Question Set 6
Q. 1 आर्तध्यान के चार भेद को संक्षिप्त उदहारण अपने जीवन से दीजिये। तथा बताइये आर्तध्यान से किस प्रकार बचा जा सकता हैं।
A.1 ध्यान चार प्रकार के हैं। उसमे मिथ्यादृष्टि को धर्मध्यान और शुक्लध्यान तो होते नहीं। निरंतर कुछ न कुछ ध्यान तो जीव को होता ही हैं। जिनागम में ‘ध्यान’ का अर्थ ‘meditation’ नहीं हैं - क्योंकि वह तो ‘मन की एकाग्रता’ से सम्बन्ध रखता हैं। ‘ध्यान’ आत्मा के चारित्र गुण की पर्याय हैं।
इस बात का निष्कर्ष बस इतना ही हैं कि अज्ञान दशा में हम निरंतर ‘आर्तध्यान’ और ‘रौद्रध्यान’ करते ही रहते हैं। कुछ स्थूल तो कुछ सूक्ष्म। कुछ तीव्र तो कुछ मंद। पर जब तक आत्मा का अनुभव नहीं हुआ तब तक कुध्यान ही होते हैं।
आर्तध्यान के मुख्य ४ प्रकार जिनवाणी में कहे हैं। प्रत्येक जीवन के कुछ उदहारण (स्थूल से सूक्ष्म की ओर) इस प्रकार हैं -
१. अनिष्ट संयोगज आर्तध्यान
- जब कोई व्यक्ति (कॉलेज का मित्र, या ऑफिस का कलीग) कही बाहर मिल जाता हैं तब तुरंत ही उसे दूर करने की या वहाँ से दूर हटने की इच्छा करना।
- जब कोई नापसंद सब्जी (करेले) की भोजन में मिल जाना। किसी तरह से उसे पहले खत्म करके दूसरी बार न लेना और फिर दूसरी जो सब्जी दाल पसंद हैं उसे स्वाद लेकर अच्छे से खाना।
- किसीके द्वारा कहे हैं अप्रिय शब्द सुनकर दुखी होना (भले ही वे अपने अच्छे के लिए ही क्यों न हो)
- जब MS Dhoni बैटिंग करने आये और पूरी ओवर मेडेन निकाले तब बैठे बैठे ऐसा बोलना कि - “अब Dhoni में पहले वाली बात नहीं रही” और जो गलती से चौका चला जाए तो बोलते हैं कि - “शेर कभी बूढ़ा नहीं होता”
- प्रवचन में बैठे हो, ध्यान में व्याख्यान पर ही हो - पर पैरो में बार बार दर्द होने के कारण उसकी position बदलके हिलना।
- भक्ति का जो राग पसंद हो वह उस राग में न गाया जाय।
- नींद में जो मच्छर भी पास आ जाए तो उसे नींद में ही दूर करने की कोशिश करता हैं।
- स्वप्न दशा में भी कुछ बुरा हो जाए तो उसे दूर करने की अंदर में इतनी वेदना से उठ जाता हैं!
