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Question Set 5

Q.1

“परलोक में सुख होगा, दुःख नहीं होगा” इस प्रयोजन से क्या आपने कभी किसी भगवान या गुरु का अनुकरण या सेवन किया हैं? कही हम सच्चे देव-शास्त्र-गुरु का अनुकरण या सेवन भी स्वर्ग और अनुकूलता की कामना के लिए तो नहीं रहे? अपने जीवन से उदहारण सहित बताये।

A.1

प्रत्येक जीव को भविष्य की चिंता हमेशा रहती है। वह प्रत्येक समय उस अज्ञात अनिश्चित भविष्य को किसी तरह निश्चित करने में लगा रहता है; फिर वह इस लोक का हो या परलोक का। इस लोक में भविष्य को अपने हिसाब से शिल्पना उसे किसी हद तक आसान लगता है, क्योंकि वह कुछ अनुमान लगा सकता है। पर परलोक? मरण के बाद यह जीव कहाँ जायेगा और कैसे रहेगा उसकी उसे कुछ खबर नहीं होती।

इसलिए तो आज दुनिया में इस ‘परलोक सुधारने’ के क्षेत्र में कई दुकानों का धंधा धमाकेदार चल रहा हैं। न किसी को कुछ पता हैं, न कोई जानना चाहता हैं। बस किसी शॉर्टकट से इस भव में तो आनंद करे और बादमे भी उसे कोई तकलीफ न पड़े उसके लिए अनेक टोटके अपनाता है। जैसे कुम्भ में स्नान करना, पितृ को भोजन देना, चार धाम या ज्योतिर्लिंगों की यात्रा करना, गाय आदि पशु को खाना खिलाना, दान आदि करना, गीता उपनिषद आदि पढ़ना, गायत्री मंत्र आदि पढ़ना आदि आदि करता हैं। सिर्फ इतना ही नहीं कुछ लोग तो हज जाते है, रोज नमाज पढ़ते है, धर्म प्रचार के नाम पर जीवों की हिंसा तो क्या आत्महत्या भी करने तैयार हो जाते है। यह सब बस एक चीज के लिए - परलोक में सुख। कुछ लोग स्वर्ग कहते हैं, कोई जन्नत तो कोई हेवन - बात तो सब एक ही हैं। इस भव में सुख का ठिकाना नहीं हैं, परलोक में कहाँ सुख मिलने वाला हैं? अरे! आज कल तो आप परलोक की बात जो भौतिकवादीओ के आगे करो तो आपको वे परलोक के अस्तित्व को स्वीकारने से ही मना कर देंगे। फिर जो पूछो तो फिर इस जीवन में क्या करना? तो वे आपको मौज शोख करने के अनेक मूर्खता भरे उपाय बताएँगे जैसे वर्ल्ड टूर करना, लोगो से मिलना, नशे में धूर्त होकर पार्टी करना आदि। कुछ लोग तो विमान में से निचे कूदना, समंदर में डुबकी लगाना, उलटे सर निचे गिरना आदि अनेक एडवेंचर स्पोर्ट्स से जीवन सफल होता हैं ऐसा कहते हैं। नरक निगोद में जाने की कला को आज ऐसे विषयान्ध लोग “जीवन जीने की कला” के नाम से प्रचारित करते हैं।

