Skip to main content

दिन थे दिवाली के…

जैसा की आप सब को पता ही होगा, इन दिनों में लोग नए-नए कपडे ख़रीदते हैं, उनको पहनते हैं और हँसी-खुशी से एक दूसरे से मिलते-झूलते हैं।

तो मैं भी कपडे खरीदने के लिए मॉल में गया। घर से ही मन बनाया था कि इस बार तो कुछ अलग, कुछ नया पहनना हैं। मन ही मन मैं अपने वर्तमान के पहनावे और वस्त्रों से असंतुष्ट था। वैसे तो मेरे पास बहुत सारे कपड़े हैं जो मैंने अति चाव से पहले लिए थे, पर आज वही मुझे अनिष्ट लग रहे हैं। कोई मुझे जो कह दे कि भाई तुम्हारे पास तो कितने सारे कपड़े हैं, अभी तो लिए थे तुमने? तो यह सुनकर मैं चीड़ जाता हूँ कि मेरे पास कहाँ इतने सारे कपड़े हैं? कपडे तो मुझे पहनने हैं - मुझे मत सिखाओ…

इसका कारण मेरे ह्रदय में बैठी हुई असंतुष्टि, लोभ-वृत्ति और अंदर छुपी हुई ‘इच्छा’ हैं जो मुझे ये सारा परिग्रह करवा रही हैं। ठीक हैं कहते हैं प. टोडरमल जी - इच्छा ही सर्व दुखों का कारण हैं, आकुलता की जननी हैं। और जहाँ आकुलता हो वह शांति कैसे हो सकती हैं भला?

मॉल में पहुँचा तो मेरे सामने कपड़ो का खजाना था। एक नहीं, दो नहीं, हजारों की संख्या में अलग-अलग ब्रांड, स्टाइल, रंग आदि के जीन्स, टीशर्ट, शर्ट आदि टंगे हुए थे। सच बताऊ तो एक सेकंड के लिए ऐसा लग ही जाता हैं कि ‘सारे ही अच्छे हैं, इन सब को try कर लेता हूँ! काश मेरे पास इतने पैसे होते की इन सब को मैं खरीद पाता? काश इतना समय होता की २-४ दुकाने और देख पाता?’ पर क्या करे, न इतना धन हैं, न समय…

दूर से देखो तो इसमें किसीको ज़्यादा कुछ आकुलता नहीं दिखेगी; पर जब सूक्ष्मता से देखें तो ये जीव का परिग्रह इतना हैं कि १ दुकान नहीं, २ दुकान, पूरा मॉल दे दो तो भी उसे कम पड़ जाएगा! मॉल की तो क्या बात करे, पुरे लोक की सारी संपत्ति प्राप्त हो जाये तो भी इच्छा की ज्वाला को शांत करने में समर्थ नहीं हैं! सच में, इच्छा पर नियंत्रण करना अति आवश्यक हैं।

मैंने कुछ टीशर्ट और पैन्ट्स पहनकर देखे। मुझे अच्छे लगे। पर फिर मेरे भाई ने देखा और बोला नहीं जम रहा ज़्यादा; और वही क्षण मुझे वही वस्त्र अनिष्ट दिखने लगा। पूरी दुकान जितने कपड़े मैंने पहनकर देखे और लिए तो सिर्फ २ ही!

समय की कीमत शायद मुझे सच में नहीं हैं; कि व्यर्थ की चीज़ो में इतना वक्त बरबाद करना जायज़ लगता हैं और एक घंटे का प्रवचन मुझे मेरी दिनचर्या में शामिल करना मुश्किल लगता हैं! इस प्रसंग से ये तो मैं समझ गया कि वस्तु तो अच्छी-बुरी हैं नहीं; सिर्फ मेरी मान्यता से ही मैं दुःखी हूँ। एक भिखारी की तरह दुकान-दुकान घूमकर इस शरीर के लिए ओढ़ने का सामान इकट्ठा कर रहा हु। भिखारी अपने लिए तो मांगता हैं; मैं तो उससे भी गया गुजरा हूँ, जो इस जड़ शरीर को सुन्दर बनाने का प्रयास कर रहा हु!

चलो ऐसे करते-करते मेरी शॉपिंग पूरी हुई। जितना मैंने इस महीने जिनशासन की प्रभावना के लिए दान भी नहीं दिया; उससे ज़्यादा पैसो में तो मैंने कपडे खरीद लिए!

