मोह महा-“मद” पियो अनादि
जीवन में एक बार “गोवा जाने का प्लान सफल होना” हमारी उम्र के युवाओ के लिए मानो एक बड़ी उपलब्धि प ाने जैसा है - ऐसा कहो तो कुछ गलत नहीं होगा। बचपन से ही स्कूल में, कॉलेज में सब दोस्तों ने कभी न कभी एक बार तो यहाँ जाने की प्लानिंग जरूर की होगी। मैं भी उन भाग्यशालिओ में से ही हूँ। मित्रों के साथ न सही तो हमारी ऑफिस से पिछले महीने में गोवा में एक गेट-टुगेदर जैसा आयोजन किया था। मेरी वह गोवा की ट्रिप बड़ी यादगार रही थी - जिसकी कुछ प्रयोजनभूत बातें मैं आपके साथ करना चाहता हूँ। जो मैंने अपनी आँखों से देखा और अनुभव की उसे “वैसा का वैसा”; बिना किसी अदल-बदल के प्रस्तुत कर रहा हूँ।
मुझे आपको ज्यादा कहने की आवश्यकता है कि गोवा क्या करने लिए विख्यात है? हाँ, बस वही जो आप सोच रहे हो। कैसी विचित्र बात है; इतने सुन्दर मनमोहक दरिया किनारे बसा हुआ ये प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर राज्य को एक कड़वे जहर के ठेके तक ही सीमित कर उसे कुख्यात कर दिया है। इसमें बॉलीवुड वाले तथाकथित फिल्म-स्टारो का और कुछ विदेशी ढोरो का बहुत बड़ा योगदान है।
रात के बज गए थे साढ़े नौ। मेरी टीम के सीनियर लोग (वरिष्ठ पोस्ट वाले) जमीन पर बैठ कर अमृतपान कर रहे थे। मेरा एक सहकर्मी मित्र जो वैसे तो नहीं पिता था, पर आज सत्समागम के प्रताप से वह भी उनके सूर में सूर मिलाकर पिने लगा था। भला कौन है जिस पर ऐसे सत्समागम का असर न हुआ हो?
नहीं नहीं। मुझे आप सज्जनो को मदिरा पान में क्या दोष है वह नहीं बताना है। ये तो मैं मान के ही चल रहा हूँ कि आप इस खतरनाक व्यसन से तो कोसो दूर होंगे और ऐसे लोगों की संगति भी नहीं करते होंगे। ना ही इन बेचारे मद्य पान में डूबे हुए जीवो का मज़ाक उड़ाना है। क्योंकि यह तो उनकी पर्यायगत अज्ञानता है; जिनशाशन तो हमें सभी जीवो को भगवान आत्मा देखने का उपदेश देता है। मुझे तो आपको इस घटना से कुछ और ही बतलाना है।
एक डब्बे में केकड़े बंध हो और उसमे से कोई एक निकलने की कगार पर हो न तो दूसरे सारे केकड़े उसको खिंच के वापस ला देते है; निकलने नहीं देते। इसे अंग्रेजी में “crab mentality” कहा जाता है। संसार में मोहरुपी मदिरा के व्यसन में त्रस्त जब कोई जीव मोह से छूटने के उपाय की ओर पग भी धरता है तब दूसरे सभी मोही जीव उसे अपने नीचे खींच लेते है। इसलिए मोक्षमार्ग में सत्समागम का बहुत बड़ा महत्व है। कहा भी हैं न - “तजो संग लौकिक (मोही) जीवों का, भोगों के आधीन न हो।”
वहाँ थोड़ी देर लोगों ने बाते की, रात्रि भोजन किया और फिर पहुंचे “बार” पर। नाम भी कितना योग्य है - जहाँ जाकर आपकी जिंदगी के और शरीर के बारा बज जाए वह “बार” है। सबने एक के बाद एक बोतलों को खोलना शुरू किया। मेरे पास बैठे मित्र ने स्वयं कहा कि - “ये कितना कड़वा है” और फिर पी गया। फिर मुँह बिगाड़ा और पी गया। मैं उस समय आश्चर्य में पड़ गया कि - “ये सब कैसा दोगलापन है?”
