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नाम

नाम होना तो हैं नामाधीन,
नामचीनो के नाम देख, देखा निज को दीन,
नाम आगे नम; नामें कर्म हीन,
नाम-शून्य था, हूँ, हो जाऊ,

जो नमू जिन नाम निश-दिन,
तो रहू निज नाम में ही नित लीन ।।

“नाम” ने देखा आइने में, दिखाया उसने “मान”,
“मान” को मैंने उसमे देखा, दिखाया मेरा “विभाव”,
“विभाव” हटा फिरसे देखा, दिखाया उसने “भगवान”,
“भगवान” को मैंने उसमे देखा, दिखाया मेरा “स्वभाव”,
“स्वभाव” को पा अपने में देखा, मिला ‘शुद्धातम’ एक ही “नाम”