छह ढाला
मंगलाचरण
तीन भुवन में सार, वीतराग विज्ञानता,
शिव स्वरुप शिवकार, नमहूँ त्रियोग सम्हारिकै।
युद्ध में ढाल का कर्म शत्रु से स्वयं के रक्षण का होता हैं। कर्म रुपी शत्रु ने इस भगवान आत्मा को अनादि से जकड़-पकड़ के रखा हैं। अनादि से मोह-राग-द्वेष आदि विभाव भावों ने स्वयं की शक्ति को प्रगट होने से छुपाये रखा हैं। अब समय आ गया हैं, इन कर्मसेना से जीतने का - इसी मोहादि के रक्षण के लिए और अपने स्वरुप को प्राप्त करने में ढाल के सामान जो उपदेश हैं वह पंडित कविवर दौलतराम जी द्वारा रचित सर्वमान्य, सुगम और लोकप्रिय ग्रन्थ छह-ढाला के रूप में हमे महाभाग्य से प्राप्त हुआ हैं; जिसके आश्रय से हम विभाव शत्रु का नाश करके अनंत सुख प्रगट कर सकेंगे।
छहढाला पुरे तीन लोक का सार जो ‘वीतराग विज्ञान’ हैं, उसे अपने अंदर समाहित किया हुआ हैं; इसीलिए इसे ‘गागर में सागर’ की उपमा भी दी जाती हैं। पू गुरुदेवश्री तो इसे ‘लघु समयसार’ भी कहते थे; क्योंकि इसमें मूल प्रयोजनभूत शुद्धात्म तत्त्व को सुन्दर रीती से संक्षिप्त में समझाया गया हैं। यह ‘रागादि के सामने ढाल सामान हैं’ और ‘इस रचना में ६ अलग-अलग रागो (राग को ढाल भी कहते हैं) का उपयोग किया हैं’ इसलिए इसका नाम ‘छहढाला’ सार्थक हैं।
अपितु यह ग्रन्थ द्रव्यानुयोग का हैं; और द्रव्यानुयोग शास्त्रों में शैली कथात्मक नहीं होती, परन्तु इस रचना में जीव की अनादि की दुखद कथा क्या हैं, कैसी हैं; और कैसे यह जीव अपनी भूल सुधारकर अनंत सुखी हो सकता हैं उसका विस्तार करने वाली महा गाथा हैं। जो कहानी ‘काल अनंत निगोद मंझार’ से शुरू होती हैं वह ‘रही हैं अनंतानंत काल यथा तथा शिव परिणये’ पे पूर्ण होती हैं। पूर्ण इसलिए कहा क्योंकि अब इस जीव का कुछ और कार्य बाकी ही नहीं रहा; कृत-कृत्य दशा को पा गया हैं; ऐसे जीवों को प दौलतराम जी “धन्य हैं” ऐसा कहकर हमे इस मार्ग में चलकर पूर्ण दशा को प्राप्त करने की प्रेरणा देते हैं।
अनादि से इस जीव ने तो विकथाओं को सुना हैं, अपनी कथा कभी सुनी ही नहीं हैं, न सुहाई हैं। पर अब काललब्धि पक गयी हैं, मोह मंद हो गया हैं इसलिए अपनी कथा के अकथनायक बनकर अपनी संसार कथा का अंत कर दो। एक भजन में आता भी हैं -
“माँ सुनायो मुझे वो कहानी, जिससे हो जाए भाव दुःख की हानि”
अद्भुत हैं यह रचना, अद्भुत हैं इसमें बताये तत्त्व की बात, धन्य हैं वे बड़भागी जो इस तत्त्व को समझे और अंतर में उतारकर संसार से तर जाए। हम भी इस मोक्षमार्ग पर चलके ऐसी दशा को प्राप्त करे जिसके बाद कोई मार्ग ही न हो, संसार समुद्र का किनारा हो; ऐसी मंगल भावना के साथ अब हम इस सुन्दर ग्रन्थ के ऊपर चर्चा और विवेचन आरम्भ करते हैं।