मोही जीव की दशा इससे कुछ अलग थोड़ी है। विषयो में प्रत्यक्ष दुःख दिखाई देने पर भी उसका सेवन करता है और उससे “मुझे सुख मिलेगा” ऐसा मानता है। ये विपरीतता उस मोह-मदिरा की देन ही तो है।
मैं और मेरे कुछ जागृत मित्र जो सरकार द्वारा जगह-जगह पर सावधान करने वाले “मद्यपान स्वास्थ के लिए हानिकारक है”, अनेक डॉक्टर जिसकी सख्त मनाई करते है, लिवर आदि शरीर के अंग पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है, रिसर्चर द्वारा संशोधित बातो पर विशवास रखते थे; वे सब अपने जीवन की कुछ न कुछ अच्छी-अच्छी बाते करने लगे और एक दूसरे से मित्रता बढ़ाने लगे।
जिनवाणी में साफ़-साफ़ मोह को दुःख का कारण कहा है। पर मोही जीव को हमेशा कुमार्ग ही सुहाता है; सच्चे मार्ग में रूचि न होना ही उस मोहरूपी मदिरा के असर की निशानी है।
लगभग डेढ़ घंटे तक जहर की लहर अपने शरीर में डालने के बाद आता है - बिल। बिल आते ही हमारी टीम के सबसे ज़्यादा अनुभव धराने महाशय ने कहा - “ये बिल रूम नंबर VL-4 में दे दो, वह ही भर देंगे” ये रूम हमारी कंपनी के फाउंडर / CEO का था। बिल तो मैंने देखा नहीं पर थोड़ा गणित लगाया जाए तो कुछ ३०-४० हजार से कम नहीं होगा। वैसे ये लोग मधुशाला के बाहर तो एक एक कोड़ी की गिनती करेंगे, पर जब बात मद्य सरदार के हुकम की हो तो पूरी दौलत उनके चरणों में न्योछावर है। इतने पैसो में तो कितने गरीबो का पेट भर जाए, कितने असहाय को आर्थिक सहाय प्राप्त हो, कितनो की तो महीने की तनख्वा भी निकल जाए - और यहाँ ये अंधो ने पैसो को पानी की तरह बहा दिया।
वीतराग मार्ग में दानरूप कुछ रकम लिखवानी हो, अच्छे काम में आर्थिकरूप से सहाय करनी हो, संयमी जीवो के लिए भोजन आदि की व्यवस्था करनी हो तो ये मोही जीव को संकोच होता है। अरे! अच्छे काम के दान मांग लो तो मोही जीव उल्टा जो मोक्षमार्ग की प्रभावना में अग्रसर है उनको ही लोभी बोल देते है! और, नया मकान बनवाना हो, वर्ल्ड टूर पर घूमना हो, ठाठ दिखाके शादी करनी हो, महंगी गाडी खरीदनी हो वहां तो लाखो का हिसाब भी नहीं देखता। बात थोड़ी कड़वी लग सकती है पर विचार करने योग्य है।
मदिरा को व्यसन ऐसे ही नहीं कहा गया है। जितना पान करो उतनी ही उसकी तलब बढ़ती ही जाती है, तृप्ति नहीं मिलती। बस मदिरा के इशारे पे लड़खड़ाते हुए ये लोग पहुंचे रूम में। इनके लिए दारु पीना ही महफ़िल हैं; इसके बिना इनको अधूरा अधूरा ही महसूस होता है। दुःख की बात ये है कि ये उनके शरीर की मांग नहीं है, बस उस मदिरा की है जिसने इनके दिमाग को हाईजैक कर दिया है।
हाईजैक तो मोह नाम के महावत ने भी किया है - जिससे ये मोह में मदोन्मत्त जीव उसके एक अंकुश को दबाने से उसके इशारो पर झुक जाता है। विषयों से नित्य ही अतृप्त रहता है और इससे दुःखी हुआ फिरता है।
शराबी इतना दुःखी होता है जिसकी कल्पना करना भी असंभव है। क्योंकि वह अपने जीवन के दुःख सिर्फ नशे में ही कहना पसंद करता है; अन्यथा वह अपने में ही उनको दफना कर रखता है। एक तो अनेक दुःख और ऊपर से नशा जिससे वह कुछ भी बकवास करने लगता है। न कहने योग्य बाते भी कहने लगता है। एक ने तो कहा - “मेरे जीवन में बहुत दुःख है। मेरा बाप जुआरी है। लाखों रुपये उसने जुए में ही उड़ा दिए। बेटे को उल्टा उन्हें संभालना पड़ रहा है।” मैंने सोचा कि इस शराब की लत के साथ इसका बेटा भी तो इससे यही तो कहेगा! जब वे उनकी personal बाते कह रहे थे तब दूसरे शराबी उनकी ये बाते सुनने में मजा ले रहे थे। वो तो अच्छा हुआ उसके बाद किसी कारण बात बदल गयी!
