अरुणोदय
स्पर्श चरण जब मिला गुरु का, ध्रुव स्वभाव स्फुरित हुआ
मान रहा था दीन अब तक, भगवान हूँ मैं अनुभव हुआ,
सिर्फ तर्क से नहीं अनुभूति होती, गुरु सानिध्य से होती हैं,
आज आपका मिला समागम, धन्य धन्य हो गया हूँ मैं,
"आतम तुम हो, आनंद करो", कहते हैं सहज़ प्रमोदित हो,
कहते हैं - "सरल मोक्षमार्ग हैं" ये सुनकर मन रोमांचित हो!
"ध्रुव देखो" बस यह कहते हैं, हैं समाधान यह सर्वोत्तम,
दोष कहुँ "निर्दोष" कहे मुझे, दिखलाये भगवान आतम,
जब गुरु के पास मैं बैठूं, लगता संसार का पार मिला,
लगता हैं सम्यक प्रगटने का काल तो हैं आ ही गया,
यह 'अरुणोदय' हैं, उदय नहीं, पर्याय दृष्टि को छोड़ूँगा,
ध्रुव अनुभव मैं निश्चित ही कर, गुरु पगदंडी पे चल लूंगा।
This poem is dedicated to Baal Br. Pt. Sumatprakash ji. It was written after coming back from Shikshan Prashikshan Shibir 2025 at Chaitanyadham where I got an opportunity to stay and learn from Pt Sahab.