चिदानंदेक रूपाय जिनाय परमात्मने,
परमात्म प्रकाशाय, नित्यं सिद्धात्मने नमः
जिनके ज्ञान में झलकता सदैव लोकालोक,
उन सिद्धो को सदा देता हु ढोंक,
जड़ सूर्य उदय होता गगन में, प् रकाशित करता पूरा लोक,
तो कैसे होंगे वे सिद्ध परमात्मा, सदैव झलकता
प्रातः काल की मंगल बेला, चार मंगल पद मैं ध्याऊँ,
उत्तम दशा पा जाने को मैं, उत्तम चार ह्रदय धारू ।
वीतरागता पाना हैं, तो वीतरागता एक शरण,
द्रव्य भाव शुद्धि से करता, 'देव स्तुति' मैं सर्व प्रथम ।।
परमातम रूप लख, आतम पुरुषार्थवान,
'आतमा और परमातमा', कारण-कार्य जान ।
मिथ्यातम से बहिरातम, अंतर्दृष्टि से अंतरातम,
अभे द में जब लीन स्वयं, कृत-कृत्य दशा परमातम ।।
'सप्त-तत्त्व' यथार्थ सरधे, 'जीव' मोक्षमार्गे पगे,
'अजीव' माहीं रमत अरे! 'आस्रव-बंध' कैसे कटे ?
'संवर-निर्जरा' प्रगट अबै, 'जीव' स्वयं में जब रमै,
शक्ति व्यक्तिरूप परिणमे, 'मोक्ष' सुख ते लहै ।।
देवपूजा गुरुपास्ति: स्वाध्याय: संयमस्तप: !
दानं चेति गृहस्थानां षटकर्माणि दिने दिने: !!
जिनालय में जिन बिराजे, नित्य पूजू अति चाव,
देहालय में जिन बिराजे, निश्चय पूजू तो भव पार।
सतगुरु स्वरुप पिछान, उपासन नित्य करे,
निज ज्ञायक रूप लू जान, निश्चय शुद्धि पाए
स्वाध्याय परम तप जान, तत्त्वनिर्णय कर लो,
'स्व'-रूप जब 'ध्याय' आतमराम, निश्चय शुद्धि पाओ
धार इन्द्रिय-प्राणी संयम, शुद्धाचरण पालू,
मैं इन्द्र हु चेतन प्राण, निश्चय शुद्धि पा लू।
भव मनुज दुर्लभ पाय, द्वादश तप धारू,
इच्छा निरोध पुरुषार्थ, निश्चय शुद्धि पा लू।
सुपात्र दान करी चार, परिग्रह मैं त्यागु,
शुद्धता ही परम हैं दान, निश्चय शुद्धि पा लू ।
द्रव्य दृष्टि से शुद्ध आत्मा, जब करता रागादि 'भाव',
उन भावों से रज बंध जाते, वह 'द्रव्य' कर्म शत्रु महान।
शुभाशुभ कर्म उदय संयोग से, 'नोकर्म' संग रमत भूलत भान,
अनादि काल का भ्रमण-करम, नाशे जब ध्याये शुद्ध भाव।।
रक्षाबंधन पर्व महान हैं, वात्सल्य भाव उर में धरिये,
सात-शतक मुनि व अकम्पन-आचार्य के चरणों में शत-शत नमिये।
विष्णुकुमार मुनि चरण वन्दन, जिनने उपसर्ग निवारण किना,
उपसर्ग-विजयी तपस्वी मुनिसंघ, जो परिषहजय कर सिद्धपद पा लीना।।
फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के शुभ दिवस पर, अवतरित हुए स्वामी जम्बू,
मात जिनमती पिता अर्हदास हुए आनंदीत, देखकर सौम्य छवि अनूप,
अनेक नगर श्रीमंतो की बस एक इच्छा की, 'जम्बूकुमार वर ले मेरी कन्या को',
चार कन्याओं की जम्बूकुमार से हुई सगाई, पर वे ध्याते निश-दिन अपने शुद्धतम को,
वैराग्य रस में रमते हो, आत्मानंद को पिते हो,
कैसे संसार में सार लगे उन्हें, जो निज समयसार को पा गए हो
जम्बुकुमार को विरागी देख चिंतित माता बोली -
"दीक्षा ले लेने बाद में, पर विवाह तो कर लो तुम अभी"
सोचा के रूप-विषयो से में मग्न हो, वैराग्य शमित हो जायेगा,
अत्यंत आग्रह सब का टाल न सके फिर वो, पद्म-कनक-विनय-रूपश्री संग लग्न महोत्सव हो गया;
रात्रि में आया विद्युतचर चोर, बना निमित्त सबकी तत्वचर्चा का,
जम्बूस्वामी से सुनकर बात तत्त्व की,जग उठा वैराग्य सभी रानियों का,
ली महा-कल्याणकारी जिनदीक्षा, बन गए जम्बू से जम्बू-मुनि;
चोर ने भी धारी जिनदीक्षा, रानियां भी आर्यिका माता बनकर मोक्षमार्ग में आगे बढ़ी;
ज्ञान-वैराग्य की किरणे क्या राग अंधकार से होती प ्रभावित?
राग पर्याय से भिन्न हैं वह शुद्ध आत्मा टंकोत्कीर्ण विराजित,
तत्वदृढ़ता व वैराग्य की महिमा बतलाती, यह गाथा हैं वे अंतिम केवली की,
हम भी चले उनके कदमों पर नित - अनुसरण कर गाथा जम्बू से जम्बूस्वामी की