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छह ढाला

मंगलाचरण

तीन भुवन में सार, वीतराग विज्ञानता,

शिव स्वरुप शिवकार, नमहूँ त्रियोग सम्हारिकै।

युद्ध में ढाल का कर्म शत्रु से स्वयं के रक्षण का होता हैं। कर्म रुपी शत्रु ने इस भगवान आत्मा को अनादि से जकड़-पकड़ के रखा हैं। अनादि से मोह-राग-द्वेष आदि विभाव भावों ने स्वयं की शक्ति को प्रगट होने से छुपाये रखा हैं। अब समय आ गया हैं, इन कर्मसेना से जीतने का - इसी मोहादि के रक्षण के लिए और अपने स्वरुप को प्राप्त करने में ढाल के सामान जो उपदेश हैं वह पंडित कविवर दौलतराम जी द्वारा रचित सर्वमान्य, सुगम और लोकप्रिय ग्रन्थ छह-ढाला के रूप में हमे महाभाग्य से प्राप्त हुआ हैं; जिसके आश्रय से हम विभाव शत्रु का नाश करके अनंत सुख प्रगट कर सकेंगे।

छहढाला पुरे तीन लोक का सार जो ‘वीतराग विज्ञान’ हैं, उसे अपने अंदर समाहित किया हुआ हैं; इसीलिए इसे ‘गागर में सागर’ की उपमा भी दी जाती हैं। पू गुरुदेवश्री तो इसे ‘लघु समयसार’ भी कहते थे; क्योंकि इसमें मूल प्रयोजनभूत शुद्धात्म तत्त्व को सुन्दर रीती से संक्षिप्त में समझाया गया हैं। यह ‘रागादि के सामने ढाल सामान हैं’ और ‘इस रचना में ६ अलग-अलग रागो (राग को ढाल भी कहते हैं) का उपयोग किया हैं’ इसलिए इसका नाम ‘छहढाला’ सार्थक हैं।

अपितु यह ग्रन्थ द्रव्यानुयोग का हैं; और द्रव्यानुयोग शास्त्रों में शैली कथात्मक नहीं होती, परन्तु इस रचना में जीव की अनादि की दुखद कथा क्या हैं, कैसी हैं; और कैसे यह जीव अपनी भूल सुधारकर अनंत सुखी हो सकता हैं उसका विस्तार करने वाली महा गाथा हैं। जो कहानी ‘काल अनंत निगोद मंझार’ से शुरू होती हैं वह ‘रही हैं अनंतानंत काल यथा तथा शिव परिणये’ पे पूर्ण होती हैं। पूर्ण इसलिए कहा क्योंकि अब इस जीव का कुछ और कार्य बाकी ही नहीं रहा; कृत-कृत्य दशा को पा गया हैं; ऐसे जीवों को प दौलतराम जी “धन्य हैं” ऐसा कहकर हमे इस मार्ग में चलकर पूर्ण दशा को प्राप्त करने की प्रेरणा देते हैं।

अनादि से इस जीव ने तो विकथाओं को सुना हैं, अपनी कथा कभी सुनी ही नहीं हैं, न सुहाई हैं। पर अब काललब्धि पक गयी हैं, मोह मंद हो गया हैं इसलिए अपनी कथा के अकथनायक बनकर अपनी संसार कथा का अंत कर दो। एक भजन में आता भी हैं -

“माँ सुनायो मुझे वो कहानी, जिससे हो जाए भाव दुःख की हानि”

अद्भुत हैं यह रचना, अद्भुत हैं इसमें बताये तत्त्व की बात, धन्य हैं वे बड़भागी जो इस तत्त्व को समझे और अंतर में उतारकर संसार से तर जाए। हम भी इस मोक्षमार्ग पर चलके ऐसी दशा को प्राप्त करे जिसके बाद कोई मार्ग ही न हो, संसार समुद्र का किनारा हो; ऐसी मंगल भावना के साथ अब हम इस सुन्दर ग्रन्थ के ऊपर चर्चा और विवेचन आरम्भ करते हैं।

छहढाला का सामान्य चित्रण

इस ग्रन्थ की शुरुआत ‘वीतराग विज्ञान’ की सारभूतता दर्शाते की गयी हैं। सबसे पहले तो पहली ढाल में ‘संसार में दुःख ही हैं’ इस बात पर चोट की गयी हैं। संसारी को अनादि के संस्कार से बिना बताये समझाए ही अनंत काल से अनंत दुःख सहने पर भी संसार में ही सुखबुद्धि हैं; और संसार से ही सुख प्राप्त करने की मिथ्याबुद्धि हैं। इसलिए सबसे पहले संसार का सम्यक चित्र दिखा कर, ४ गति के दुःख को बताकर, जीव की दुःख भरी अनादि की कहानी सुनाकर पहले तो संसार में दुःख हैं ऐसा भासित करवाया।

फिर आगे चलकर दूसरी ढाल में वास्तव में दुःख का कारण क्या हैं उसका वर्णन किया। मिथ्या दर्शन ज्ञान चारित ही दुःख के कारण हैं, और उनके त्याग में ही सुख हैं। दूसरे शब्दों में सात त्तत्त्व के सम्यक श्रद्धान में, सम्यक ज्ञान में और सम्यक चारित्र में ही सुख हैं।

तीसरी ढाल में सच्चे सुख का लक्षण - अनकूलरूप और उसका कारण - रत्नत्रय का वर्णन हैं। निश्चय रत्नत्रय का वर्णन करके व्यवहार सम्यग्दर्शन की चर्चा यहाँ की गयी हैं।

