📄️ अनेकांत-स्याद्वाद
जैन धर्म वस्तु के सत स्वरुप को बताने वाला है। जैसा है वैसा कहने वाला है जो है सो जैन धर्म है। अभी, वस्तु का स्वरुप अनेकान्तात्मक है, अनंत गुण-धर्म से युक्त है। इसलिए विश्व के समस्त द्रव्य कैसे है? अनेकान्तात्मक है। दूसरे शब्दों में कहे तो - अनेकांत वस्तु का ही स्वरुप है।
📄️ सप्तभंगी नय
वस्तु का स्वरुप अनेकान्तात्मक हैं। उस वस्तु को कहने की सापेक्ष कथन पद्धति को स्याद्वाद कहते है। पूरी प्रमाण की वस्तु जो योग्य ‘स्यात’ पद सहित कहा जाय तो उसे प्रमाण वाक्य कहते है। पर पूरी वस्तु के किसी अंश को मुख्य करके अन्य को गौण कर कथन किया जाय उसे नय वाक्य कहते है।