मोही जीव की भी यही दशा है; एक तो अनंत दुःखी है और उसकी चर्चा गलत लोगों से करने लगते है।
शास्त्रों में तो पढ़ा था कि मद्यपान व्यसन सबसे भयंकर है - क्योंकि इसका सेवन करने वाला व्यक्ति अन्य सारे व्यसनों को धूर्त होकर करता है। पर उस दिन मैंने इस बात का सीधा प्रसारण देख भी लिया! नशे में कुछ लोग मांसभक्षण कर रहे थे, परस्त्रीगमन और वेश्यासेवन के भाव कर रहे थे, शिकार की बाते कर रहे थे, जुआ खेलने बिठा दिया होता वह भी खेल ही लेते। और तो और जिसने आज तक कभी बीड़ी-सिगरेट-हुक्का को हाथ तक नहीं लगाया था उसे भी फुक रहे थे। एक व्यसन का जन्म दूसरे व्यसन के घर ही तो होता है!
रात्रि में कुछ लोग एक कुंडा बनके बैठे थे। राजनीति की, फिलोसोफी की, धंधे की आदि सब तरह की ढींगे मार रहे थे। सबको बस अपनी बात कहने में रस था क्योंकि सुनने के लिए तो आपको जागृत रहना पड़ता है। इन सबको ऐसा लग रहा था कि ये सारे बड़े ज्ञानी है, बहस करने में माहिर है और सब कुछ इन्हे ही आता है। पर वास्तव में इनकी बाते खोखली ही थी; जो सिर्फ शराब के नशे में न हो वही बता सकता है।
जगत में भी सारे बड़े बड़े जाने माने मोही जीवो की भी यही दशा है। उन्हें लगता है उन्हें सब आता है। उनको रोल मोडल मानने वालो को भी यही लगता है कि इनका अनुसरण करना ही योग्य है। पर वास्तव में इनकी सारी बाते बिना सर-पैर की होती है जो सिर्फ उनके जैसे मोहीओ को ही सुहाती है - ज्ञानी को तो ये सब प्रत्यक्ष ही खोटी दिखाई पड़ती है।
ऐसे ही दूसरा दिन हुआ। जो जागृत होते है उन्हें ही सूर्य जगाने आता है। बेचेत पड़े उन महफ़िलकारो का तो नशा ही अभी तक उतरा नहीं था; सुबह-शाम की तो बात ही कहाँ रही!
हे भव्य! तेरा कषाय आज मंद हुआ है इसलिए आज सर्वज्ञ भगवान की वाणी तुझे जगाने आई है। एक बार जाग जाय तो अनंत अनंत भवों का अँधेरा क्षण में ही दूर हो जाये! कहा भी हैं -
“तू जाग रे चेतन प्राणी कर आतम की अगवानी
जो आतम को लखते हैं उनकी है अमर कहानी ॥”
उस दिन दोपहर में मेरी हमारे एक सीनियर से फिलोसोफी की बहुत अच्छी और सूक्ष्म चर्चा हुई। जैन धर्म के बारे में जानकार उनको बहुत आनंद हुआ और जिज्ञासा भी हुई। और क्यों न हो - उनको उनके सारे प्रश्नो का उत्तर भी तो मिल रहा था!