सम्यग्दर्शन जो मोक्षमार्ग की प्रथम सीढ़ी हैं, उसकी चर्चा के पश्चात - चौथी ढाल में पहले सम्यज्ञान का वर्णन हैं जहाँ सम्यक ज्ञान के भेद, महिमा और भेदविज्ञान आदि की चर्चा की गयी हैं। इसके बाद यह ढाल में व्यवहार सम्यक्चारित्र, उसके भेद और श्रावक के १२ व्रत का वर्णन किया गया हैं।

वैराग्य की उत्पादक, आनंद की जननी ऐसी बारह अनुप्रेक्षा की चर्चा पांचवी ढाल में की गयी हैं। इन भावनाओ का चिंतन मुनिराज सदा करते रहते हैं, और यह वैराग्य मोक्षमार्ग में अत्यंत कार्यकारी सिद्ध होता हैं।

तत्पश्चात धन्य दिगम्बर मुनिराज कैसे होते हैं, उनका बाह्य आचरण कैसा होता हैं, २८ मूलगुण, गुप्ति, आवश्यक आदि की चर्चा व्यवहार सम्यक चारित्र के अंतर्गत इस अंतिम छठीं ढाल में की गयी हैं। यहाँ स्वरूपाचरण चारित्र का विवेचन भी प्राप्त होता हैं।

इस प्रकार, जीव की पहले श्रद्धा निर्मल हुई, साथ-साथ ज्ञान निर्मल हुआ, अनुभव से आंशिक चारित्र प्रगट हुआ; फिर आगे चलते चलते श्रावक के देश व्रत और मुनिराज के महाव्रत रूप सम्यक चारित्र की शुद्धि की वृद्धि होते हुए पूर्ण चारित्र निर्मल होता हैं, ज्ञान आदि अनंत गुण पूर्णता को प्राप्त होते हैं; वीतराग, सर्वज्ञ और हितोपदेशी अरिहंत दशा और फिर संसार से पार सिद्ध दशा को प्राप्त होता हैं जो इस ढाल में आके पूर्ण होता हैं। छहढाला में कैसे क्या-क्या विषय वस्तु हैं और उसका निरूपण किस प्रकार हैं उसका वर्णन देखा।

पहली ढाल

पुरे जिनागम का सार - सच्चे सुख की प्राप्ति ही हैं। इस सच्चे सुख की प्राप्ति कैसे हो उसी का मार्ग जिनवाणी में बताया गया हैं। पर अनादि से इस जीव को पर के ही गीत सुहाए हैं; इसलिए संसार में ही सुख भासित होता हैं। इस भ्रम को तोड़ने के लिए ही पहली ढाल पंडित जी ने लिखी हैं, जहाँ संसार का वास्तविक चित्रण क्या हैं, कैसा हैं वह बताया हैं।

संसार भावना का वर्णन किस ढाल में हैं; इसका उत्तर मुख्य रूप से सभी “५वी ढाल” कहेंगे, पर वास्तव में संसार भावना इसी ढाल में समझाई गई हैं। ये ढाल की “संसार भावना” को जो समझ ले उसे बस मोक्ष की, स्वभाव, निर्ग्रन्थता, वैराग्य, वीतरागता की ही भावना होती हैं; संसार की नहीं।

क्यूंकि यह जीव प्राप्त पर्याय में तन्मय होता हुआ, पुण्य के उदय में इन्द्रिय सुख में ठगा जा रहा हैं, जिनवाणी माँ उसे सच्चाई क्या है वह बताती हैं। ४ गति में यह जीव कैसे कैसे दुःख भोगता हैं वह आईने के भाँती दिखलाती हैं। ४ गति में कहीं भी सुख नहीं हैं वह समझाती हैं। वर्तमान में जो पुण्य संयोग प्राप्त हैं इसलिए ऐसा भ्रम हैं के ये ऐसा ही रहने वाला हैं; उसको क्षणिक बताकर वैराग्य जगाती हैं।

इस ढाल में ४ गति का और उसमे जो दुःख हैं उसका वर्णन हैं। “काल अनंत निगोद मंझार” से शुरू करके फिर से “तह ते चय स्थावर तन धरे, यो परिवर्तन पुरे करे” तक की यह जीव की अनादि की पंच परावर्तन रूप दुखद कथा को बताया गया है।

निगोद में अनंत काल रहने के बाद, इस जीव को कोई अतिशय से स्थावर पर्याय प्राप्त होती हैं। वहाँ पर अनंत काल बिताने के बाद दुर्लभ जैसी त्रस पर्याय मिलती है। स्थावर-२-३-४ इन्द्रिय जीवों के दुःख तो हम कैसे कहे? इन जीवों को तो दुनिया में लोग जीव ही नहीं गिनते हैं! मारते हैं, कुचलते हैं, अग्नि से नष्ट कर देते हैं - उनके दुखों को तो सच में सर्वज्ञ देव ही जानते हैं! ५ इन्द्रिय तिर्यंच में भी संज्ञी और असंज्ञी होके अनेक दुःख भोगता हैं। नरक के दुखों का वर्णन कौन कर सकता है भला? फिर भी वहाँ कैसे और क्या क्या दुःख है उसको सुनकर संसार-भय से रोम-रोम कांप उठते हैं! महाभाग्य से इस जीव को दुर्लभ मनुष्य पर्याय प्राप्त होती हैं। इसमें भी “बालपने में ज्ञान न लह्यो, तरुण समय तरुणीरत रह्यो, अर्धमृतकसम बुढापनो कैसे रूप लखे आपनो” कहकर कैसे मनुष्य भव; जो भव के अभाव के अभाव के लिए मिला था उसे यह जीव व्यर्थ मे गुमा देता हैं यह बताया हैं। कोई सोचेगा के कही नहीं तो देव गति में तो सुख होगा न? पर पंडितजी कहते हैं के नहीं विमानवासी भी हो जाओ पर वहां भी अनंत सुख हैं!

