आज सत्पथ की बातें सुहायी
आज सत्पथ की बातें सुहायी, निज ज्ञायक पे दृष्टि है आयी,
‘पूर्ण हूँ मैं’ की धून है सुनाई, पूर्णता पाने की विधि दिखाई।
अनादि से ‘अनंत दुःख’ पाया, न दिखा कोई उसका किनारा,
अनादि से मैं रोता हूँ आया, मिला सुख का न कोई ठिकाना;
आज सत्पथ की बातें सुहायी, मुक्त होने की भावना भाई।
पाप पाँचो इन्द्रियों के वश कर, सेवे सातों व्यसन रचपचकर,
फिर भी तृप्ति नहीं मैंने पायी, भ्रम से भ्रमण किया जग के माँहि,
आज सत्पथ की बातें सुहायी, सम्यक्त्व की महिमा हैं आयी।
अप्रयोजनभूत को त्यागू, प्रयोजन अपना ही मैं साधू,
सप्त तत्त्व में सत हुई प्रतीति, देव-शास्त्र-गुरु सत पिछानी,
आज सत्पथ की बातें सुहायी, मोह राजा की सेना झुकाई।
अंतरंग में न राग रहेगा, कैसे बाहर असंयम टिकेगा?
महा दुर्लभ वह संयम लहुँगा, अणु-गुण-शिक्षा व्रत धरूँगा,
आज सत्पथ की बातें सुहायी, निर्ग्रन्थ की भक्ति हैं गायी।
अणु का भी मैं परिग्रह तजूँगा, महाव्रतो को मैं धारण करूँगा,
स्व में ही स्थित जब हो जाऊ, श्रेणी मुक्ति की मैं मांड जाऊ,
आज सत्पथ की बातें सुहायी, मोक्ष की ओर पैड़ी चढ़ाई।
घाति का भी हैं घात कराया, केवल सूर्य उदय तम नशाया,
वीतराग दशा पूर्ण सुखमय, प्रगटे हैं अनंत चतुष्टय,
आज सत्पथ की बातें सुहायी, अरिहंत छबि निज निहारी।
राग चिकनाई से जो जुड़े थे, वे कर्म सहज क्यों न छूटे?
ध्यान साधन से साधूँगा स्व को, संसार ही त्यागेगा मुझको,
आज सत्पथ की बातें सुहायी, ‘मैं परमात्मा हूँ’ नित हु ँकारी ।