आजकल ऐसी अनेक कुप्रथा जैनिओं में भी बढ़ने लगी हैं। “एक बार वंदे जो कोई, ताहि नरक पशु गति नहीं होइ” - यह पढ़कर लोग सम्मेद शिखर जी की यात्रा करते हैं। क्योंकि उससे तो स्वर्ग मिल जायेगा न? ऐसी पंक्तियाँ उपदेशात्मक है; यह सिद्धांत कथन थोड़ी हैं? इनका भाव बस इतना हैं कि जो जीव तीर्थक्षेत्र पर जाकर भाव से वंदना अर्थात आत्म आराधना में लगे, सम्यक्त्व प्राप्त करे तो जरूर से नरक तिर्यंच में नहीं जायेगा। सिद्धचक्र विधान, अनेक उपवास व्रत, आदि लोग करते हैं। अणुव्रत और महाव्रत भी इसलिए लेते हैं कि उनका भव सुधर जाए। पर सच में ऐसा हैं ही नहीं। जिनवाणी में कही भी परभव में सुखी होने की लालच नहीं दी गई हैं, अपितु त्रिकाल शाश्वत आनंद में रहने का उपदेश दिया हैं, और उसे प्राप्त करने की विधि बताई गई है।

सबसे पहले हमे कौनसा सुख चाहिए उसका निर्णय करना चाहिए। क्षणिक सुख चाहिए तो ये सारे संसार के रास्ते खुले हैं। उसमे हाथ पैर मारते रहेंगे तो अनादि के जैसे कही न कही तो अनंत में से एकाद बार तो इन्द्रिय सुखाभास हाथ लग ही जायेगा; जो बस कुछ ही समय में चला भी जायेगा। जैसे इस भव का इन्द्रिय सुख नष्ट हो जायेगा वैसे जो परभाव के सुख की इतनी वांछा हैं - क्या वह भी नष्ट नहीं हो जायेगा? उस भव के बाद भी तो कुछ होगा? उसके लिए इस जीव ने कोई योजना बनाई हैं क्या?

इसलिए शाश्वत सुख ही एकमात्र सुख हैं, अन्य सब तो सुखाभास है। उसे सुख कहना भी मूर्खता हैं तो उसे भोगके अपने को सुखी मानने वाले और ऐसे तुच्छ सुख की इच्छा करने वालों का तो क्या ही कहना!

पर हमारी दृष्टि में तो सिर्फ वह उच्छिष्ट सांसारिक विषय भोग ही उत्कृष्ट हैं। फिर वह इस भव में नयी गाडी लेना हो, नया घर लेना हो, दुनिया घूमना हो या फिर परलोक में स्वर्ग में अमृतपान करने के सपने देखना हो - दोनों में कोई अंतर नहीं हैं। और साथ साथ यह भी जान लेना चाहिए कि स्वर्ग में वही जीव जाते हैं जो शाश्वत सुख के आराधक होते हैं। आत्मा की विराधना करने का फल तो नरक निगोद ही हैं!

सम्यग्दर्शन प्राप्त करने का सम्यक लक्ष्य, सम्यक पुरुषार्थ और उत्साह न होना ही परलोक में सुख की वांछा हैं। अधिकतर हम आत्मार्थी ऐसा सोच लेते है -

“और जो इस भव में शायद सम्यक्त्व नहीं भी हुआ तो देवगति या मनुष्य गति तो होगी। और जो इस भव में शायद सम्यक्त्व नहीं भी हुआ तो संस्कार तो डाले हैं, अगले भव में हो जायेगा। और इस भव में शायद सम्यक्त्व नहीं भी हुआ तो अगले भव में समवसरण मिलेगा, सच्चे गुरु मिलेंगे आदि बेहतर अनुकूलता होगी आत्म साधना के लिए तब कर लेंगे।”

यह जीव सम्यक्त्व प्रगट करने के पुरुषार्थमें बढ़ावा लाने के जगह अपने से ही जूठे वायदे कर लेता है। यह उसका मोह ही तो है जो उसे यह सब सोचने पर मजबूर कर देता हैं! ये भव आदि तो शरीर और संयोगों की दशा का नाम हैं। सच बात तो यह हैं कि - आत्मा तो त्रिकाली ध्रुव हैं। शाश्वत हैं। भव के अभाव का लक्ष्य न हो, एक क्षण भी संसार में सुखमय भासती हो तो उसका सीधा अर्थ हैं कि परभव में सुख भोगने की वांछा हैं। देखने जाए तो पर में सुखबुद्धि ही भव भ्रमण का हेतु हैं। इसलिए इस ध्रुव भगवान आत्मा की आराधना में नित्य ही लगना चाहिए और शाश्वत निराकुल सुख के लक्ष्य के साथ मोक्षमार्ग में आगे बढ़ना चाहिए।