रात्रि हुई और मदिरारुपी पिशाचिनी फिर वापिस आ गयी इन मद्य-रोगिओं का खून चूसने के लिए। विदेशी मूर्खो द्वारा चलाया हुआ एक नया नाटक - “शैक पार्टी” जिसमे लोग एक झोपड़े जैसी जगह में दारु पीकर नाचते है; वहाँ हम लोग बैठे थे। मेरा एक सहकर्मी जिससे मैंने मुश्किल से ६ महीने में मुश्किल से १ घंटे भी काम के अलावा कुछ बात नहीं की होगी - वह मेरे पास आकर सबके सामने बोलने लगा “सोहम! तू ही मेरा सच्चा दोस्त है, यार है। तू कितना ये है, कितना वो है, कैसा अच्छा है…” करके मेरी मुफ्त की तारीफे उसके कंधे पर बैठा मद्य-भूत उससे करवाने लगा।
मान बहुत ही शातिर शत्रु है; क्योंकि वह जल्दी पकड़ में नहीं आता। मोहीओ के द्वारा की हुई हमारे विषय भोग कषाय आदि की बढ़ौती की तारीफ पर हम भरोसा कर बैठते है। वास्तव में वे सब मोह के नशे में कही गयी हैं और मोह के नशे में सच भी लगने लगती है। इसलिए संसारी जीवो की बातों पर नहीं, वीतरागी देव शास्त्र गुरु की बात पर ही भरोसा करना चाहिए।
मदिरापान करके जीव कुछ भी बोलने लगता है; अभद्र भाषा बकने लगता है और जो जूठ है उसे ही सच मानने-मनवाने लगता है। हमारी टीम की सबसे छोटी सदस्य को ये एक ने कहा कि वह बहुत खड़ूस है। दो तीन बार उसने ये बात उससे कही। ४-५ शराबी ने भी ये बात में मुंडी हिला दी। मुझे तो सच्चाई पता थी कि ऐसा कुछ भी नहीं है। पर क्या करे, वह खुद भी तो नशे में थी! इन सब की बातों को सच मान कर कोने में जाकर रोने लगी!
एक मोह ही है जो सरासर जूठ को भी जीव को सच मनवा सकता है। इस जीव के अनादि के रोने धोने का कारण बस एक मोह ही है!
सब मदोन्मत्त लोगों ने मुझे अलग-अलग प्रकार की बाते कही जैसे - “तू यंगस्टर के नाम पर धब्बा है धब्बा”, “ये सारी तुम्हारी बाते बकव ास है”, “दारु ना पीकर तुमने आज तक क्या हासिल कर दिया”, “सब के साथ socialize करने के लिए थोड़ी तो पी ही लेनी चाहिए”, “तुम समझ नहीं रहे हो, हम कोई बेहोश नहीं है; बस एकदम हलके हो गए है, vibe कर रहे है” - जिसका मुझपर कोई ख़ास प्रभाव नहीं पड़ा। सच ही है - बचपन में दिए हुआ धार्मिक संस्कार कभी व्यर्थ नहीं जाते।
इसके बाद मेरे सीनियर; जिसे जैन धर्म को जानने की रूचि थी - वे नशे की हालत में मेरे पास आये और मुझे कहने लगे की चलो चर्चा करते है। मैंने कहा कि - “इतनी पवित्र बात को मैं आपको इस अवस्था में नहीं बता सकता।” उन्होंने मुझे २-३ बार कहा पर मेरा मन नहीं माना। फिर मुझे थोड़ा मन हुआ कि चलो ऊपर ऊपर से ही कहकर देखे तो सही शायद किसीका जीवन बदल जाए। तो मैंने अवसर ढूंढने का प्रयास किया पर पता नहीं बादमे मुझे कभी उनसे ये चर्चा करने का भाव ही नहीं आया। सच में, सिर्फ पात्र जीव को ही शुद्ध मोक्षमार्ग की बात सुनने को मिलती है। मदिरा पान करने वाला तत्त्वज्ञान का पात्र है ही नहीं!
