Kaavya Prayas
Tirth Vandana
सुन्दर मनोहर कुदरत के नज़ारे देख; मन को वहां लुभाना नहीं , घूमे फिरे अनंत बार वहां, अनंत बार जन्मे मरे दुखदायी | जिस मंगल क्षेत्र से महापुरुषों ने, जन्म मरण का अभाव किया, भाव पूर्वक उनकी वंदना करके, क्षेत्र परावर्तन अब निवारो भाई ||
Simple Hindi Explanation of Chhadhala Dhal 2: 9-10
कभी मस्तक न झुकना कुदेव-गुरु-धर्म समक् ष, न करना कभी अनुमोदना मन-वच-काय से। संसार सागर में पत्थर की नाव सामान इन्हे तुम जानो, तीव्र दर्शन मोहनिय बंधता इस गृहीत मिथ्यात्व से ।।
Simple-Hindi Explanation of Chhadhala-2:1,2
मिथ्या दर्शन-ज्ञान-चरित्र का वशीकरण हैं दुखदायी, जन्मा-मारा अनंत बार, ये भव-भ्रमण हैं अनादि का । प्रयोजनभुत सप्त तत्त्व की श्रद्धा जीव ने की उलटी, उपयोगलक्षणी चिन्मूर्ति, अरूप अनुपम यह आत्मा ।।
जैसा संग वैसा रंग
क्रोधी से क्षमावान बननेकी, मानी से निर्मानि बननेकी, मायाचारी से सरल स्वभावी बननेकी और लोभी से संतोषी बननेकी,
आशा रखना पानी को बिलोके छाश निकालने जैसा हैं ।
Janma-maran vichaar
मरण जन्म का होता हैं; जन्म की दूसरी क्षण, हो सकता हैं जन्म मरण का; देखो किसी भी पल । देखा जाए तो जन्म हो रहा; जन्म-मरण का अनादि से, जहां जन्म-मरण का मरण हो जावे, ऐसी मोक्ष दशा को पाना है ।।
Sharir-mamatva tyaag
मुरझा रही हैं माला मेरी, छह महीने अब शेष रहे, आर्तध्यान से जला अज्ञानी, देव निगोद का बंध करे ।
प्रतिक्षण मुरझा रही काया तेरी, विषयान्ध इसे ना देख सके, मूर्छित देह की सेवा में ही, मनुष्य भ्रम से भव में भ्रमण सहे ।।
Paryay-drashti and Dravya-drashti
पर्याय पे दृष्टि लगी रही, पायी पर्यायें अनंत । दृष्टि द्रव्य में जब लीन होती, मोक्ष दशा पा जाता ये नर ।।
Pratigya Dradhta
चारित्रमोह का देखो जोर भारी, या कहो मेरे पुरुषार्थ की खामी । प्रतिज्ञा लेने का भाव न आता, जो ली हैं उसको निष्ठा से निभा न पाता ।।
अनाचार और अतिचार से दूषित प्रतिज्ञऐ मेरी, आलोचना बिना कैसे कटे यह जग-फेरी । प्रतिक्रमण-प्रत्याख्यान करू निरंतर, सत श्रद्धा व यथा संयम अब धरु निज भीतर ।।
श्रावक धर्म अब मन-वच-काय धरी, जगाउ पात्रता मोक्षमार्ग उपदेश सुनने की । सम्यक श्रद्धा से व्रतो को धारु, तृण मात्र प्रति अहिंसा को सदा ही पालू ।।
घनघोर वर्षा हो या आ जाये अब आंधी, लोभ प्रलोभन मान प्रतिष्ठा या फिर अंतराय हो भारी । जगे पौरुष प्रभु अब मेरा ऐसा; प्राण लेने आ जाए यम भी यदि, सांस टूट जाये पर मेरी प्रतिज्ञा न टूटे कदापि ।।
Vastu-vyavastha
वास्तु व्यवस्था समझकर अज्ञानी संसार में शांति पाने का और दुखो से छूटने के मिथ्या-उपाय करता हैं,
वस्तु व्यवस्था को समझकर ज्ञानी संसार से छूटने का और मोक्ष दशा पाने का सम्यक-उपाय करता हैं
Gruhit Mithyatva Tyaag prerana
मंद उदय मोहनीय का, रूचि लगी जिन वचन में । मोक्षमार्ग अब भा गया, पर पुरुषार्थ जगा न अंतर में ।। कुदेव-गुरु-धर्म की अनुमोदना से, होता चिर बंध दर्शनमोह का । जिन वचन न सुहायेंगे तब, मोक्षमार्ग से दूर संसार में खो जायेंगे ।।
Mokshmarg Utsaaah
सीढ़ियां उन्हें मुबारक जिन्हे छत तक जाना हैं, हमारी मंज़िल तो आसमान हैं, अपना रास्ता खुद बनाना हैं ।
शुभभाव उन्हें मुबारक जिन्हे स्वर्ग तक जाना हैं, हमारी मंज़िल तो सिद्धालय हैं, मोक्षमार्ग पे बस बढ़ते जाना हैं ।।
Dev-Shastra-Guru Pooja lines
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मिथ्यादृष्टि - तेरे चरणों की पूजा से, इन्द्रिय सुख की ही अभिलाषा, अब तक न समझ ही पाया प्रभु, सच्चे सुख की भी परिभाषा ।
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सम्यक्त्व सन्मुख मिथ्यादृष्टि - तेरे चरणों की पूजा से, अतीन्द्रिय सुख की ही अभिलाषा, आज समझ में आया प्रभु, सच्चे सुख की यह परिभाषा ।
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सम्यग्दृष्टि - तेरे चरणों की पूजा से, पूर्ण सुख की ही अभिलाषा, आज अनुभव में आयी प्रभु, सच्चे सुख की वह परिभाषा ।
Raavan-dahan Murkhta Nishedh (Dusshera)
भस्मित को जला कर क्या हासिल करोगे? निरंतर आत्मा का दहन हो रहा; उसके धुए में कब तक अँधा फिरोगे?
मृत को मार कर क्या हासिल करोगे? निरंतर भाव-मरण हो रहा आतम का; उसके उपाय बिना कब तक मुर्दा बन फिरोगे?
बुराई पर अच्छाई की जीत का नारा तो लगा लिया, अपनी बुराइओं पर अच्छाई को जीत कब मिलेगी?
बुराई में द्वेष, अच्छाई में राग करके, द्रव्यदृष्टि बिन कब तक पर्यायों में रोष करते रहोगे?
Samaysaar Paana
काल अनंत बिताया हैं, 'समय' की महिमा नहीं आयी, काल अनंत बिताएंगे यदि, समय की कीमत नहीं आयी, 'समय' तो अनादिअनंत हैं, पर समय बचा हैं अति अल्प;
समयसर समयसार पा गए हैं, समयसर समयसार पा जाना ।
Bhram
यदि उत्पन्न हो दुःख भ्रम से, भ्रम दूर करना बस एक उपाय, और उपाय सब व्यर्थ बने, भव रोग भ्रम रोग से नाश पाय |
क्यूंकि,
"भ्रमजनित दुःख का उपाय भ्रम दूर करना ही हैं"
Tan se Chetan
रखे एकत्व तन में तो, सब जगह दीखता तनाव है; तन से एकत्व तोड़े जब, सर्वांग में दीखता एक चेतन हैं |