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जब एक रतन अनमोल है तो…

१०८ जिनमंदिर से सुशोभीत - चैतन्य अतिशय को प्रतिबिंबित करने वाला - पपोरा जी अतिशय क्षेत्र के दर्शन के लिए हम दिवाली के दिनों में पहुंचे। ७४ जिनमंदिर के दर्शन करने के पश्चात क्षुधा रोग से व्याकुल हम कुछ हल्का-फुल्का नाश्ता करने वहां की “जैन कैंटीन” में गए। उस कैंटीन में एक मा जी हमारे लिए पोहे और चाय बना रही थी। उनकी बहु को कुछ सुनने की तकलीफ थी।  इसलिए कोई भी छोटे-मोटे काम के लिए वह उनके पोते को - जो आज स्कूल न जाने का बहाना करके घर पर था - उसे ही आवाज दे रही थी।

उस नन्हे बालक का नाम था “अनमोल”। उससे बातचीत करके हमें बहुत प्रमोद हुआ, आनंद हुआ। ४थी कक्षा में पढ़ने वाला १० साल का छोटा सा बच्चा जब बड़ो के साथ उनके जैसी अच्छी-अच्छी बाते करे तो किसे न पसंद पड़े? उसका सिर मुंडा हुआ था और पीछे चोटी भी थी। बुद्धि से भी बहुत तेज़ था, समझ भी बहुत अच्छी थी।

अनमोल को मैंने जैन धर्म की के तीर्थंकरो के नाम पूछे, जो उसे आते थे। यह जानकार हम सभी को बड़ा ही आश्चर्य हुआ - कि इतने साधारण सामान्य और आर्थिक दृष्टि से कमज़ोर परिवार के बच्चे को भी ऐसे उज्जवल संस्कार हो सकते है? उसकी दादी से हमे ज्ञात हुआ अनमोल को एक (नाम याद नहीं है) आर्यिका माताजी का भी सत्समागम - पपोरा जी क्षेत्र के निमित्त से प्राप्त हुआ था। और वह उसकी बातों में दिख भी रहा था।

मैंने उसे पूछा - आर्यिका माताजी से तुमने क्या क्या सीखा?

उसने कहा - आलू प्याज नहीं खाना चाहिए।

ये सुनकर हमे बड़ी प्रसन्नता हुई।

“पर क्यों नहीं खाना चाहिए?”, हमने पूछा।

अनमोल झट से बोला - क्योंकि उसमे पाप पड़ता है।

“बेटा पर हमें पाप क्यों नहीं करना चाहिए? आलू प्याज क्यों नहीं खाना?”, हमने पूछा।

उसने सहजता से कहा - माताजी ने हमे नियम दिलवाया है तो फिर हम क्यों आलू प्याज क्यों खाये?

इस बात से मैं विचार में पड़ गया। एक ओर उस बच्चे के भोलेपन की मुस्कुराहट थी तो दूसरी ओर लिए हुए नियमो में दृढ़ता, देव-शास्त्र-गुरु के लिए समर्पणभाव और आदर का गर्वभरा अचम्भा भी था।

और जानने के इच्छुक हमने उसे पूछा - और क्या-क्या माताजी ने तुम्हे सिखाया हैं?

उसने कहा - जीवहिंसा नहीं करनी चाहिए, रात्रिभोजन नहीं करना चाहिए। गन्दी गन्दी चीज़े तो बिलकुल नहीं खानी चाहिए।

हम सभी ये बात सुनकर आश्चर्य सहित हँस पड़े!

हमने पूछा - ये गन्दी गन्दी चीज़ मतलब क्या होती हैं?

उसने तुरंत ही उत्तर दिया - मांस मदिरा

फिर उससे हमारी उसकी स्कूल की पढाई, विषय आदि की चर्चा हुई। प्रसंग पाकर हमने उसे पूछ ही लिया - जब स्कूल में दूसरे बच्चे आलू प्याज लेकर आये तो फिर तुम उनके टिफ़िन में से नहीं खाते?