- बुरे विकल्प, राग, कषाय आदि भाव जो न चाहते हो वह उत्पन्न हो। उन भावो को याद करके दुःखी होना।
- उपाय:
- वस्तु स्थिति से देखने पर कोई चीज अनिष्ट नहीं भासित होगी । हमारे सारे प्रयोग उसे दूर करने के जूठे हैं क्योंकि हमारे अनुसार वस्तु का परिणमन नहीं हैं ।
- इसलिए सच्चे स्वरूप का निर्णय करने से और तत्त्वचिंतन से ही इससे बचा जा सकता हैं
- स्वयं को अशुभ विकारी पर्याय से भि न्न देखना
२. इष्ट वियोगज आर्तध्यान
- किसी मूल्यवान वस्तु जैसे सोने की अंगूठी, iphone आदि खो जाना।
- किसी प्रियजन का देहांत हो जाना। या फिर किसी प्रिय मित्र, रिश्तेदार का दूसरे शहर, देश में चले जाना। वीडियो कॉल करो तब भी दूर होने का दुःख व्यक्त करना।
- बच्चे जब बड़े हो जाते हैं तब उनके पुराने खिलोने जो वर्तमान में धूल खा रहे हैं वे किसी छोटे भाई-बेहेन को दे तब अंदर से दुखी होना या उसे किसी तरह से अपने पास रखने की इच्छा करना।
- कोई हमेशा अपनी तारीफ़ करता हो वह किसी दिन न करे और अन्य की करे तो बुरा लगता हैं।
- बचपन के अच्छे दिन याद कर कर के वर्तमान में दुखी होना
- यादशक्ति पहले जैसी न रहने पर दुखी होना कि “युवानी में सब याद कर लेना चाहिए था”
- स्वाध्याय, पूजा, चिंतन आदि शुभ भावों का प्रगट न होने से दुखी होना।
- उपाय:
- इष्ट वस्तु की बस कल्पना ही हैं क्योंकि हमे जो जिस समय अच्छी लगती हैं जो हमारी कषाय को पोषती हैं । वास्तव में सभी क्षणभंगुर हैं अस्थिर हैं - इष्ट हो या अनिष्ट उसका वियोग निश्चित हैं । कर्म के उदय अनुसार संयोग होते हैं - उनसे भिन्न स्वयं को देखना ही इसका उपाय हैं ।
- सिर्फ़ उनसे ही नहीं, पर्याय के शुभ विकारों से भी भिन्न अपने को ज्ञायक देखना ही इसका उपाय हैं । सम्यक दर्शन केवलज्ञान आदि पर्याय से भी भिन्न देखना ही आत्मानुभूति का मार्ग हैं ।
३. रोग जनित
- कोई रोगी जीव के दुःख को देखकर स्वयं दुखी (दयाभाव या सेवाभाव अलग हैं) होना। और जो अपना करीबी हो तो और दुखी होना।
- स्वयं को कुछ बड़ा पीड़ादायक रोग हुआ हो तो निरंतर उससे मुक्ति पाने की इच्छा करता हैं। स्वस्थ होने के अनेक उपाय करता हैं। स्वस्थ होने के बाद क्या क्या कैसे कैसे करूँगा उसके संकल्प विकल्प करता हैं। रोग अवस्था को दूर करने के लिए मिथ्यात्व (कुदेव आदि) का सेवन भी करता हैं।
- भविष्य में हो सकने वाले रोग न हो उसके लिए नियमित रिपोर्ट करवाता हैं। स्वस्थ रहने के लिए न जाने कौनसी कौनसी दवाई, सुप्प्लिमेंट, जिम, योग आदि को हमेशा निरोगी रहकर संसार के भोग भोगने की इच्छा से करता रहता हैं।
- रोग दूर करने के लिए अदरक आदि अभक्ष्य भी खाना पड़े तो भी खाता हैं
- सामान्य सर्दी खाँसी भी हो जाये तो भी बहुत आकुलता होती हैं ।
- शरीर में रोग न हो पर कुछ कमजोरी हो तो भी उसके लिए बहुत चिंतित रहता हैं, उसे पुष्ट करने के सारे साधन अपनाता है ।
- उपाय:
- रोग शरीर में हैं और मैं शरीर से भिन्न हूँ
