ भावार्थ
- तत्त्वार्थसूत्र, अधिकार १, सूत्र २९
- सर्वार्थसिद्धि टिका, अधिकार १, सूत्र २९
- प्रवचनसार, गाथा ३९
- धवला पुस्तक ६ - जैनेन्द्र सिद्धांत कोष
- प्रवचनसार तत्वप्रदीपिका टिका, गाथा २००, ४७
- भगवती आराधना, गाथा २१४१
- योगसार अधिकार १, छंद २८
- नियमसार गाथा १५९
- आप्तमीमांसा, अष्टशती, सर्वज्ञसिद्धि आदि अनेक रचनाएँ
- कोष, भक्ति, पूजन आदि अनेक अन्य प्रमाण
३. क्रमनियमित पर्याय की सर्वज्ञता से सिद्धि
- केवलज्ञान में सर्व द्रव्य की सर्व (तीन काल की) पर्याय प्रत्यक्ष झलकती है। जो केवलज्ञान में वर्तमान में ही प्रत्येक द्रव्य की भविष्यकालीन पर्याय झलकती हो तो ये स्वयमेव ही निश्चित हो गया कि सर्व पर्याय क्रमनियमित ही है
- सर्वज्ञ भगवान द्वारा कथित बात को हम मस्तक पर रखकर ही सर्व जिन धर्म की चर्चा करते है। जो क्रमबद्ध पर्याय को न माना जाय तो सर्वज्ञता पर प्रश्नचिन्ह उत्पन्न होने से पुरे जिनशासन पर प्रश्नचिन्ह खड़ा हो जायेगा!
- इसी के अंदर भामण्डल में ७ भव दीखते है वह बात आ जाती है
४. क्रमनियमित पर्याय की प्रथमानुयोग से सिद्धि
- प्रथमानुयोग को क्रमबद्ध पर्याय सिद्धांत का द्योतक कहे तो कुछ गलत नहीं होगा क्योंकि उसका प्रत्येक प्रसंग इसी बात को प्रकाशित कर रहा है। अज्ञानिओ की लाख कोशिश के बाद भी जो होना था वही हुआ और ज्ञानी उसी बात के निश्चय से ऊर्ध्वगमन को प्राप्त हुए।
- उसके कुछ मुख्य उदाहरण -
- द्वीपायन ऋषि द्वारा द्वारिका दहन
- मारीचि से महावीर तक की यात्रा
- रावण द्वार ा जनक और दशरथ को मारने का प्रयास से लेकर रावण की मृत्यु तक
- निमित्तज्ञान द्वारा चन्द्रगुप्त मौर्या के १६ स्वप्नों का फल और आचार्य भद्रबाहु का ससंघ दक्षिण गमन
५. क्रमनियमित पर्याय की करणानुयोग से सिद्धि
करणानुयोग से पर्यायों के क्रमनियमितपने की सिद्धि बहुत सरलता से हो जाती है। जीव के परिणाम, बाह्य निमित्त, वस्तु का परिणमन जैसा जिस समय होने योग्य होता है वही होता है। सारे करणानुयोग ग्रंथो का अध्ययन करके केवलज्ञान की महिमा और वस्तु के स्वतंत्र परिणमन की समझ आती है। यह बात को समझाते हुए कुछ शास्त्रीय उदाहरण -
- ६ महीना और ८ समय में सिर्फ ६०८ जीव का निगोद से निकलना और मोक्ष जाना -
- प्रत्येक गुणस्थान में कितने जीव होते है उसकी गणना का निश्चित होना
- प्रत्येक गति, योनि, इन्द्रिय आदि में कितने जीव होते है उसकी गणना का निश्चित होना
- तीन लोक की रचना का सुव् यवस्थित होना, ६ काल परिवर्तन और उसमे योग्य परिस्थिति का होना