मोह में अंधे जीवो को सच्चा मोक्षमार्ग बताने वाले मिलते ही नहीं। शायद मिल भी जाए तो उनकी बाते सुनने का भाव नहीं आता। भाव आ भी जाए पर सुनने नहीं मिलती! उनसे कोई न कोई कारण से दूरी बनी ही रहती है। सुनकर भी उस पर विचार नहीं करता।
सारे लोग अब तक काफी कमजोर हो चुके थे। शरीर भी अंदर से सूख सा गया था। उसके अंग भी मानो चिल्ला-चिल्ला कर उन्हें प्रार्थना कर रहे हो कि “कृपा करो मेरे पर! और जहर मेरे अंदर मत डालो!” - पर मद्य का पारा उनको उनके शरीर के ही खिलाफ भड़का रहा था। ये सब यहाँ-वहाँ भटक रहे थे। जो मन में आये वह बक रहे थे। पागलों की तरह हस रहे थे।
अरे! जिसे शरीर को क्या इष्ट है क्या अनिष्ट इसका भी भान नहीं हैं उसे “शरीर और आत्मा भिन्न है” ये बात कैसे समझाई जाए? मोही जीव की कहानी भी कुछ ऐसी ही है - विषयों में इतना त्रस्त है कि भेदविज्ञान की बात ह्रदय में प्रवेश करना उसके लिए असंभव है।
इनके सहवास से बोर होकर मैंने सोने जाने का निर्णय किया। इस ओर नशे में जिनके शरीर का नाश हो गया था; ऐसे शरीर ने भी जवाब दे ही दिया। कुछ लोग उलटी करने लगे तो कुछ वहाँ ही मुर्दे के भाँति सो गए। दूसरे दिन इनको कितना जगाने का प्रयास किया तो भी उनकी आँख नहीं खुल पायी। मुझसे पूछने लगे कि कल रात को मैंने क्या-क्या किया था, क्या-क्या बोला था!
मोह की मदिरा पीकर जीव मनुष्य, देव, नरक और तिर्यंच गतिओं के चक्कर काटकर जब इससे छूटने का उपाय नहीं करता, संसार से थकता नहीं है तब प्रकृति ही इनका उपाय कर देती है। उन्हें चीर काल तक बेचेत ऐसी निगोद अवस्था में पंहुचा देती है। जहाँ उन्हें कोई ज्ञान नहीं है, बस अन्धकार ही अन्धकार है और अनंत अनंत दुःख है जिसे कहने की क्षमता शब्दों की नहीं है। पूर्व भवों का कुछ भी याद नहीं रहता और सोचता है कि स्वर्ग और नर्क सब एक कल्पना ही है।
सच ही है - जो बहुत उठाने पर भी नहीं उठते उसे लोक में भी सोने के लिए छोड़ दिया जाता है। और कितना कहे; प. युगल जी श्री सिद्ध पूजन में लिखते भी है -
जगाया तुमने कितनी बार ! हुआ नहिं चिर- निद्रा का अन्त ।
मदिर सम्मोहन ममता का, अरे! बेचेत पड़ा मैं सन्त ।।
घोर तम छाया चारों ओर, नहीं निज सत्ता की पहिचान ।
निखिल जड़ता दिखती सप्राण, चेतना अपने से अनजान ।।
मोह कोई सामान्य मदिरा नहीं है; महा-मदिरा है। क्योंकि जगत में प्राप्त मदिरा का असर तो थोड़े समय के लिए ही रहता है; जहाँ मोह का नशा तो अनादि का है। मदिरा तो ज़्यादा से ज़्यादा इस भव बिगाड़ सकती है, पर मोह तो अनंत अनंत भवों को बिगाड़ने में समर्थ है। मदिरा तो दुःख सिर्फ कुछ समय के लिए देती है पर मोह तो इस जीव को प्रति समय दुःख ही दे रहा है; भ्रमित करता आया है।
मदिरा पान करने वाल ा भले कितने ही नशे में क्यों न हो अपना नाम तो गलत नहीं बताएगा; पर ओहो! जो मोहरुपी महामद पिए बैठा है उसे तो “मैं कौन हूँ” उसकी भी खबर नहीं रहती है! प. टोडरमल जी के शब्दों में इसे कहे तो - “देखो! मोह की महिमा!”
अपने जीवन में पहली (और शायद आखरी) बार मैंने लोगो को मदिरा पान करते देखा। ऑफिस के सहकर्मी थे इसलिए मैं शर्म के मारे पूरी तरह उनके साथ बैठना टाल भी नहीं सका। खैर जो भी हुआ, इस घटना से कम से कम मुझे छह-ढाला की “मोह-महामद पियो अनादि, भूल आपको भरमत वादि” पंक्ति का सम्यक भावभासन तो जरूर हो गया।
भावनाओ को शब्दों में पिरोने का एक प्रयास
सोहम सुनीलकुमार शाह