तो फिर सुख कहाँ हैं?

“जो विमानवासी हु थाय, सम्यग्दर्शन बिन दुःख पाय”

दुःख मिथ्यात्व के कारण हैं; और सुख सम्यक्त्व से हैं! और यही मोक्ष का मार्ग हैं। पर क्योंकि मिथ्यादृष्टि हैं, पर में ममत्व, कर्तुत्व हैं; इसलिए देवगति से भी निकलकर फिरसे एकेन्द्रिय में जाकर अनंत दुःख भोगता हैं; और इस प्रकार संसार के चक्रव्यूह में समा जाता हैं।

दूसरी ढाल

पहली ढाल के अंत में यह तो समझ आ गया के गति का, संयोग का सुख से कोई सम्बन्ध नहीं हैं। जो होता तो देवगति के जीव जिनके पास इतनी भोग सामग्री हैं - वे अनंत सुखी होते। पर नहीं, सच में दुःख का सम्बन्ध मिथ्यात्व हैं और सुख का सम्यक्त्व से

क्या हैं ये मिथ्यात्व? इसके क्या भेद हैं? जीव की क्या भूल हैं? उसका वर्णन यह ढाल में किया गया हैं। मिथ्यादर्शन मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र से ही जीव को जन्म-मरण के दुःख हैं और उनको तजना ही योग्य हैं।

मिथ्यात्व के २ भेद हैं

१. गृहीत - नया ग्रहण किया हुआ भ्रम

२. अगृहीत - अनादि से चलती आ रही जूठी श्रद्धा

अगृहीत मिथ्यादर्शन में (२ - ७ छंद) - ७ तत्त्व का और उसके सम्बन्धी इस जीव की भूल का संक्षिप्त और सुन्दर वर्णन हैं।

अगृहीत मिथ्याज्ञान में (७ छंद) - मिथ्यादर्शन सहित जो भी ज्ञान हैं वह मिथ्याज्ञान कहा गया हैं।

अगृहीत मिथ्याचारित्र में (८ छंद) - मिथ्यादर्शन और मिथ्याज्ञान सहित जो भी जीव की पांच इन्द्रिय विषय में प्रवृत्ति हैं उसे

गृहीत मिथ्यादर्शन (९ से १२ छंद) - कुदेव, कुगुरु, कुधर्म का वर्णन हैं

गृहीत मिथ्याज्ञान (१३ छंद) - कुशास्त्र का वर्णन हैं

गृहीत मिथ्याचारित्र (१४ छंद) - आतम अनात्म के ज्ञान बिना जो भी बाहर में ख्याति लाभ पूजा आदि की इच्छा से की जाने वाली क्रियाए जैसे कुतप आदि  हैं उसे गृहीत मिथ्याचारित्र बताया हैं

इस प्रकार अंतिम में पंडित जी हमे ये सब मिथ्यात्व को त्याग कर “आतम के हित पंथ लाग” का उपदेश दे रहे हैं। कह रहे हैं के ये सब जगत की जाल को त्याग अब आत्मा में लीन हो जाओ!

पर ये आत्मा के लिए “हित पंथ” क्या हैं? उसकी चर्चा ३सरी ढाल में हैं।

तीसरी ढाल

सर्वप्रथम ही इस ढाल में सुख और दुःख के वास्तविक लक्षण की बात की। दुःख का लक्षण आकुलता हैं। इससे यह सिद्ध हुआ के इन्द्रिय विषय से जो उत्पन्न सुख हैं वह सुख नहीं सुखाभास अर्थात दुःख ही हैं। सच्चा सुख तो मोक्ष में ही हैं इसका निर्णय सबसे पहले कराया गया हैं। मोक्ष का मार्ग क्या हैं? कहते हैं के “सम्यग्दर्शन ज्ञान चरण शिवमग” अर्थात “सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः” को यहाँ कहा हैं।

“शिवमग सो द्विविध विचारो” बहुत मार्मिक पंक्ति हैं। मोक्षमार्ग २ प्रकार का नहीं हैं, उसको विचारने के; निरूपण करने के, कहने के २ भेद हैं - निश्चय और व्यवहार। इसमें हमे मोक्षमार्ग प्रकाशक ग्रन्थ में दिए गए निश्चय-व्यवहार की चर्चा की झलक मिलती हैं।

निश्चय मोक्षमार्ग का वर्णन

  • निश्चय सम्यग्दर्शन = आत्मा की रूचि, श्रद्धान
  • निश्चय सम्यग्ज्ञान = आत्मा का सम्यक जानपना
  • निश्चय सम्यग्चारित्र = आत्मा में लीनता