- तीर्थंकर हमेशा २४ (और अन्य महापुरुष उनके यथायोग्य सूचि और नियम के अनुसार - जैसे नारायण हमेशा प्रतिनारायण का वध करता है, कोई और नहीं ) होते है। देखा जाए तो कार्य होने के अनुसार सारे निमित्त भी खचित होते है।
- कर्म सिद्धांत के नियम और उनमे जो परमाणु स्तर पर जो परिणमन होते है उनको पढ़कर इस बात का विशेष निर्णय होता है
६. क्रमनियमित पर्याय की द्रव्यानुयोग से सिद्धि
द्रव्यानुयोग पदार्थ जैसा है उसे वैसा न्याय और युक्ति से दर्शाता है। पूरा द्रव्यानुयोग हमे निर्भार बनाने के लिए है। और क्रमबद्ध के स्वीकार बिना जीव निर्भार तीन काल में नहीं हो सकता।
- प्रवचनसार जी में त्रिलक्षण परिणाम पद्धति से क्रमबद्ध की सिद्धि की है जो द्रष्टव्य है।
- जैसे विस्तारक्रम से पूरा क्षेत्र वस्तु एक ही है (ध्रौव्य), उसके एक एक अंश प्रदेश है जो परिणाम है; वह अपने अपने स्थान पर प्रगट है (उत्पाद / उत्पत्ति) और अन्य स्थान पर अप्रगट है। (व्यय / संहार) एक-दूसरे में परस्पर व्यतिरेक है, भिन्न है, कोई हस्तक्षेप नहीं है।
- वैसे काल प्रवाहक्रम से पूरा द्रव्य / वस्तु तो एक ही है (ध्रौव्य), उसके एक एक अंश पर्याय हैं जो परिणाम है, वह अपने अपने काल में प्रगट है (उत्पाद / उत्पत्ति) और अन्य काल में अप्रगट है। (व्यय / संहार) एक-दूसरे में परस्पर व्यतिरेक है, भिन्न है, कोई हस्तक्षेप नहीं है।
- इसमें मोती के हार का दृष्टांत दिया गया है
- उत्पाद व्यय ध्रौव्य में समय भेद नहीं है, तीनों एक ही समय में होते है
- फिल्म में सारे सिन निश्चित ही है बस अपने अपने समय में प्रगट है और अन्य समय में अप्रगट है; और पूरी वस्तु की दृष्टि से फिल्म एक ही है
- जैसे लोकाकाश के जितने प्रदेश है उतने ही जीव के प्रदेश होते है; वैसे ही तीन काल की जितनी पर्याय है उतनी ही पर्याय सर्व द्रव्य की है। अर्थात सर्व पर्याय अपने अपने समय में खचित है, अदलबदल के काबिल नहीं है।
७. क्रमनियमित पर्याय और कर्त्तापने के अनादि संस्कार
अभी कोई कहे कि - “भगवान वीतरागी होने से अकर्ता है ये हम मानते है पर हम तो अभी रागी है इसलिए कर्ता हुए न? रागी देवी देवता तो भला बुरा कर सकते हैना!” उन्हें कहते हैं कि - “पहले तो भगवान वीतरागी है इसलिए अकर्ता है ऐसा नहीं है। भगवान वीतरागी इसलिए है क्योंकि वे अकर्ता स्वरुप का यथार्थ स्वीकार करते है। तुम्हे वस्तु में तुम्हारी इच्छा अनुसार फेर-बदल करना है इसलिए तुम उस इच्छा के कारण दुखी हो। वस्तु कोई तुम्हारी इच्छा से बदल थोड़ी जायेगी? और ऐसा कहकर क्या तुम अपने को भगवान से भी बड़ा मानते हो? इससे तो तुम्हारे मोक्ष के प्रति अरुचि का प्रदर्शन हो रहा है। रागी देवी देवता की तो बात ही क्या कहे?”
