आचार्य उमास्वामी श्री, भारत में फिर आओ
आचार्य उमास्वामी श्री, भारत में फिर आओ, तत्त्वार्थसूत्र ग्रन्थ शुभ, प्रत्यक्ष सुनाओ ।।
सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः ।
समझाए सात तत्त्व, निक्षेप नय प्रमाण ।।
बतलाकर पांच ज्ञान, सम्यग्ज्ञान जगाओ ।
मोक्षमार्ग बखान शुभ, प्रत्यक्ष सुनाओ ।१। आचार्य उमास्वामी… ।।
औपशमिक क्षायिक मिश्र, औदयिक पारिणामिक ।
कहे पंच भाव जीव के, पंचम-भाव में हो स्थिर ।।
भाषे हैं भेद जीव के, भेदज्ञान कराओ।
जीव तत्त्व का स्वरुप शुभ, प्रत्यक्ष सुनाओ ।२। आचार्य उमास्वामी… ।।
त्रिलोक-ज्ञान से आये, त्रिलोकनाथ की महिमा ।
नरकों के दुःख देखकर, वैराग्य हैं आया ।।
नरलोक में ही मोक्ष हो! पुरुषार्थ बढ़ाओ ।
सर्वज्ञता बहुमान शुभ, प्रत्यक्ष सुनाओ ।३। आचार्य उमास्वामी… ।।
भवन-व्यंतर-ज्योतिष वैमानिक हैं देव ।
इन सबकी आयु लेश्या आदि का निर्देश ।।
तरसते हैं सब देव, संयम रत्न धराओ!
निजलोक ही निवास शुभ, प्रत्यक्ष सुनाओ ।४। आचार्य उमास्वामी… ।। \
‘उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत्’ कहा ।
मानो कि मोक्षमार्ग का द्वार हैं खुला ।।
अजीव द्रव्य भिन्न हैं, जीव शुद्ध दिखाओ ।
वस्तु का स्वभाव शुभ, प्रत्यक्ष सुनाओ ।५। आचार्य उमास्वामी… ।। \
आस्रव भाव तो हैं दुःखरूप, हेय ही मानो ।
जिन भावों से हैं कर्म आते, मूल से नाशो ।।
दर्शनविशुद्धि आदि भावना सोलह भाओ ।
“पुण्य-पाप एक” चर्चा शुभ, प्रत्यक्ष सुनाओ ।६। आचार्य उमास्वामी… ।। \
अहिंसादि अणु-महा व्रतों का हो सत ग्रहण ।
मैत्री आदि भावना का हो सहज मनन ।।
हो निरतिचार व्रत पालन, समाधि कराओ ।
व्रत द्वादश श्रावक के शुभ, प्रत्यक्ष सुनाओ ।७। आचार्य उमास्वामी… ।।
मिथ्यात्व अव्रत प्रमाद कषाय योग ।
बंध के कारण यही, हो कर्म का संयोग ।।
प्रकृति प्रदेश स्थिति अनुभाग छुड़ाओ ।
कर्मचक्र का यह तोड़ शुभ, प्रत्यक्ष सुनाओ ।८। आचार्य उमास्वामी… ।।
गुप्ति समिति आदि संवरभाव उपादेय ।
अंतरंग बाह्य तप से कर्म निर्जरे ।।
ध्यान हैं परम तप, श्रेणी चढ़ाओ ।
निर्ग्रंथो का यह मार्ग शुभ, प्रत्यक्ष सुनाओ ।९। आचार्य उमास्वामी… ।।
घाति कर्म नाश के, अरिहंत हो गए ।
अघाति तो स्वयं नशे, वे सिद्ध हैं हुए ।।
मैं भी बनू सिद्धों के सम, ‘शुद्धात्म’ दिखाओ ।
मोक्षशास्त्र ग्रन्थ शुभ, प्रत्यक्ष सुनाओ ।१०। आचार्य उमास्वामी… ।।
आचार्य उमास्वामी श्री, भारत में फिर आओ,
तत्त्वार्थसूत्र ग्रन्थ शुभ, प्रत्यक्ष सुनाओ।
भक्ति आधार
आ. ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन’ द्वारा रचित “आचार्य कुन्दकुन्द श्री भारत में फिर आओ” भक्ति सुनके ह्रदय आनंद और आचार्यदेव के बहुमान से भर जाता हैं। उसी भक्ति के बोल और लय का आधार लेकर यह काव्य लिखने का प्रयास हुआ हैं।