व्यवहार सम्यग्दर्शन का वर्णन

  • ७ तत्त्व का यथार्थ स्वरुप और उनकी प्रतीति ही व्यवहार सम्यग्दर्शन हैं।
  • इस प्रकरण में जीव (बहिरात्मा, अंतरात्मा और परमात्मा का वर्णन), अजीव (इसमें ५ द्रव्यों का वर्णन), आस्त्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष तत्त्व का वर्णन हैं।
  • सच्चे देव शास्त्र गुरु और अहिंसामयी धर्म को इस सम्यग्दर्शन में निमित्त जानना चाहिए। जिन्हे ७ तत्त्व का यथार्थ निर्णय होता हैं उन्हें सच्चे देव शास्त्र गुरु का सम्यक निर्णय होता ही हैं।

व्यवहार सम्यक्त्व का वर्णन करके अभी इस ढाल में जो सम्यग्दृष्टि हैं उनकी चर्चा करते हैं। इस सम्यक्त्व के अनुसन्धान में निम्न बाते पंडितजी ने की हैं

  • २५ दोष
    • ८ मद
    • ३ मूढ़ता
    • ६ अनायतन
    • ८ शंकादि दोष
  • ८ गुण (अंग)

यहाँ एक सुन्दर पंक्ति आती हैं - “बिन जानेतै दोष गुणन को कैसे ताजिये गहिये”, अर्थात जो गुण-दोष को जाने बिना क्या ग्रहण करना हैं और किसका त्याग करना हैं इसका विवेक कैसे रहेगा?

अनादि से इस जीव ने इन दोनों में भेद नहीं जाना, दोष को गुण और गुण को दोष माना; इसलिए ही न तो गुण प्रगट हुए हैं और न तो दोष विनशे हैं। इसलिए अब इनका कथन करते हैं।

सम्यक्त्व के ८ अंग

१. निशंकित - तत्त्व में शंका नहीं होना

२. निकांक्षित - कोई भी सांसारिक कांक्षा नहीं होना

३. निर्विचिकित्सा - रत्नत्रय से पवित्र मुनि के अशुचि तन को जुगुप्सा रहित देखना

४. अमूढ़दृष्टि - तत्त्व और कुतत्व की यथार्थ पहचान होना

५. उपगूहन - अपने गुण और अन्य के दोष को ढांके

६. स्थितिकरण - धर्म से चिगते साधर्मीजन को सही मार्ग में पुनः स्थापित करना

७. वात्सल्य - साधर्मी के प्रति निःस्वार्थ प्रेम रखना

८. प्रभावना - जैन धर्म की शोभा बढ़ाना

इनके विपरीत जो भी हैं वे दोष हैं जिससे सम्यग्दृष्टि हमेशा दूर करता हैं।

अभी ८ मद की चर्चा करते हैं। जिसे अपने स्वरुप का सम्यक ज्ञान हैं, पर से उदासीनता हैं उसे बाहर के संयोगो के प्रति मान कैसे हो? ये ८ मद कौनसे हैं वह देखते हैं -

१. कुल मद

२. जाति मद

३. रूप मद

४. विद्या मद

५. धन मद

६. बल मद

७. तप मद

८. प्रभुता मद

मिथ्यादृष्टि अपने आप को पर मानकर, शरीर में और बाह्य संयोगो में एकत्व बुद्धि करता हैं। जब वे शरीरादि उसके अनुरूप स्वयं परिणमते हैं; तब वह उसमे कर्तुत्व करके मद करता हैं, मान करता हैं।

इससे विपरीत सम्यग्दृष्टि पर में ममत्व, कर्तुत्व से उत्पन्न अभिमान से मुक्त हैं क्योंकि उसे स्व और पर का सम्यक भेद विज्ञान हैं; वस्तु स्वरुप का यथार्थ ज्ञान हैं।

सही ही कहा हैं -

तन से जिसका ऐक्य नहीं हो, सुत, तिय, मित्रों से कैसे।

चर्म दूर होने पर तन से, रोम समूह रहे कैसे॥

Q - आप कह रहे हो के सम्यग्दृष्टि ८ मद से रहित हैं; तो क्या सम्यग्दृष्टि “मान” कषाय से रहित हैं?

A - हाँ भी और ना भी। सम्यग्दृष्टि को अनंतानुबंधी “मान” कषाय का अभाव होता हैं। श्रद्धा में तो परद्रव्य से भिन्न अपने को देखता हैं। पर चारित्र में अभी भी ३ कषाय चौकड़ी का सद्भाव होने से “मान” तो विद्यमान हैं; पर सम्यग्दर्शन में जो ८ मद की चर्चा हैं उसमे मुख्यरूप से अनंतानुबंधी मान कषाय के अभाव के उपलक्ष्य में हैं और व्यवहार से बाह्य आचरण कैसा होता हैं उसकी हैं।

६ अनायतन दोष

सम्यक्त्वादिगुणानामायतनं गृहमावास आश्रयआधारकरणं निमित्तमायतनं भण्यते तद्विपक्षाभूतमनायतनमिति।

सम्यक्त्वादि गुणों का आयतन घर-आवास-आश्रय (आधार) करने का निमित्त, उसको `आयतन' कहते हैं और उससे विपरीत अनायतन है।

  • द्रव्यसंग्रह / मूल या टीका गाथा 41/69

उपर्युक्त गाथा से हमे आयतन और अनायतन की परिभाषा ज्ञात हुई। सच्चे देव शास्त्र गुरु में श्रद्धा ही अनायतन दोष को स्वयमेव ही दूर करती हैं।