तो फिर द्रव्य अपनी पर्या यों का भी कर्ता नहीं है? नहीं, अपनी पर्याय का कर्ता द्रव्य जरूर से है पर उसमे फेरफार कर्ता नहीं है। हाँ फेरफार करने का विकल्प आत्मा करे तो विभाव रूप है और सहज स्वीकार करे तो स्वभाव सन्मुख हो जाता है - यही मोक्षमार्ग का संक्षिप्त स्वरुप है।
“कर्तापने की बुद्धि से जीव सुख के लिए परद्रव्य पर निर्भर होकर दुखी होता है और अकर्ता के सम्यक श्रद्धान से जीव निर्भार होकर सुखी हो जाता है।”
८. क्रमनियमित पर्याय और पांच समवाय
कोई भी कार्य पंच समवाय की उपस्थिति से ही पूर्ण होता है। वे पंच समवाय इस प्रकार जिनागम में कहे है -
१. स्वभाव २. निमित्त ३. पुरुषार्थ ४. काल लब्धि ५. भवितव्यता
इन पंच समवायो को इकट्ठा नहीं करना पड़ता, अपितु जब कार्य होता है तब वे सहज ही उपस्थित होते है। यही तो वस्तु व्यवस्था के व्यवस्थितपने की घोषणा है।
९. क्रमनियमित पर्याय की नियतिवाद से भिन्नता
कुछ लोग क्रमबद्ध पर्याय को ठीक से न समझकर इसे नियतिवाद (अर्थात जो दर्शन “सब कुछ निश्चित है” ऐसा एकांतपने से मानते है) का नाम दे देते है। वास्तव में क्रमबद्ध पर्याय में पुरुषार्थ आदि ५ समवाय गर्भित है। जब जिस समवाय की मुख्यता से कथन हो तब उसे आगे करके बात रखकर दूसरे ४ समवाय गौण किये जाते है; उनका निषेध नहीं। नियतिवाद स्वच्छंदता का पोषक है; और क्रमबद्ध पर्याय स्वभाव का घोषक है। इसलिए गोम्मटसार कर्मकांड जी, गाथा ८८२ में कहे गए मिथ्या एकांतवादी की चर्चा में जो नियतिवाद वह क्रमबद्ध पर्याय से पूर्ण रूप से भिन्न है।
१०. क्रमनियमित पर्याय का अनेकान्तात्मक स्वरुप
अनेकांत वस्तु का स्वरुप है; और उसे कहने वाले कथन को स्याद्वाद कहते है। क्योंकि क्रमनियमित पर्याय वस्तु का ही स्वरुप हुआ तो वह स्वयमेव ही अनेकान्तात्मक ही होगा ऐसा सिद्ध हो जाता है।
अनेकांत की चर्चा करते सम य ४ बाते आती है -
सम्यक अनेकांत - पूर्ण वस्तु को ग्रहण करती है। ‘स्यात’ पद सहित कथन होता है या फिर दूसरे शब्दों में कहे तो सापेक्ष नयो का समूह
सम्यक एकांत - पूर्ण वस्तु में से किसी एक अंश को मुख्य करके अपेक्षा सहित कहता है या फिर दूसरे शब्दों में कहे तो सापेक्ष नय
मिथ्या अनेकांत - पूर्ण वस्तु को स्यात पद रहित कथन करने पर किसी एक पक्ष को ही पूरी वस्तु कहना या फिर दूसरे शब्दों में कहे तो निरपेक्ष नयो का समूह
मिथ्या एकांत - पूर्ण वस्तु में से किसी एक अंश को मुख्य करके अपेक्षा रहित कहता है या फिर दूसरे शब्दों में कहे तो निरपेक्ष नय
‘क्रमबद्ध पर्याय’ में जो काल की मुख्यता से कहे तो वह सम्यक एकांत हो जायेगा। वैसे ही द्रव्य आदि की मुख्यता से करे तो वह भी सम्यक एकांत होगा। पूरी वस्तु को बताना हो तो वह स्यात पद सहित भी कथन में आ सकता है।
१०. क्रमनियमित प र्याय और पुरुषार्थ
- सब क्रमनियमित हैं - ऐसे निर्णय में ही जीव का अनंत पुरुषार्थ समाया हुआ है
- भगवान सिद्धालय में जैसे “कुछ न करते हुए विराजमान है” वैसे ही हमे भी “कुछ नहीं करना है” यहाँ “कुछ न करने” का अर्थ कोई विकल्प-चिंता-कर्ताबुद्धि है; क्योंकि द्रव्यत्व गुण से यह जीव निरंतर परिणमनशील है; पर्याय निरंतर हो रही है, अपनी पर्याय का कर्ता तो है ही