Q.2

वत्सलकुमार मंद कषायी धार्मिक वृत्ति वाला दानी गृहस्थ था और उसे अपनी पुण्य वृत्ति का बहुत संतोष था। उसे लगता था कि उसके संसार का किनारा आ गया हैं तभी उसकी वृत्ति निर्मल हैं। तत्त्वार्थसूत्र के अध्ययन से उसे आघात लगा कि जिसे वो धर्म समझ रहा था वो तो आश्रव और बंध का कारण हैं। कोई ऐसे ५ भाव बताये जिन्हे प्रायः धर्म समझ लिया जाता हैं पर हैं वह संसार के कारण।

A.2 संसार के सभी जीव सुख को इच्छते हैं और दुःख से दूर भागते हैं। जब यह जीव धर्म के क्षेत्र से “मोक्ष में सुख हैं” ऐसी बात सुनता हैं तब वह जैसे अन्य सांसारिक भोग को इच्छता हैं वैसे ही उस मोक्ष को भी वह इच्छता हैं। पर क्या मोक्ष वास्तव में किसे कहते हैं, वह कैसा हैं, कहाँ से आता हैं आदि समझे बिना उसे प्राप्त करना सम्भव हैं? बिलकुल नहीं।

क्योंकि इस जीव को मोक्ष क्या हैं वह ज्ञात नहीं हैं, इसलिए जो जो क्रियाएँ “धार्मिक” कही जाती हैं, मोक्षमार्ग / धर्ममार्ग में अच्छी मानी जाती हैं, उन सब को करके वह मोक्ष की ओर बढ़ने का संतोष जुटा लेता हैं। सच्चाई क्या हैं उसे परिक्षाप्रधानता से समझना मुश्किल होता हैं और कोई क्रिया विशेष को करना सरल लगता हैं। इसका कारण इस जीव की अनादि से चली आ रही कर्ताबुद्धि ही हैं। यही भूल के कारण अनादि का संसार हैं और भूल न सुधारी तो अनंत संसार राह तक रहा हैं।

तो फिर “धर्म” आखिर हैं क्या?
“धर्म” वस्तु के स्वभाव का नाम हैं। जैसा स्वभाव हैं वैसा जब प्रगट हो, भले ही आंशिक क्यों न हो; उसे धर्म कहा जाता हैं।

जैसे वस्तुस्वरूप का यथार्थ श्रद्धान हैं तो क्योंकि ऐसा श्रद्धान होना आत्मा का स्वभाव हैं इसलिए उसे धर्म कहते हैं। इसी कारण से तो सम्यग्दर्शन जब यह जीव प्राप्त करता हैं, तब उसके जीवन में धर्म प्रगटा ऐसा कहा जाता हैं।

यही तर्क से, उत्तम क्षमा आदि दश धर्म जो आत्मा का स्वभाव हैं वह जब चारित्र में (आंशिक या पूर्ण रूप से) प्रगट हो तब उसे धर्म कहते हैं। ध्यान देने वाली बात यह हैं कि यहाँ आत्मा में कषाय आदि विभाव के अभाव होने को धर्म कहा न कि कोई क्रिया आदि को।

वास्तव में देखने जाए तो ध्रुव स्वभावी भगवान आत्मा का आनंद ही एक मात्र धर्म हैं। अन्य सब सदाचार आदि क्रियाएँ तो इस शुद्धात्मा के आनंद के साथ सहज सहचारी बनती देखी जाती हैं।

