तू दीन नहीं; दिनकर है
तू दीन नहीं; दिनकर है।
दीन ही दहने दो इन दीन-करो को,
तू दिन करेगा तो परास्त हुए अस्त भी हो जायेंगे।
कौन सत-सूर्य किरणों की भीख हैं मांगता?
हे “आदित्य”! स्वयंप्रभ होकर तू -
पर से क्यों चाह रहा हैं आभा?
हे दिनेश; ईश्वर भी तुझे भगवान बता रहा;
फिर अन्धकार का राज्य तू क्यों भोगना हैं चाहता?\
क्यों कर रहा हैं बागवानी उस रातरानी की?
जब तेरी पर्याय ही चाहती हैं होना सूर्यमुखी!
पर-प्रकाश तो बहुत किया; स्वमार्तण्डोदयकाल हैं आया;
बीतने हैं आयी कु-विभावरी, अब मुहूर्त आ गया हैं ब्रह्म का,
कैवल्य कला तेरी लोक निहारे, तेरे में तू जब रम-सम जाए;
तम के तब न रहे कोई सायें, जैसा हैं तू वैसा जब तुझे दिखलाए।
तू बस एक हैं, पर्याप्त है, निर्दोष निर्मल निर्विकार हैं;
अब मान भी ले उन “जगतपूज्य दिनकरो” का यह कहना -
तू दीन नहीं; दिनकर है।
तू दीन नहीं; दिनकर है।
शब्दार्थ
१. दीन = गरीब, निर्बल, अशक्त, हारा हुआ
२. दिनकर, मार्तण्ड, स्वयंप्रभ, आदित्य, दिनेश = सूर्य
३. दीन-करो = जो वस्तुएँ व्यक्ति को दीन बना दे
४. रातरानी, सूर्यमुखी (sunflower) = फूल के नाम
५. बागवानी = बाग़ की देखभाल करना, gardening
६. पर्याय = state, वर्तमान की अवस्था, Read more in depth - According to Jainism
७. स्वमार्तण्डोदयकाल = अपने स्वभावरुपी सूर्य का उदय होने का समय
८. कु-विभावरी = बुरी रात्रि
९. मुह ूर्त = समय (१ मुहूर्त = ४८ minutes)
१०. ब्रह्म = आत्मा, soul (यहाँ “ब्रह्ममुहूर्त” के दो अर्थ के रूप में उपयोग किया हैं; १. आत्मा में लीन होने का समय, २. सूर्योदय होने के पहले के समय को भी ब्रह्ममुहूर्त दुनिया में कहा जाता है)
११. कैवल्य कला = केवलज्ञान; अनंत ज्ञान, पूर्ण ज्ञान; Read more in depth
१२. निर्विकार = विकार रहित
१३. जगतपूज्य दिनकरो = १. जगत में पूज्य सारे ज्ञानी जन, २. सारे पूज्य सर्वज्ञ सिद्ध भगवान