उसने कहा - नहीं, मैं उनके टिफ़िन में से बिलकुल नहीं खाता। माताजी ने मुझे कहा हैं कि जैनी बच्चो की ही संगती करना।

शहर में रहने वाले बड़ी-बड़ी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चो को ये समझ नहीं जो इस बच्चे ने सत्समागम से प्राप्त की हैं। कुसंगति से ही मनुष्य का जीवन गलत दिशा में चला जाता हैं। सचमे, एक आदर्श सुखी जीवन के लिए धर्म के संस्कारो का सींचन बचपन में अत्यंत आवश्यक हैं। इस भौतिकवादी आधुनिक युग में उत्कृष्ट जैन धर्म के संस्कार बच्चों को देने वाली वीतराग विज्ञान पाठशालाओं का महत्त्व शब्दों में कहना असंभव सा है। जैन धर्म की रक्षा, प्रभावना और सेवा करने का उत्तम कार्य है पाठशालाओं में अपने बच्चो को भेजना और उसे बढ़ावा देना।

हमारी बाते अभी तक पूरी नहीं हुई, क्योंकि पोहे अभी भी तैयार नहीं थे और दूध ज़्यादा ही गरम था। अनमोल की दादी ने हमे बताया कि अनमोल को धर्म में अच्छी रूचि हैं। एक बार आचार्य विद्यासागर जी महाराज आये थे तो अनमोल उनके साथ बैठा करता था, उनके समागम में उसे आनंद होता था। एक बार की बात है। उनके संघ का विहार होने जा रहा था तब अनमोल ने जब उन्हें जाते हुए देखा तब वह कहने लगा - “मैं भी आपके साथ आऊंगा, मुझे भी आपके साथ ले चलो” करके नग्न होकर ही उनके पीछे दौड़ा चला गया था!

इस घटना का विचार करते ही मानो मेरे रोम रोम जाग उठते है। माना कि अभी वह अबोध सा छोटा बालक हैं, वास्तव मुनिधर्म की खबर नहीं हैं - पर उसने कही न कही निर्ग्रंथ दशा, दिगम्बर मार्ग की अनंत अनंत भावना भा ली, जो मुझे विश्वास है कि वह निश्चित ही अल्प काल में फलीभूत होगी ही होगी!

सोचने वाली बात यह है कि क्या हममें ऐसा सामर्थ्य है - सब कुछ छोड़ कर निर्ग्रन्थ मार्ग में आगे बढ़ जाए? क्या हममे ऐसे उत्तम भाव है कि संसार के विषयो से सम्यक उदासीनता भी प्रगट हो? हममे ऐसा पौरुष कब जागृत होगा कि जब हम मोक्ष पंथ में निशल्य होकर बढ़ेंगे? सम्यक्त्व का उग्र पुरुषार्थ करने में अग्रसर होंगे?

आज पूरी दुनिया के पास न तो शुद्ध तत्वज्ञान का मार्ग हैं और ना ही जिनवाणी का सार बताने वाले उपकारी गुरु हैं। न उनके पास आचार्य कुन्दकुन्द देव के ग्रन्थ है, न टोडरमल जी आदि जैसे प्रकांड विद्वानों का तत्त्व उदघाटन। उनके पास पू गुरुदेवश्री भी कहाँ है - जो हमें भगवान आत्मा कहकर सम्बोधित करते है!  न उनके पास परमागम होनोर्स जैसा शास्त्री कोर्स है और न ही मुमुक्षु जीवो का सत्समागम। पर हमे तो यह सब कुछ इतनी सुगमता से प्राप्त हैं कि हम इस अमूल्य निधि को छोड़ कर - पापोदय से जो दुर्गम हैं ऐसी अनिष्टकारी दुखदायक संसार की भोग सामग्री को जोड़ने में लग गए हैं? अरे ये सब छूटे न छूटे क्या हममे निर्ग्रन्थ भावना निरंतर प्रज्वलित है कि नहीं? भावना को तो हमारे शास्त्रों में भवनाशिनी कहा गया है।

धार्मिक कार्य करते हुए भी या तो बस बाहरी क्रिया में तृप्त रह गए हैं, या फिर क्रियाशून्य स्वछंद हो गए हैं। या तो धर्म के नाम पर बस देव दर्शन, १५ मिनट स्वाध्याय से ही संतुष्ट हो गए हैं और या तो बस पंथवाद और राजनीति के झगडे में, सोशल मीडिया में एक दूसरे की निंदा आलोचना करने में ही अपनी पूरी ऊर्जा व्यर्थ कर रहे हैं।