वत्सलकुमार की परिस्थिति भी कुछ हमारे जैसी ही हैं। हम - • शांत स्वभाव, वैर इर्षा आदि थोड़ी हो ऐसी वृत्ति को • सदाचार जैसे छना पानी, रात्रिभोजन त्याग, अभक्ष्य त्याग, ७ व्यसन त्याग को • दया, दान, भक्ति, पूजा, स्वाध्याय, संयम, तप आदि की क्रियाओ को • प्रवचन सुनना, स्वाध्याय करना, परमागम होनोर्स आदि से धार्मिक शिक्षण लेना, तीर्थयात्रा, पंचकल्याणक प्रतिष्ठा, धर्म के संस्कार देना, धर्म पढ़ाना आदि • धर्म के संस्कार डालने में संतुष्ट होकर उसे भी • मंद कषाय भाव में और अति विशुद्धभाव में संतुष्ट हो जाने को

धर्म कह देते हैं।

विचार करना जरूरी हैं कि क्या ये सब क्रियाएँ “धर्म” हैं? जो धर्म होती तो इनमे मिथ्यात्व को जोर क्यों दीखता हैं? जो धर्म होती इनमे आकुलता क्यों होती हैं। एक बात तो स्पष्ट हैं कि जहाँ आकुलता हैं वहाँ धर्म नहीं हो सकता। क्योंकि धर्म तो निराकुलता का नाम हैं। आकुलता का दूसरा चेहरा हैं आस्रव बंध।

तो धर्म कैसे प्रगट होगा? सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र ही मोक्षमार्ग हैं और वही धर्म हैं। इसलिए एकमात्र ध्रुव स्वभाव की प्राप्ति के लक्ष्य से सारी क्रिया करनी चाहिए। क्योंकि मोक्षमार्ग में शुभक्रिया होती हैं, की नहीं जाती। इन क्रियाओं से दूर भागोगे तो अशुभ में गिर जाओगे। इनमे फस गए तो संसार में ही रह जाओगे। और इनसे ऊपर उठोगे तब ही तो शुद्ध दशा की प्राप्ति होगी!


Q.3

चलो शिखरजी

पापा: बेटा आकाश और अनुभव! आज तुम दोनों का पेपर कैसा गया?

आकाश: एकदम बढ़िया गया पापा।

अनुभव: मेरा भी अच्छा रहा! आज तो हमारी सारी परीक्षा पूरी हो गयी! आज से दिवाली की छुट्टिया शुरू!

आकाश: हाँ, और अक्षत भैया तो कह रहे थे कि ९वी की छुट्टिया स्कूल लाइफ की आखरी छुट्टिया होती हैं। उसके बाद तो बस पढ़ाई ही पढ़ाई! इसलिए हम दोस्त दिवाली पे घूमने जाने का सोच रहे हैं!

पापा: वाह! बहुत अच्छे! कहाँ जाने का विचार हैं?

आकाश: हम सब ने सोचा हैं कि हम सम्मेद शिखर जी जायेंगे! वहाँ का मौसम तो पापा, क्या कहना! सब जगह हरियाली ही हरियाली होती हैं!

अनुभव: और ये देखो! (फ़ोन में फोटो दिखाते हुए) शिखरजी कितना ऊँचा पहाड़ हैं! मैंने तो सुना हैं यहाँ सब लोग सुबह ३ बजे चढ़ना शुरू करते हैं! इस पर ट्रैकिंग करने में तो बहुत मजा आएगा! जीवन में ऐसे एडवेंचर तो करने ही चाहिए!

आकाश: और इतने श्रम के बाद जब हम भगवान पार्श्वनाथ की टोंक पर पहुँच जायेंगे तो क्या गजब का एक्सपीरियंस होगा!

अनुभव: और पापा आप हमारे खाने-पिने रहने करने की बिलकुल चिंता मत करना! वहाँ अब पहले जैसा नहीं रहा। ५ स्टार होटल जैसी व्यवस्था हो गयी हैं अब तो! मस्त खाएंगे, पिएंगे और आराम से रहेंगे। और वहां प्रकृति के सौंदर्य का लुफ्त उठाएंगे!

