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सम्यक दर्शन

“तुम्हे इस जीवन में क्या प्राप्त करना है?” नानी ने अपने पोते ‘सम्यक’ से पूछा।

आठ वर्ष का नन्हा सम्यक उत्साह से बोल पड़ा - “सम्यक दर्शन!”

“पर मुझे तो सिर्फ ‘दर्शन’ करना बाकी है, सम्यक तो मैं वैसे भी हूँ! मेरा आधा काम तो हो ही गया हैं”; सम्यक हसंते हुए, आनंद से, अपनी मासूमियत से उछलकर बोला। हमारे चेहरे पर भी सम्यक का यह भोलेपन देख कर मुस्कान आयी। हम बहुत प्रसन्न थे कि इतने छोटे से बालक में अभी से ही सही संस्कारो का सींचन हो रहा हैं, धर्म में रूचि लग रही है।

पर सम्यक ने जो बात कही वह कोई छोटी-मोटी बात नहीं परन्तु बहुत बड़ी बात थी। हम सब का आधा काम तो हो ही गया हैं! जिनमंदिर जा पाना इतना सुगम है। जिनपूजा, स्वाध्याय कर पाना इतना सुगम है। प्रवचन, जिनवाणी श्रवण, चर्चा कर पाना इतना सुगम हैं। शुद्ध भोजन आदि की व्यवस्था भी हैं और संयम के साधन भी। कोई रोकने-टोकने वाला नहीं हैं। आरोग्य, परिवार, धन, समाज सब कुछ सुव्यवस्थित हैं। सच्चे देव-शास्त्र-गुरु को ढूंढने जाने की भी जरूरत नहीं हैं। और तो और तत्त्व में रूचि भी है; उसे पुष्ट करने वाले साधन भी। बस निर्णय ही करना बाकी है।

अभी पुण्योदय से इतना सब जो इतनी सुगमता से प्राप्त है इसका अर्थ यह हुआ कि हम आधा क्या; आधे से ज़्यादा काम तो अपने पूर्व भवों में ही करके आये हैं। जो पूर्व भवों में काम बाकी रखा था; रह गया था वह ही तो इस भव में पूरा करना है। इसलिए जो इस भव में हो सकता है उसे अनिश्चित अनंत दुःखमयी संसार समुद्र के पाताल द्वीप जैसे अगले भवों के लिए क्यों बाकी रखना? इसलिए सम्यग्दर्शन को इसी भव प्राप्त करना योग्य है।

और ऐसे अगर देखा जाए तो -

सम्यक ने कहा (नाम निक्षेप से) - “मुझे सिर्फ ‘दर्शन’ करना बाकी है, ‘सम्यक’ तो मैं वैसे भी मैं हूँ! मेरा आधा काम तो हो ही गया!”

हम कहते है (भाव निक्षेप से) - “मुझे सिर्फ ‘सम्यक’ करना बाकी है, ‘दर्शन’ (श्रद्धा) स्वभावी तो मैं वैसे भी हूँ! मेरा आधा काम तो हो ही गया! जो मैं सम्यग्दर्शन नहीं करूँगा तो क्या ये जड़ पुद्गल करेंगे?”