- इसके निर्णय बिना न देव शास्त्र गुरु का यथार्थ श्रद्धान हुआ, न आत्मा का। और इनके सम्यक श्रद्धान का नाम ही सम्यक्त्व है।
- लोक में पढाई करना, आजीविका के लिए मेहनत करना, एकाग्रचित्त करने के लिए उद्यम करना, व्रत-उपवास करना, जिनपूजा करना, स्वाध्याय करना आदि बाह्य क्रिया को पुरुषार्थ नाम दिया जाता है सो लोक की भाषा में ठीक हो सकता है। पर वास्तव में पर-वस्तु में इस जीव का (और कोई भी द्रव्य का) पुरुषार्थ होना असंभव है। जीव का पुरुषार्थ केवल स्व-द्रव्य में ही हो सकता है। अपनी पर्याय (स्वभाव/विभाव) ही उस द्रव्य का पुरुषार्थ है।
- अज्ञानी जीव को पर में कुछ करने में ही पुरुषार्थ भासता है; जो आस्त्रव तत्त्व की भूल है। यह कर्ताबुद्धि अनादि की है जिसे सम्यक करना इतना भी सरल नहीं है; अपितु दुर्लभ है। और इसे ही सम्यक करने का नाम पुरुषार्थ है! निर्विकल्प वीतराग रत्नत्रयमय स्वाधीन दशा का नाम ही पुरुषार्थ है।
- मोक्षमार्ग में स्वभाव पर्याय का प्रगट होना / प्राप्त होना ही पुरुषार्थ है - जिससे सर्व मोक्षप्राप्त और मोक्षमार्गी जीव पुरुषार्थवंत है और सर्व मिथ्यादृष्टि बाहर में कितने हाथ-पैर मार ले वह पुरुषार्थशून्य है ऐसा सिद्ध हो जाता है।
- और कितना कहे, हमारा सारा पुरुषार्थ बस इस क्रमबद्ध पर्याय की बात को पचाने में ही है।
इस प्रकार हमने क्रमबद्ध पर्याय के विषय में अपेक्षित विस्तार से चर्चा की। फिर भी, इसे विशेष समझने के लिए “क्रमबद्ध पर्याय” पुस्तक को निष्पक्ष होकर आत्मकल्याण की भावना से पढ़ना आवश्यक है।
सिद्ध भगवान अनंत पुरुषार्थी है। वैसा ही अनंत पुरुषार्थी हमे भी बनना है तो इसी क्रमनियमित पर्याय का स्वीकार प्रसन्नचित्त से करना होगा। सिर्फ विकल्पात्मक स्वीकार नहीं परन्तु हम इस क्रमबद्ध पर्याय नामक अद्भुत सत्य को आत्मसात करके संसार से तारने वाला सम्यग्दर्शन प्रगट करे ऐसी मंगल भावना से अपनी बात को विराम देता हूँ।
Myth Busters
- पुरुषार्थ के विषय में जो समझ थी वह मेरी clear हुई और उसमे विशेष दृढ़ता आयी
- क्रमबद्ध पर्याय को हमेशा से “पू. गुरुदेवश्री की खोज” के रूप में कही न कही मैंने देखा और माना था। इसलिए जब भी उसकी बात आये तो अंदर ही अंदर प्रश्नचिन्ह उठते थे जो उतने सकारात्मक, प्रसन्नचित्त भरे नहीं थे, आकुलता सहित थे। और आज के समय में अधिकतर लोग इसे कुछ नए सिद्धां त के रूप में ही लेते है। पर इसे गहराई से समझने पर, अनेक जिनवाणी के उद्धरण को पढ़कर ये निश्चित हो गया है कि यह कोई खोज नहीं है परन्तु जिनवाणी का सार है; उसमे छुपा हुआ अद्भुत सिद्धांत है। पू गुरुदेवश्री ने इसे हमे बहुत सरल करके परोसा है, वह उनके पुरुषार्थ और तत्त्व मंथन से प्राप्त है - और इसके लिए उनका हमारे पर अनंत उपकार है।
- ४ अनुयोग से एक ही बात सिद्ध होने पर आनंद आता है और कोई भी अनुयोग पढ़ो पर उसमे “reading between the lines” करने की कला भी समझ आ जाती है।