श्रद्धानं परमार्थाना-माप्तागमतपोभृताम्

त्रिमूढ़ापोढ-मष्टाङ्गं, सम्यग्दर्शन-मस्मयम् ॥4॥

परमार्थभूत आप्त, आगम और मुनि का तीन मूढ़ता रहित आठ अंग से सहित आठ प्रकार के मदों से रहित श्रद्धान करना, सम्यग्दर्शन कहलाता है ।

  • रत्नकरण्ड श्रावकाचार

इस प्रकार यह सिद्ध हुआ के सम्यग्दृष्टि ६ अनायतन दोष से रहित होता हैं।

“कुगुरु-कुदेव-कुवृष-सेवक की नहीं प्रशंस उचरे हैं” - अर्थात कुगुरु, कुदेव और कुधर्म व उन तीनों के उनको मानने वाले, सेवा करने वाले सभी अनायतन हैं और उनकी सम्यग्दृष्टि कभी प्रशंसा, अनुमोदना आदि नहीं करता।

*इसमें इस बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी हैं के उपगूहन अंग धारी सम्यग्दृष्टि जो दूसरों के गुण ढांकता हैं वह इनकी द्वेषबुद्धि से निंदा कदापि नहीं करता; अपितु उनका वात्सल्य से मोक्षमार्ग में स्थितिकरण करता हैं।   *****

३ मूढ़ता - कुगुरु सेवा, कुदेव सेवा और कुधर्म सेवा से भी सम्यग्दृष्टि रहित होता हुआ मोक्षमार्ग में अग्रसर होता हैं।

कैसा हैं सम्यग्दृष्टि?

  • जो २५ दोष रहित और ८ गुण सहित हैं वह पुरुष सम्यक्त्व से भूषित हैं
  • अप्रत्याख्यानावरणीय कषाय; जो चारित्र का दोष हैं उससे अव्रती होते हुए भी इंद्र द्वारा पूज्य हैं

अव्रती होते हुए, घर में रहते हुए भी उनकी वृत्ति कैसी होती हैं?

  • जैसे जल से अछूता कमल होता हैं
  • नगरनारी का प्यार होता हैं (उसे सिर्फ पैसे से प्यार हैं,मनुष्य से बस औपचारिकता से व्यवहार हैं)

सम्यक्त्व की महिमा

तीन लोक तिंहु काल माहि नहीं, दर्शन सो सुखकारी कहकर इस बात की घोषणा की हैं के सम्यग्दर्शन के सदृश इस जगत में कोई भी सुख देने में समर्थ नहीं हैं।

पुण्य के उदय से बाहर के सभी भोग सामग्री वर्तमान में भले सुख का आभास कराते हो, पर यह जीव उनमे पाप करके अंत में महादुख ही भोगता हैं। शुभ भाव का लक्ष्य भी आकुलता का कारण बन जाता हैं और उससे प्राप्त पुण्य भी क्षीण हो जाता हैं।

पर सम्यग्दर्शन एक बार प्राप्त करने पर यह जीव के संसार का किनारा आ जाता हैं, किंचित न्यून अर्ध-पुद्गल परावर्तन समय के अंदर अंदर अवश्य मोक्ष की प्राप्ति करता हैं और अनंत सुख भोगता हैं। हीन पर्याये जिसे नरक, विकलेन्द्रिय, स्त्री, नपुंसक आदि तो उसे सम्यग्दर्शन की उपस्थिति में मिलती ही नहीं हैं!

इस प्रकार इसे सकल धर्म का मूल कहा हैं**,** और इस बिन करनी दुखकारी पद से स्पष्ट किया के अब तक संसार में जो भटकना पड़ रहा हैं, दुःख भोगना हो रहा हैं; वह वास्तव में बस दुखकारी ही सिद्ध हुआ हैं - क्योंकि उसमे सम्यक्त्व का अभाव हैं।

अंतिम छंद में पंडितजी सम्यक्त्व के अनुसंधान में कहते हैं के

  • सम्यग्दर्शन मोक्षमहल की प्रथम सीढ़ी हैं (क्योंकि ४थे गुणस्थान से मोक्षमार्ग की शुरुआत होती हैं)
  • इसके बिना सभी ज्ञान और चारित्र संभव ही नहीं हैं; अर्थात श्रद्धा पक्की हुए बिना सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र नहीं हो सकते

फिर उपदेश देते हुए इस ढाल को पूर्ण करते हैं के -

“हे भव्य जीवो! ऐसे पवित्र सम्यग्दर्शन को धारण करो! हे सयाने दौलत; अब सुन, जान और सावधान रहो, यह समय व्यर्थ में गुमावो नहीं; जो सम्यग्दर्शन प्राप्त नहीं किया तो यह मनुष्य पर्याय फिरसे मिलना मुश्किल हैं!”

चौथी ढाल

पूर्व की ढाल में निश्चय रत्नत्रय और व्यवहार सम्यग्दर्शन की चर्चा हुई थी। मोक्षमार्ग में स्थित आत्मार्थी जीव को सम्यग्दर्शन धारण करके सम्यग्ज्ञान को दृढ करने का उपदेश देते हैं।

सम्यग्दर्शन के साथ सम्यग्ज्ञान भी होता हैं; पर उन्हें भिन्न जानना चाहिए। यहाँ इन दोनों के लक्षण में भेद पर चर्चा की हैं। जैसे प्रकाश और दीपक एक साथ होते हुए भी प्रकाश दीपक से होता हैं; वैसे ही सम्यग्ज्ञान और सम्यग्दर्शन साथ में होते हुए भी सम्यग्दर्शन कारण हैं और सम्यग्ज्ञान कार्य हैं।

सम्यग्ज्ञान के पर्याय से भेद

१. प्रत्यक्ष

  • विकल
    • अवधिज्ञान
    • मनःपर्ययज्ञान
  • सकल
    • केवलज्ञान

२. परोक्ष

  • मतिज्ञान
  • श्रुतज्ञान

सम्यग्ज्ञान की महिमा

सम्यग्ज्ञान कैसा है? ज्ञान समान न आन जगत में सुख को कारण अर्थात सबसे सुखकर हैं; और यही तो जन्म, जरा आदि दुःखो से मुक्त कर अनंत सुख में धर देने वाला हैं!