- रोग के वेदन से दुख नहीं हैं, उस वेदन के ज्ञान में दुखबुद्धि के कारण हैं । वास्तव में स्वयं को ज्ञाता द्रष्टा देखने से ही उपाय हैं
४. निदान जनित
- महत्वाकांक्षा बनाकर उसे पूर्ण करने में लग जाता हैं - जैसे ias बनना हैं, इतना बड़ा घर लेन ा हैं, ऐसी गाड़ी लेनी हैं, ऐसा मोबाइल लेना हैं, ऐसा लैपटॉप टीवी लेना हैं ।
- उतना ही नहीं इन भोगों के इस प्रकार से भोगेंगे उसकी भी इच्छा करता हैं
- “यहाँ घूमने जाना हैं” , “यह देश देखना हैं”, “यहाँ का ये खाना खाना ही हैं”, “ऐसा मौसम हो तो सबसे अच्छा” आदि आदि निदान करके दुखी तो होता हैं पर भविष्य में इसके उदय में तिर्यंच नरक आदि बनके पीड़ा सहता हैं
- मोबाइल सोशल मीडिया इंटरनेट के माध्यम से लोगो के चमक दमक वाला जीवन देखकर अपने को हीन मानता हैं और ऐसे ऐसे भोग भोगने का निरंतर निदान बंध करता हैं
- उपाय:
- भविष्य की व्यर्थ कल्पना नहीं करनी हैं
- पर से सुखबुद्धि हटाना चाहिए और स्व में एकत्व रखना चाहिए
- निदान से वर्तमान में दुखी होते हैं और भविष्य में जो भोग मिलेंगे वो उदय अनुसार मिलेंगे - पर जो मिल भी गए तो उस समय वह भोग प्रिय होंगे जैसे पहले थे ? ऐसा विचार करना चाहिए
Q. 2 “अध्यात्म के नय हमारी दृष्टि पर्याय से हटाकर स्वभाव की ओर ले जाते हैं।” और ४ अनूपचरित असद्भूत व्यवहार नय, उपचरित सद्भूत व्यवहार नय, अशुद्ध निश्चय नय, परमशुद्ध निश्चय नय को समझाओ।
A.2
“अध्यात्म के नय हमारी दृष्टि पर्याय से हटाकर स्वभाव की ओर ले जाते हैं।”
जिनवाणी नय की भाषा में निबद्ध हैं। जिनवाणी का एकमात्र उद्देश्य वीतरागता का पोषण हैं। इसलिए ये स्वयं सिद्ध हैं कि नय का उद्देश्य भी वही होना चाहिए - क्योंकि नय तो वीतरागता की ओर ले जाने का माध्यम हैं। अभी वीतरागता स्वभाव का नाम हैं, और आत्मा का स्वभाव निर्विकल्परूप हैं। इसलिए भले ही नय विकल्परुपी हो पर उनका ढलाव तो निर्विकल्प दशा की ओर ही होना चाहिए; और ऐसा हैं भी। अपितु सभी प्रकार के नय की अपनी-अपनी उपयोगिता हैं, अपनी-अपनी भूमिका अनुसार वे निर्विकल्प नयातीत दशा से दूरी पर हैं। पर सभी नयों का कार्य तो वीतरागता का पोषण ही हैं। व्यवहार नय भेदरूप और शरीरादि को आत्मा भले कहता हो पर वह निश्चय नय अर्थात वस्तु के यथार्थ स्वरुप को ही दिखाता हैं। इसलिए व्यवहार को निश्चय का प्रतिपादक कहा। ऐसे करते-करते अंत में परमशुद्ध निश्चय नय बचता हैं जो एकमात्र ध्रुव भगवान आत्मा को दिखाता हैं, और उस नय का पक्ष भी जब छूटे तब स्वभाव की प्राप्ति होती हैं। नयो का प्रयोजन सामाजिक झगडे सुलझाना, लौकिक प्रगति करना, लोगो से चर्चा करना आदि कार्य नहीं हैं - बस सिर्फ वीतरागता की प्राप्ति का ही प्रयोजन हैं।
अब कुछ नयो का स्वरुप विशेषरूप से देखते हैं -
अनूपचरित असद्भूत व्यवहार नय
यह नय - शरीर, कर्म आदि जो-जो परद्रव्य हैं पर फिर भी उन्हें आत्मा से अभेद देखता हैं, आत्मा के साथ जीवन पर्यन्त साथ रहते हैं और जिनसे कोई औपचारिकता नहीं निभानी पड़ती - उन्हें लक्ष्य बनाकर कथन करता हैं।
