प्रयोजन भूत तत्त्व जिन बताये हैं सात,
जीव के नव अधिकारों की जिसमे हैं बात,
अजीव तत्त्व के भेद जाने हम पांच,
पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल।
आस्रव बंध बताये हैं हेय सभी,
संवर निर्जरा प्रगटाने हैं योग्य कहा,
मोक्ष ही हैं तो सत शिव आनंदकार,
व्यवहार निश्चय से सुंदर निरूपण किया।
एक शुद्धात्मा ही हैं एक ही सार,
मोक्षमार्ग प्रकाशन हो मंगलकार,
व्यवहार निश्चय से दो निरूपण यह किये,
मार्ग एक ही होता, यह निश्चय से जान।
सम्यग्दर्शनज्ञानचरित महान,
तीन रत्नों को सम्यक धारण करें।
देखना हो शुद्धातम को जो यदि,
ध्यान ही तो हैं इसका मात्र साधन,
ध्यान से मोक्ष के कारण होते हैं सिद्ध,
सिद्ध होते भी तो हैं इसी ध्यान से।
राग द्वेष मोह तम नाश करें,
तो लीन भये, ध्यान ज्योति जगे,
पंच परमेष्ठी का सत रूप पिछान,
वह जानत ही निज रूप लखे,
ध्यान हो इन परमेष्ठी का ही सतत,
ध्यान ध्येय ध्याता सब एक भये।
स्थिर होना स्वयं में हैं उत्कृष्ट ध्यान,
सब विकल्प तजे, निर्विकल्प हुए,
निज आतम में ही बस रहना हैं लीन,
निज आतम का रस करना हैं पान।
श्रुत व्रत तप जिनने हैं धारण किये,
वे ही तो धारे ध्यान रथ की धुरा,
ध्यान परम हैं ये सुख शांति कर्ता,
ध्यान परम चहुँ गति दुःख को हर्ता,
ध्यान परम परम पद में हैं धरता,
ध्यान परम से होती हैं सिद्ध दशा।