पापा: बच्चों, शिखर जी कोई पर्यटक स्थल नहीं हैं। यह तो हमारा पवित्र धार्मिक शाश्वत तीर्थ हैं!

आकाश: हाँ पापा! वह तो हमे ज्ञात हैं ही। हम रोज महा-अर्घ में इन सब तीर्थो को याद करते ही हैं न! और मैंने तो सुना हैं कि सम्मेद शिखर जी की वन्दना करने से पुण्य भी होता हैं?

अनुभव: हाँ! ऐसे तो हमारा डबल फायदा हो जायेगा न! घूमना-फिरना भी हो जायेगा और दर्शन करके थोड़ा दसवीं की परीक्षा के लिए पुण्य भी मिल जायेगा!

पापा: हमारे तीर्थ क्षेत्र विषय कषाय को पोषने के स्थान नहीं हैं। वहां तो आत्मा की आराधना करने लोग जाते हैं। घूमने फिरने नहीं! तीर्थ तो महापुरुषों की साधना और मोक्ष भूमि हैं! वहां जाके पाप और सांसारिक भोगादि थोड़ी करना चाहिए! इनमे तो सिर्फ दुःख ही हैं। वहां जाके तो जिनने सच्चा सुख प्राप्त किया वैसा बनने के लक्ष्य से जाय जाता हैं।

आकाश: तो वहाँ पर पुण्य नहीं मिलता?

पापा: अरे! पुण्य इकठ्ठा करने की इच्छा से तो पाप बंधता हैं। जो तत्त्वविचार, भेदज्ञान और आत्मा की आराधना करते हैं उन्ही को सहज ही उत्कृष्ट पुण्य बंधते हैं।

अनुभव: अच्छा! ऐसी बात हैं!

पापा: हाँ! बच्चों तुम्हे पता हैं आज सुविधाओं की लालसा के कारण हमारे तीर्थों की क्या दशा हुई हैं? अनेक अभक्ष्य होटल खुल गयी हैं, व्यसन आदि के कार्य होने लगे हैं और हमारे तीर्थो पर आज कल अन्य लोग कब्ज़ा भी करने लगे हैं!

आकाश: कब्ज़ा? कैसे!

पापा: देखो, आज तुम लोग पर्यटन करने गए। वहां फोटो लोगे, मस्ती करोगे, खाना खाओगे और वही सब सोशल मीडिया पर डालोगे। अभी दुनिया भर के लोगो को तो यही लगेगा कि जैनी लोग तो उनके तीर्थो पर जाके ट्रैकिंग ही करते हैं। और यही लोग आज हमारे तीर्थो पर आकर उसकी पवित्रता नष्ट करते हैं।

अनुभव: हाँ! और शायद इसकी वजह से ही फिर उनका इस क्षेत्र पर मौज शोख के लिए आना जाना बढ़ जाता होगा। और फिर यही लोग अपने देवी देवता की पूजा के नाम पर हमारे ही मंदिर को हड़प लेते हैं!

आकाश: सही बात हैं। गिरनार, मांगी-तुंगी, मन्दारगिरि, गोम्मटगिरि आदि अनेक तीर्थ पर लोग अवैद्य तरीके से अपना अस्तित्व जमा रहे हैं। हमारे ही तीर्थ हमसे ही छीने जा रहे हैं! ये सब तो हमारी ही गलती हैं!

पापा: वास्तव में इतने दौड़-धाम भरे जीवन में हमारा उपयोग आत्मा में नहीं लग पाता। इसलिए ऐसे तीर्थ पर जाकर हम निश्चिंत होकर साधना कर सकते हैं। ऐसे धार्मिक तीर्थ व आयतन तो हम जैसे श्रावकों के मोक्षमार्ग में निमित्त बनते हैं!