देखने जाए तो शरीर और आत्मा तो पूर्णरूप से भिन्न ही हैं। पर फिर भी आत्मा देह से भिन्न हैं वह समझाने के लिए व्यवहार की स्थापना करके फिर निश्चय को समझाया जाता हैं।
उदहारण: मांसभक्षण करना पाप हैं, मुनिराज के अदन्तधोवन, अस्नान, समिति, गुप्ति आदि
यह नय की उपयोगिता कुछ इस प्रकार हैं -
- मनुष्य के अनुरूप आचरण (सदाचार, भक्ष्य, न्याय, निति आदि से रहना) करना यही सिखाता हैं
- पुरुष-स्त्री के रूप में मानना और समाज में रहने योग्य आचरण-मर्यादा इसी नय के कारण सम्भव हैं
- आत्मा शरीर तो नहीं हैं, पर बहुत से भाव शरीर के निमित्त से होते हैं। अन्य जीवों की भी दया के लिए उनके शरीर और शारीरिक पीड़ा आदि का विचार जरूरी हैं। जैसे खाने-पिने के, उठने-बैठने आदि में हिंसा। जो यह न माना जाय तो अहिंसात्मक आचरण सम्भव नहीं हैं।
- मुनिराज के २२ परिषह भी शरीर आश्रित हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, २८ मूलगुण, आहार आदि में शरीर की अपेक्षा विचार आवश्यक हैं। बाह्य मुनिधर्म (द्रव्यलिंग) का पालन इसी नय के आधार से हैं।
- व्रत, उपवास, वैयावृत्ति, अतिथिसंविभाग, संलेखना आदि भी इसी नय के आधार से हैं।
- कर्म भले ही पुद्गल हो, पर वह आत्मा के परिणाम, उनका फल और संयोग आदि का ज्ञान कराता हैं। जो आत्मा को कर्म का कर्ता व्यवहार से न माना जाय तो स्वछंदता आ सकती हैं।
- पुराणों में, करणानुयोग में सभी जगह कर्म सापेक्ष कथन होते हैं, जहाँ जीव कर्म का करता और उनके फल का भोक्ता बताया जाता हैं। कर्म सिद्धांत जैन धर्म का ह ्रदय हैं - जिसे इसी नय से कहा जा सकता हैं।
उपचरित सद्भूत व्यवहार नय
आत्मा (वस्तु) तो अखंड है, अभेद हैं। जैसे स्व और पर में भेद हैं, वैसे स्व (पूरी वस्तु) में भेद नहीं हैं। वस्तु तो पूर्ण ही हैं, उसमे भेद करके कथन करना व्यवहार का काम हैं। यह नय विकारी पर्यायों को लक्ष्य बनाकर आत्मा को उन विकारी पर्याय वाला दिखाता हैं। वास्तव में, आत्मा तो अखंड है, वह न तो पर्याय मात्र हैं और न ही द्रव्य मात्र।
उदहारण: क्रोधी जीव, मानी जीव, रागी जीव
यह नय की उपयोगिता इस प्रकार हैं
- सांख्य आदि दर्शन जो आत्मा को पूर्ण पवित्र ही मानते हैं, बौद्ध आदि दर्शन जो आत्मा को सर्वथा क्षणिक मानकर वर्तमान की दुःखमय दशा का कारण उसी वर्तमान को कहते हैं, लौकिक मान्यता जो अपने दुःख का आरोपण अन्य संयोगो पर देते हैं, अन्यमत आध्यात्मिक मान्यताएँ जो अपने दुःख का आरोपण पूर्व कर्मो (कार्य) को देते हैं, जैनमत के भी जो नय को ठीक से नहीं समझते वह कर्म (पुद्गल परमाणु) को ही आत्मा के सुख दुःख का कर्ता ठहरा देते हैं। वास्तव में, यह नय बताता हैं कि आत्मा अपनी ही भूल के कारण दुखी हैं। अपने मिथ्या श्रद्धान के कारण ही दुःखी हैं। अपने राग-द्वेष आदि विभाव परिणमन के कारण ही दुःखी हैं। और स्वयं को जाने-माने और अनुभव तो स्वभावरूप परिणमन से सुखी हो सकता हैं।