अज्ञानी भले ही अनंत जन्मों तक तप करे, तो भी सम्यग्ज्ञान के बिना कर्म की निर्झरा नहीं हो सकती। अज्ञानता में किये गए तप अंत में तो संसार का ही कारण सिद्ध हैं। वस्तु स्वरुप के यथार्थ ज्ञान बिना भला कैसे कोई कर्म काट सकता हैं?

इससे विपरीत अव्रती ज्ञानी मन, वचन, काय की प्रवृत्ति को रोककर शुद्ध स्वानुभव की दशा में क्षण में अनंत कर्म की निर्जरा सहज ही हो जाती हैं। कर्म कोई आत्मा का दुश्मन या मित्र नहीं हैं। आत्मा जब स्वभाव-भाव रूप परिणमे तो कर्म क्यों ही आत्मा से चिपके?

ऐसा बालतप इस जीवने अनंत बार किया। इस शुभ भाव के फल में अनंत बार अंतिम ग्रैवेयक में भी जन्मा, वहां की सुख सामग्री भी भोगी; पर मिला तो बस दुःख ही। आत्मा के ज्ञान के बिना सुख कभी मिल सकता हैं? कदापि नहीं!

इसलिए भगवान के कथित तत्वों का संशय (शंका), विभ्रम (विपरीत ज्ञान) और मोह (अनध्यवसाय) को त्यागकर अभ्यास करना चाहिए। यह मनुष्य पर्याय अति दुर्लभ हैं। उसमे भी उत्तम कुल, जिनवाणी सुनने मिलना महा दुर्लभ हैं। इसको व्यर्थ गँवाना अर्थात समंदर में डूबे हुए सच्चे रत्न का फिरसे मिलना जितना मुश्किल हैं।

धन समाज आदि कोई काम नहीं आएगा; सम्यग्ज्ञान प्राप्त हुए बाद यह अचल रहता हैं - इसलिए कोटि उपाय बनाय भव्य ताको उर आनो कहकर श्रीगुरु मर पच के भी इसे प्राप्त करने की प्रेरणा देते हैं। जो भी मोक्ष गए और आएगी जावेंगे; ये सब ज्ञान की ही महिमा हैं। इच्छा की ज्वाला इस जीव के लिए दावानल के सामान हैं। कोई भी छोटा मोटा उपाय (पूजा आदि शुभ भाव, मन को कोई और कार्य में भटकाना, इच्छा को पूर्ण करना आदि) इस इच्छा को कभी शांत नहीं कर सकता; उल्टा उस अग्नि को और बढ़ा देता हैं। जैसे दावानल को सिर्फ घनघोर वर्षा ही शांत कर सकती हैं, वैसे ही सम्यग्ज्ञान वो घनघोर वर्षा हैं जो इच्छा की ज्वाला को बुझा देता हैं!

इस पुण्य पाप के फल को देखकर भटकना नहीं हैं, अटकना नहीं हैं; क्यूंकि ये सब पुद्गल का खेल हैं; क्षणभंगुर हैं - इसलिए सब जगत के दंद-फंद को छोड़कर बस आत्मा की आराधना ही करनी चाहिए।

सम्यक्चारित्र के भेद

सम्यग्ज्ञान को धारण कर अब सम्यक्चारित्र धारण करने का उपदेश देते हैं। इस प्रकरण में एकदेश चारित्र और ज्ञानी श्रावक के १२ व्रतों की मुख्यरूप से चर्चा हैं।

१. एकदेश

२. सकलदेश

ज्ञानी श्रावक के १२ व्रत

  • ५ अणुव्रत
    • अहिंसाणुव्रत
    • सत्याणुव्रत
    • अचौर्याणुव्रत
    • ब्रह्मचर्याणुव्रत
    • परिग्रह परिमाण व्रत
  • ३ गुणव्रत
    • दिग्व्रत - आजीवन देश दिशा आदि सम्बन्धी गमन करने की मर्यादा
    • देशव्रत - दिग्व्रत में की गयी मर्यादा में भी गाँव आदि का माप करना
    • अनर्थदंडव्रत - बिना प्रयोजन के पाप (दंड) कार्यो का निषेध
  • ४ शिक्षाव्रत
    • सामायिक व्रत - मन में निर्विकल्पता अर्थात शल्य के अभाव को धारण करना
    • प्रोषधोपवास व्रत - पर्व के दिनों पर पाप कार्यो को त्यागकर उपवास करना
    • भोगोपभोग परिमाणव्रत - भोग उपभोग की सामग्री की सिमा नियत करना
    • अतिथिसंविभाग व्रत - पात्र (मुनि, व्रती या श्रावक) दान करके ही भोजन ग्रहण करना

इस सभी व्रतों के अतिचार की चर्चा भी इस ढाल में की गयी हैं। ऐसे व्रतों को जो निरतिचार पालन करता हैं वह १६वे स्वर्ग तक उत्पन्न होता हैं और वहां से फिर मनुष्य पर्याय पाकर मोक्ष सिधाता हैं।

मिथ्यात्व से युक्त जीव देव गति से -

तँहते चय थावर तन धरे, यो परिवर्तन पुरे करे (पहली ढाल)

और सम्यग्दृष्टि जीव देव गति से -

तँहते चय नरजन्म पाय, मुनि हौ शिव जाहै (चौथी ढाल)

यह हैं सम्यक्त्व की महिमा!