वास्तव में हम सभी कहीं न कहीं तो जरूर अटके हैं, जहाँ से हमें बाहर निकलना अति आवश्यक है। पर अल्प समय सीमा में बंधित ऐसा दुर्लभ मनुष्यभव हमे कही भी अटकने की छूट नहीं देता हैं। इस पर विचार करे।

उतने में पपोराजी जिनालयो की पूजा करने वाले वहां के पुजारी जो अनमोल के पिताजी थे वह आये। हमने उनसे अनमोल की बड़ी ताऱीफ की और अनमोल की बढ़िया से बढ़िया शिक्षा देने की भी बात कही। पर क्या करे? जितना सुगम ये हमारे लिए हैं उतना उनके लिए कहाँ। और लौकिक शिक्षा से भी जरूरी धार्मिक शिक्षा का क्या? हमने उनसे अनुरोध किया कि आप ८वीं कक्षा से अनमोल को चैतन्यधाम की विद्यानिकेतन में पढ़ने के लिए भेज सकते हैं - जहाँ उसे लौकिक शिक्षा के साथ साथ सर्वोत्कृष्ट धार्मिक शिक्षा भी प्राप्त होगी। उनको हमारी यह बात बहुत अच्छी लगी।अनमोल के पिताजी ने बताया भी कि वह उसे शास्त्री बनाने के लिए अहारजी और सांगानेर की विद्यालय में पढ़ने भेजने वाले हैं। हमने भी अनमोल को धर्म मार्ग में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।

बाते करते करते हमारा नाश्ता भी हो गया। अंत में जब हमने उसके पिताजी को भी पुनः कहा कि इतने तेजस्वी बालक को शास्त्री विद्वान बनाना ही योग्य होगा। तो उन्होंने कहा - “हाँ सही बात हैं! मेरा बेटा इंजीनियर डॉक्टर बने न बने, जैन धर्म की प्रभावना करने वाला हो तो सबसे उत्तम है । और जो उसे दिगम्बर मुनि बनना हो तो भी हम बहुत ही प्रसन्न होंगे, उसे उल्लास से इस मार्ग पे आगे बढ़ने का पूर्ण समर्थन भी करेंगे। वह धर्म की पताका को लहराएगा और जीवो को सच्चे मार्ग का उपदेश देगा!”

एक मंदिर के पुजारी के ऐसे उज्ज्वल भाव जो उनके निकट भव्यता प्रगटा रहे थे; उसे देखकर मन बड़ा ही उल्लसित हुआ। ज्यादा पढ़ा लिखाकर माँ-बाप आजकल बच्चो को पैसो का ढेर बनाने विदेश भेज देते है - जहाँ अधिकतम लोग नोट में अंधे होकर शील, संयम और संस्कार सब भूलकर ७ व्यसन में त्रस्त रहते है। कभी कभी तो बच्चा धार्मिक मार्ग में रूचि रखता हो तो अज्ञानवश कुछ माता-पिता उसे धर्म से विमुख अन्य दिशा में भी दोरते हैं, जो अत्यंत दुःखद है।

पर ऐसे माता पिता सच में धन्य हैं जो अपने बच्चो के लिए सच्चे सुख अर्थात मोक्षमार्ग में बढ़ने के संस्कार और आशीर्वाद देते हैं। कहा भी हैं - जैन धर्म मंदिर, प्रतिमा, शास्त्र में नहीं; जैनिओ के ह्रदयस्थान में वास करता हैं।

निश्चय से, सभी जीव द्रव्यदृष्टि से भगवान आत्मा है; भले ही वर्तमान की पर्याय में पामरता क्यों न हो। उस अनमोल नामक रत्न से मिलकर मुझे थोड़े ही समय में बहुत कुछ सिखने को मिल गया। एक स्मित के साथ मैं ७५ से १०८ मंदिरो के दर्शन के लिए ये गुनगुनाते हुए आगे बढ़ा -

जब एक रतन अनमोल है तो, रत्नाकर कैसा होगा? जिसकी चर्चा ही है सुन्दर तो, वो कितना सुन्दर होगा?

भावनाओ को शब्दों में पिरोने का एक प्रयास

सोहम सुनीलकुमार शाह