- अपनी भूल जाने बिना उसे दूर कैसे करे? स्वयं पहले तो विभावरूप परिणमन कर रहा हैं, यह आत्मा के स्वभाव से विरुद्ध हैं इसीलिए दुःख का कारण हैं - उसका निर्णय इसी नय से सम्भव हैं।
- जो स्वयं दुखी हैं, संसार दुःखमय हैं - ऐसा न माने तो उसका उपाय कैसे करे? इसलिए अपनी भूल पहचानना सबसे अधिक जरूरी हैं।
अशुद्ध निश्चय नय
आत्मा के स्वभाव में रागद्वेष आदि नहीं हैं। जब वह विभावरूप परिणमन करता हैं उस आत्मा की दशा को आत्मा कहना उसे अशुद्ध निश् चय नय कहते हैं। यह आत्मा को पर्यायदृष्टि से कहता हैं।
उदाहारण: जीव परद्रव्य को अपना मानके राग द्वेष करता हैं। सोलहकारण भावना भाकर जीव तीर्थंकर ****प्रकृति का बंध करता हैं।
यह नय की उपयोगिता इस प्रकार हैं
- आत्मा द्रव्यदृष्टि से तो पवित्र हैं पर अपूर्ण दशा में पर्याय में अपवित्रता जरूर हैं। यह नय उसे स्वीकार कराता हैं और कहता हैं कि यह पामर दशा में तन्मय होना ठीक नहीं हैं। तुम अपने स्वरुप का आश्रय लेकर पुरुषार्थ द्वारा चैतन्य सिंहासन पर विराजमान हो सकते हो।
- यह नय से ही संसार से वैराग्य सम्भव हैं, बारह भावना का चिंतवन इसी नय की अपेक्षा हैं
- आस्त्रव, बंध तत्त्व हेय हैं, संवर निर्जरा मोक्ष उपादेय हैं वह इसी नय से कहना सम्भव हैं।
- आत्मा ही इन भावों का कर्ता हैं, क्योंकि स्वयं इन्हे अनुभव करता हैं। ऐसे ही जो आत्मा इन भावों से दृष्टि हटाकर ज्ञान का वेदन करता हैं ऐस ा अनुभव करे तो उसे आत्मानुभूति हो जाए। इस प्रकार यह नय निषेद्य होकर आत्मा को शुद्ध देखने की ओर ले जाता हैं।
परमशुद्ध निश्चय नय
यह नय नयाधिराज हैं। क्योंकि भेदरूप विकल्प आत्मानुभूति के घातक हैं, राग द्वेष उत्पादक हैं। पर्याय में एकत्व एक प्रकार से पर्याय के प्रति राग और कर्तुत्व, ममत्व आदि भाव हैं।
उदाहरण: ‘मैं भगवान आत्मा हूँ ऐसा नक्की कर, निर्णय कर, अनुभव कर। मैं त्रिकाली ध्रुव प्रभु हूँ। मैं सिद्धसमान हूँ।”
इस नय की उपयोगिता कुछ इस प्रकार हैं -
- सभी नयों का मूल उद्देश्य आत्मानुभूति और स्वाभाविक निर्विकल्प आनंदमयी दशा हैं। पर्यायदृष्टि से आत्मा को शायद विकल्पात्मकरूप से समझा जा सकता हैं पर उससे निर्विकल्प शुद्ध अनुभव नहीं हो सकता। जब तक पर्याय का लक्ष्य रहेगा तब तक राग रहेगा, भले ही वह शुद्ध पर्याय ही क्यों न हो!
- वस्तु व्यवस्था ही ऐसी हैं कि पर्याय के लक्ष्य से कभी शुद्ध पर्याय प्रगट होती नहीं और शुद्ध पर्याय की इच्छा से सिर्फ विकारी पर्याय ही उत्पन्न होती हैं।
- इस उपरान्त, यह सत्य भी जानना जरूरी हैं कि पर्याय कौनसी आएगी वह उसकी सहज योग्यता पर निर्भर करता हैं। इसलिए आत्मानुभव का कारण यह नय कहना भी व्यवहार हैं (क्योंकि नय के विकल्प तो विकारी पर्याय हैं जो अशुद्ध निश्चय नय का कथन हैं) क्योंकि प्रत्येक पर्याय क्रमबद्ध हैं। पूर्व पर्याय का वर्तमान पर्याय में अभाव ही हैं!