पाँचवी ढाल

श्रावक के देशव्रत का वर्णन करके अब जो सकलव्रतधारी मुनिराज भगवंत हैं उनकी चर्चा करते हुए कहते हैं के मुनि सकलव्रती बड़भागी - जिनको भोगों के प्रति वैराग्य परिणति; उस वैराग्य की जननी “अनुप्रेक्षा” का नित्य ही चिंतवन करते हैं।

इस ढाल में सुन्दर रीती से बारह भावना का चिंतवन प्रस्तुत किया हैं जो आत्मार्थी जीव का नित्य आहार हैं, प्राण हैं। जिससे शुद्ध परिणति प्रगट हो उसके निमित्तरूप बारह भावना को ह्रदय में धारण करने से उत्तम कार्य क्या हो सकता हैं?

बारह भावना के चिंतन से कैसा अनुभव होता हैं?

कहते हैं के जैसे पवन ज्वाला से टकराते ही अग्नि तेज़ भभकती हैं; वैसे ही इन बारह भावना का चिंतन करने से जीव को शान्ति, समता और सुख का अतिशय अनुभव होती हैं। इससे यह अत्यंत स्पष्ट हुआ के सब कुछ अनित्य हैं, अशरण हैं, आदि का चिंतन करने से कोई दुःख या मुरझाये हुए चेहरे बनाने वाला नहीं होता! वैराग्य कोई रोने धोने का नाम नहीं हैं। संसार से उदासीनता तो नास्ति से कथन हैं, अस्ति से तो आत्मा के अनुभव से सच्चे सुख का अनुभव होता हैं - यह बात हैं!

इस प्रकार जो बारह भावना के चिंतन से दुःख या चिंता मन में हो रही हैं तो कही न कही चिंतन सम्यक नहीं हैं। क्योंकि वैराग्य तो आनंदमई ही होता हैं, बस अभी आप पर हैं के आप के लिए सुख की परिभाषा क्या हैं।

जब ही जिय आतम जाने, तब ही जिय शिवसुख ठानै - इससे बारह भावना के चिंतन का केंद्रबिंदु बताया हैं। मोक्षसुख आत्मा को जब जानेंगे तभी मिलेगा, सिर्फ ये चिंतन से भी काम नहीं होगा - क्योंकि बिना आत्मज्ञान के यह चिंतन भी तो विशुद्ध भाव हैं जो बंध का ही कारण ठहरा। इसलिए तो कहा हैं - ध्रुव धाम की आराधना ही आराधना का सार हैं

अब आगे अनित्य आदि १२ भावना की चर्चा करते हैं। इसमें पहली ६ भावना वैराग्य-परक हैं जो भावभूमि को भीनी करती हैं, उपजाऊ बनाती हैं और फिर पीछे की ६ भावना तत्त्व-परक हैं जिससे तत्त्व के बीज बोये जाते हैं जिससे वैराग्य की लहरे उठती हैं जो इस जीव की जाव को संसार से पार उतार देती हैं।

संसार में सब कुछ अनित्य हैं, शुद्धात्मा ही नित्य हैं;

संसार में सब कुछ अशरण हैं, शुद्धात्मा ही शरण हैं,

संसार में कही भी सुख नहीं हैं, शुद्धात्मा में ही सुख हैं,

मैं एक हूँ यह एकत्व, कोई अन्य मेरा नहीं हैं यह अन्यत्व,

शरीर अशुचिमय हैं, आस्रव दुखकारी हैं,

संवर, निर्जरा सुख के कारण,

लोक ६ द्रव्यमयी हैं, इसका कोई कर्ता-हर्ता नहीं हैं,

इस लोक में बस एक सम्यक्त्वरूप बोधि ही दुर्लभ हैं, अन्य कुछ नहीं

मोह से न्यारा रत्नत्रय धर्म ही अचल सुख को करनेवाला हैं।

इस ढाल के अंत में कहते हैं - ‘ताकौ सुनिए भवि प्राणी, अपनी अनुभूति पिछानी’ अर्थात अब इन मुनिवरों का चारित्र सुनो और अपने आत्मा का अनुभव करो।

छठीं ढाल

इस ढाल का प्रारम्भ ही मुनिराज भगवंत के व्यवहार चारित्र के वर्णन से होते हैं।

किन के धारी होते हैं मुनिराज?