अनुभव: तो फिर पापा हमें तीर्थक्षेत्र पर जाके क्या करना चाहिए? कैसे रहना चाहिए? वहाँ तो सुविधाएँ भी इतनी नहीं होती।

पापा: "सुविधाओं की दुविधा त्यागो, निज हित का पुरुषार्थ करो" - ऐसे पवित्र तीर्थो में वंदना कर हमें सिद्ध भगवान जैसा बनने का पुरुषार्थ करना चाहिए। सदाचार, शील और शांति से रहना चाहिए। जिनदर्शन, स्वाध्याय आदि में समय लगाना चाहिए। बने उतना समय विषय भोगो में कम लगाना चाहिए।

आकाश: हाँ, तो फिर हमें धार्मिक क्षेत्र पर पर्यटन कभी नहीं करना चाहिए! पहाड़ के ऊपर खाना, पीना, फोटो खींचना, जूते पहनकर चढ़ना, फिल्मी गाने बजाना, ट्रैकिंग करना आदि तो बिलकुल नहीं करना चाहिए। कोई कर रहा हो तो उसे रोकना भी चाहिए।

पापा: बिलकुल! सिर्फ इतना ही नहीं! तीर्थयात्रा के बीच में बने तो कोई अन्य पर्यटन स्थल में घूमने का भी टालना चाहिए। क्योंकि यह विषय भोग तो विशुद्धता के घातक हैं!

अनुभव: अब हमे समझ में आ गया। सम्मेद शिखर जी आदि तीर्थो पर कोई भी प्रकार की सांसारिक क्रिया नहीं करनी चाहिए और धार्मिक मर्यादा रखनी चाहिए।

आकाश: फिर तो हम शिखर जी तो नहीं जा पाएंगे घूमने। हाँ, पर हम लदाख जरूर जा सकते हैं! वहां तो बहुत मजा आएगा।

पापा: (हंसकर) अरे बच्चो! कौन कहता हैं कि तीर्थ क्षेत्र पे जाके आनंद नहीं होता? वहां पर तो घूमने-फिरने की जगहों से अनंतगुना आनंद होता हैं!

अनुभव: आनंद? सच में? कैसे? मुझे तो लगता था कि ऐसी तीर्थ यात्रा तो बूढ़ों के लिए होती हैं। बहुत ही सीरियस वातावरण रहता होगा न!

पापा: अरे! आत्मा तो स्वभाव से ही आनंदमयी हैं! आनंद कैसे नहीं होगा? जो क्षेत्रों से लाखो जीव मोक्ष गए हो ऐसे अद्भुत क्षेत्र पर जाकर किसे शांति न मिले? तनाव भरे जीवन से दूर होने से यहाँ विशेष धर्म में रूचि लगती हैं। साधर्मी वात्सल्य भी बढ़ता हैं। दर्शन, पूजन, स्वाध्याय, भक्ति, दान आदि करके परिणामो में निर्मलता आती है। और जरूर से कुछ न कुछ सिखने समझने को मिलता हैं; और जीवन को एक नयी दिशा भी मिलती हैं।

आकाश: हाँ पापा! एकदम सही बात बताई आपने। पंच परावर्तनरुपी संसार में इस जीव को कौनसा स्थान घूमने को रह गया? "भव वन में जी भर घूम चूका, कण-कण को जी भर-भर देखा"! सच में! धार्मिक यात्रा करना ही उत्तम हैं!

अनुभव: हाँ! हम हमारी छुट्टियों में श्री सम्मेद शिखर जी हैं जायेंगे! वहाँ अनंतानंत सिद्ध भगवंतो को नमन कर हम भी भगवान बनेंगे!

आकाश: चलो शिखरजी! चलो शिखरजी!

अनुभव: चलो शिखरजी! चलो शिखरजी!