- इससे यह सिद्ध हुआ कि भले वस्तु पर्याय का कर्ता हैं पर उसका निर्णायक नहीं हैं। और वस्तु की हमेशा पर्याय तो होती ही हैं, उसमें भी कुछ करने जैसा नहीं हैं। इसलिए पर्याय को देखकर उसमे कर्तत्व या भोगतृत्व करना व्यर्थ ही हैं। इसीलिए यह नय जो ध्रुव हैं शाश्वत हैं ध्येय हैं श्रद्धेय हैं - ऐसे भगवान आत्मा को देखने की प्रेरणा देता हैं।
- यह नय विकल्पात्मक जरूर हैं पर इसकी शरण लेने से निर्विकल्प दशा, पूर्ण दशा प्रगट होती हैं जो सर्व जिनागम का सार हैं। यही कारण से इसे नयाधिराज कहा गया हैं।
- इसके आगे कोई कहे कि - “जैसे पर्याय से हटकर द्रव्य को मुख्या किया वैसे द्रव्य से हटकर शून्यता को लक्ष्य करो” - ऐसा शून्यता को देखने के लिए क्यों नहीं कहा? (निषेध करते करते) उसका उत्तर इस प्रकार से सोचा जा सकता हैं
- नय वस्तु के किसी अंश को कहता हैं। शून्यता तो ‘अवस्तु’ हैं, कोई भी वस्तु सर्वथा नास्तिरूप नहीं हैं।
- निषेध करने का उद्देश्य अपने अस्तित्व की पहचान हैं
- शून्यता अर्थात ज्ञान में कुछ नहीं होना, अर्थात ज्ञान की कोई पर्याय न होना, अर्थात ज्ञान न होना अर्थात आत्मा ही न होना। जो आत्मा ही नहीं हैं तो फिर यह नय का चिंतन कौन कर रहा हैं? पहले अशून्य था अब शून्य हो गया - यह सम्भव नहीं हैं।
- “जो शुद्ध जाने आत्म को वह शुद्धता को प्रा प्त हो”, “निश्चयनयाश्रित मुनिवर प्राप्ति करे निर्वाण की” आदि पद इसी नय के हैं
Q. 3. एक मुनिराज चल रहे हैं और एक मुनिराज ध्यान में हैं। विचार कीजिये उन्हें कौनसे गुणस्थान हो सकते हैं और कौनसे नहीं।
A.3
१. मुनिराज चल रहे हैं
द्रव्यलिंगी (भावलिंग रहित) हो तो -
१, २, ३, ४, ५ कोई भी हो सकता हैं। बाहर में २८ मूलगुण का निरतिचार पालन होता हैं। भावलिंग नहीं होने के कारण इसके ऊपर के गुणस्थान नहीं हो सकते।
भावलिंगी हो तो -
६ठा गुणस्थान होता हैं। अन्तर्मुहूर्त के लिए ६ठा रहता हैं और उसके बाद ७वा हो ही जाता हैं। बाहर में २८ मूलगुण का निरतिचार पालन होता ही हैं।
२. मुनिराज ध्यान में बैठे हैं
द्रव्यलिंगी (भावलिंग रहित) हो तो -
आर्तध्यान और रौद्रध्यान - १, २, ३ गुणस्थान होता हैं
धर्मध्यान - ४, ५ गुणस्थान में गौणरूप से धर्मध्यान होता हैं
भावलिंगी हो तो -
धर्मध्यान -
- छठे गुणस्थान में गौणरूप से धर्मध्यान होता हैं
- ७वे गुणस्थान में यथार्थ शुद्धोपयोगरुपी धर्मध्यान होता हैं
शुक्लध्यान - श्रेणी चढ़ते समय
- ८ से ११ में - पृथक्तत्ववितर्क शुक्लध्यान
- १२वे गुणस्थान में - एकत्ववितर्क शुक्लध्यान