  • ५ महाव्रत
    • अहिंसा महाव्रत
    • सत्य महाव्रत
    • अचौर्य महाव्रत
    • ब्रह्मचर्य महाव्रत
    • परिग्रहत्याग महाव्रत
  • ३ गुप्ति
    • मन गुप्ति
    • वचन गुप्ति
    • काय गुप्ति
  • ५ समिति
    • ईर्या समिति - जमीन देख कर विहार करना
    • भाषा समिति - हित मित प्रिय वचन
    • एषणा समिति - ४६ दोष रहित तप की वृद्धि के लिए आहार ग्रहण करना
    • आदान निक्षेपण समिति - कोई वस्तु लेनी, रखते वक्त कोई जीव की हिंसा न हो उसका ध्यान रखना। यहाँ पिंछी इस संयम को पालने का साधन होता हैं और शास्त्र उनके ज्ञान का साधन हैं।
    • प्रतिष्ठापन समिति - मल, मूत्र आदि का यथायोग्य स्थान पर त्याग करना

मुनिराजों के ६ आवश्यक

१. सामायिक

२. स्तुति

३. वंदन

४. स्वाध्याय

५. प्रतिक्रमण

६. कायोत्सर्ग

मुनिराज के अन्य गुण

१. अस्नानत्व

२. अदंतधोवन

३. नग्नता

४. भूमिशयन

५. खड़े-खड़े भोजन

६. एक बार आहार

७. केशलोंच

और २२ परिषहजय से सुशोभित होते हैं।

“पाँच महाव्रत, पाँच समिति, पाँच इंद्रियों का रोध, केशलोंच, षड्आवश्यक , अचेलकत्व, अस्नान, भूमिशयन, अदंतधोवन, खड़े-खड़े भोजन, एक बार आहार, ये वास्तव में श्रमणों के 28 मूलगुण जिनवरों ने कहे हैं।”

  • मूलाचार

और कैसे होते हैं मुनिराज?

  • १२ तप को तपते हैं
  • १० धर्म धारी होते हैं
  • सदा ही रत्नत्रय का सेवन करते हैं
  • संघ में अथवा अकेले विहार करते हैं

स्वरूपाचरण चारित्र (शुद्धोपयोग) का वर्णन

स्वरुप में रमणता प्रगट होते ही आत्मा के ज्ञानादि अनंत गुण संपत्ति पर्याय में प्रगट होते हैं। जिन परम पैनी सुबुद्ध छैनी डारि अंतर भेदिया - अर्थात जो वीतरागी मुनिराज अत्यंत तीक्ष्ण भेदविज्ञानरूपी डारि से स्व और पर का भेद करते हैं; आत्मा में आत्मा के लिए आत्मा से आत्मा स्वयं को ग्रहण करता हैं तब गुण गुणी ज्ञाता ज्ञान का विषय और ज्ञानमें-आत्मा में कोई भेद नहीं रहता।  ध्यान, ध्याता और ध्येय का कोई विकल्प भेद नहीं बचता।

इस प्रकरण में स्वरूपाचरण की अद्भुत चर्चा प्रगट की हैं। ऐसे ही शुद्धोपयोग के फल में अरिहंत दशा प्रगट होती हैं जहाँ अनंत चतुष्टय प्रगट होते हैं और अन्य भव्य जीवो को मोक्षमार्ग बताते हैं। और ऐसे यह बताये मोक्षमार्ग पर चलके ऐसा अपूर्व अवसर आ जाता हैं जब भाव भाव से त्रास पाता हुआ जीव इस संसार चक्र से मुक्त अनंत काल तक सिद्ध अवस्था में अनंत सुख को भोगता हैं - “रही हैं अनंतानंत काल, यथा तथा शिव परिणये”

रत्नत्रय की महिमा

धन्य हैं वे जीव जिन्होंने यह अपूर्व कार्य किया! धन्य हैं वे जीव जिन्होंने अपने आत्मा को जाना! धन्य हैं वे जीव जिन्होंने अनंत पंच परावर्तनरुपी संसार का हमेशा हमेशा के लिए अंत कर दिया। सचमें ऐसे जीव धन्य हैं जिन्होंने अनंत को भी साक्षय कर दिया!

अंत में पंडितजी बहुत भाव-विभोर होकर करुणा से आत्मा का हित करने का उपदेश देते हैं। यह पंक्तियाँ अपनेआप में अद्भुत हैं, रोम रोम काँप जाए ऐसी हैं; और जो इसको पढ़ के अनुसरण करे तो वास्तव में कल्याण हो जाए। इन पंक्तिओ को अपने शब्द में लिखने-कहने की सामर्थ्य मेरे जैसे मंद बुद्धि में कहाँ? इसलिए हूबहू उन पंक्तियों को प्रस्तुत करके अपनी बात को विराम देता हूँ।

मुख्योपचार दुभेद यों बड़भागि रत्नत्रय धरैं।

अरु धरैंगे ते शिव लहैं तिन, सुयश-जल-जग-मल हरैं॥

इमि जानि आलस हानि, साहस ठानि यह सिख आदरो।

जबलौं न रोग जरा गहै तबलौं झटिति निज हित करो॥(14)

यह राग आग दहै सदा, तातैं समामृत सेइये।

चिर भजे विषय कषाय अब तो त्याग निजपद बेइये॥

कहा रच्यो पर-पद में न तेरो पद यहै क्यों दु:ख सहै।

अब ‘दौल’ होउ सुखी स्व-पद रचि, दाव मत चूकौ यहै ।।(15)

Myth busters

  • स्वरूपाचरण चारित्र के वर्णन को पढ़के बहुत बाते clear हो गयी
  • छहढाला का आद्योपांत स्वाध्याय से व्यवहार और निश्चय रत्नत्रय के वर्णन कैसे और कहाँ हैं उसका ज्ञान हुआ
  • मुनिराजों के २८ मूलगुण आदि का यथार्थ स्वरुप का ज्ञान हुआ