क्या मैं इतना अमीर हो गया हूँ कि पैसों से मोह बढ़ाने वाली वस्तुए लेना मुझे गर्व की बात लगती हैं? ऐसा तो नहीं हैं न की मेरे अंदर अभिमान आ गया हैं, लोभ कषाय तीव्र हो गयी हैं, मोह असीमित हो गया हैं; और इन सब क्रिया करके भी मुझे सुख दिखाई दे रहा हैं? कभी कभी लगता हैं क्या मैं सच में इतना मुर्ख हूँ या कोई और हैं जो मुझे ये सब करवा रहा हैं! हाँ, वो तो मेरा मिथ्यात्व हैं… मेरा मोह हैं जो दिन-रात नशे में रखके अनाब-शराब काम करवा के मुझे मेरे स्वरुप के पास पहुँचने, उससे मिलने से रोक रहा हैं!

शॉपिंग बहुत अच्छे से, निर्विघ्न संपन्न हो गयी। जैसा मैंने सोचा था, वैसा ही हुआ - एकदम ट्रेंडी कपड़े ले लिए इस बार तो! ऐसा विचार आता हैं कि क्या होता जो इससे उल्टा होता? एक भी अच्छा शर्ट नहीं मिलता तो? शायद मैं ऐसा सोचता कि मैंने व्यर्थ ही इतना समय गवा दिया! संभावित ऐसा भी हैं कि मेरा गुस्सा किसी और पर निकल जाता और ज़्यादा कलह हो जाता। ऐसा सोचता कि ये जगह कभी नहीं आऊंगा, वहाँ गया होता तो कितना अच्छा रहता?

सच में, सम्यग्दर्शन के बिना मेरे दुखों का कोई उपाय नहीं हैं। इच्छा पूरी हुई तो अभिमान कर बैठा और इच्छा पूरी न होती तो क्रोध कर बैठता। इच्छा पूरी हुई तो और इससे भी ज़्यादा बेहतर वस्तुएँ लाने की चेष्टा हो गयी और इच्छा पूरी न होती तो अंदर ही अंदर अपने आप को हीन, मुर्ख मान लेता या फिर परिस्थिति को दोष देता फिरता!

सच ही लिखा हैं आ. डॉ हुकमचंद जी भारिल्ल -

‘प्रभु वीतराग की वाणी में जैसा जो तत्त्व दिखाया हैं, जो होना हैं वह निश्चित हैं, केवलज्ञानी ने गाया हैं, उस पर तो श्रद्धा ला न सका, परिवर्तन का अभिमान किया, बनकर पर का कर्ता अब तक, सत का न प्रभो सन्मान किया’

वास्तव में जो समय में जिस द्रव्य का जो भी कार्य जैसा भी होना हैं वह अपनी तत समय की योग्यता के अनुसार ही परिणमन करता हैं। उसमे पर द्रव्य का कोई भी प्रकार से हस्तक्षेप नहीं चलता! व्यर्थ में उनको परिणामने के भाव करके राग-द्वेष की ज्वाला में मेरा अंतस्तल निरंतर जलता रहता हैं। आज के दिन को जो मैं देखु तो कितनी सारी आकुलता से मैंने अपने को दुःखी किया हैं, कितनी ही बार कषायों से अपने आप को कषा हैं - सिर्फ कुछ वस्त्र के धागों के लिए जो शरीर को ढँकने के लिए बने हैं? जिन वस्त्रों को त्यागकर मुझे मुनिदशा-निर्ग्रन्था धारण करनी हैं; उन वस्त्रों के लिए मैंने इतना राग-द्वेष किया? इतने कर्म बांधे? कहाँ हैं मेरी निर्ग्रन्थता की भावना? कहाँ हैं अपरिग्रहरूप उत्तम अकिंचन्य धर्म स्वभाव की अनुभूति? इस वेश्यावृत्ति से मैंने अनेक भोगो में अपने मन लगाकर मध्यस्थ फिर रहा हूँ, क्या सच में मैं उत्तम ब्रह्मचर्य धारण करने का भी पात्र हूँ?

इन दोषों का कैसे पश्चाताप करुँ ये तो मुझे नहीं पता, पर इतना ज़रूर पता हैं कि मुझे और ज़्यादा अध्यात्म के अभ्यास की जरूरत हैं और सम्यक्त्व प्राप्त करने में पुरुषार्थवंत बनने की आवश्यकता हैं।

एक मेरी प्रिय पंक्ति सुनाकर मेरी बात को मैं विराम देता हूँ -

हे भव्यजन क्या लाभ हैं इस व्यर्थ के बकवाद से?
अब तो रुको निज को लखो, अध्यात्म के अभ्यास से!
यदि अनवरत छह मास हो, आत्मा की साधना तो,
आत्मा की प्राप्ति हो, संदेह इसमें रंच ना!

- ‘आत्मख्याति’ (समयसार टिका) कलश से