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बक (बगुला) संत

देखो देखो! यह संत महात्मा, कैसा घोरतम तप धरे!
देखो देखो! संतुष्ट निराकुल, कैसे एक पैर पे हैं खड़े!
श्वेत सुंदर रूप निर्मोह, सन्देश दे जग शान्ति का,
कोटि-कोटि नमन तुम्हे, जयकारा जल के तापसी का!

बरसो नहीं अरसो बीते, न डगमगाई साधना,
‘बक संत’ लीन ऐसे हुए, निर्वाण ही को पा लिया!
फिर थरथराया पानी कुछ, आँखे खुली, गर्दन उठी,
फिर जोर से तरापा ऐसे, मछली जीवित कैसे बचे?

उठो सयानो! भ्रम तजो! न पूजो क्रियाकांड को,
बाहरी हाव-भाव वेशधारी, इन जूठे ठगो से बचो!\ पत्थर की नाव न तिरे कभी, कैसे तिरावे आपको?
फल मिलता हैं अभिप्राय का, इस महा सत्य को पहिचानो!