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आप कुछ भी कहो (पद्य)

कथा १

सभाजन - 
“तुम्हारे गुरु तो कोढ़ी होते, अशक्त और सब रोगी होते,
तुम कहते तो उपकारी इन्हे? रोग अपना तो पहले दूर करे!”

श्रेष्ठिराज -
“हे गुरुवर! यह अपमान सह लेता कैसे,
धन्य दिगंबर धर्म ध्वजा को मैं झुकने देता कैसे?
भावनाओ में आ मैंने कह दिया - ‘कर सकते सब जो चाहे वे’,
‘होते नहीं कोढ़ी’ - यह कह दिया, भगवन! आप ही अब कुछ करे!”

आचार्य वादिराज -
“अकर्ता हूँ, अभोक्ता हूँ, शरीर से मेरा अत्यन्ताभाव,
रोग शरीर का, वह ही जाने, मैं उसमे क्या करुँ कुछ काम,
धर्मानुरागवश असत्य न कहना, वस्तु धर्म अनुरूप हो वयना,
स्वतंत्र वस्तु का हैं परिणमन, हे भव्य! आकुलित क्यों हैं तेरा मन?”

दूसरे दीन -

पर्वत को चीरती हुई हो जैसे सूर्य की किरणें,
उदय काल आ गया हो तम नाशनहार;
दैदीप्यमान कंचनवर्णी काय; शांत, तृप्त, दिगंबर रूप दिखाए,
जैन धर्म का हुआ जयकारा, पड़ गया अचंभे में जग सारा!

जनता -
“जय हो! जय हो! आप सर्वेसर्वा, जय हो! जय हो! सब कर्ता-धर्ता!
कैसा चमत्कार दिखलाया, हम सब का भाग्य प्रगटाया!”

आचार्य वादिराज -
“नहीं चमत्कार होता कुछ भी, बस होने योग्य हुआ अहो!
समवायो के सत समागम से, क्रमबद्ध ही सब हुआ अहो!
नहीं हैं तू यह देह तो भी, होता तुझे आश्चर्य फिर क्यों?
अपने चैतन्य रूप को देख, जान, उसमे हो लीन रहो!”

जनता -
भक्ति-मन्त्र नहीं करते कुछ भी, स्वतंत्र वस्तु का परिणमन,
धन्य धन्य हैं आप मुनीश्वर, चरणों में हैं शत-शत बार नमन!

अंध भगत -
अहो! महानता कैसी अद्भुत, अपनी शक्ति ही ढँकते हो,
श्रेष्ठता की यह सच्ची निशानी, हम इसे नमन नित करते जो!
हम तो नहीं हैं आपके सम, भक्त हैं, भक्ति तो करेंगे,
कुछ भी कहो आप, चमत्कार ही हम इसे कहेंगे!

कथा २

वाद-विवाद में हार, क्रोधित चले मानी मंत्रीजन,
मुनि श्रुतसागर से हुआ अपराध, कर ‘मौन’ उपदेश का उल्लंघन,
मांगा पश्चाताप स्वयं ही, आचार्य देव को हो नतमस्तक,
कैसे दे देते दंड इन्हे, जो थे उनके सबसे समर्थ शिष्य!
पर दिगम्बरत्व पर जो आवे आँच, मुनि संघ पर हो उपसर्ग की आँख,
उससे बड़ा तो क्या अपराध, सचमुच ही था यह अक्षम्य अपराध!
गुणों से प्रभावित न हो सकता, न्यायाधीश का निष्पक्ष निर्णय,
अपराधी चाहे तीर्थंकर हो तो भी, कर्म न किसीको क्षमते हैं!
अनुशासन-प्रशासन चलते बुद्धि से, ह्रदय से पक्षपात ही हो,
पर क्षमा स्वभावी को कैसा भय? निरपराधी सदा ही निर्भय हो!

कथा ३

विनय:

गुरु आज्ञा सर्वोपरि हैं, मेरे बिन विद्या प्राप्त ना,
मेरे बिन तुम मानी होंगे, स्व-पर का हो उपकार ना।
गुरु-विनय के नाम पर, आतंक की सीमा न स्पर्शना,
नहीं तो नष्ट होगा विवेक, नष्ट होंगी सब श्रुत प्रभावना।।

विवेक:

विनय-मर्यादा को भंग न करे, ऐसा विवेक सु-धरिये,
मेरे नाम पर कुछ भी कर देना, महापाप हैं सु-जानिये,
गुरु सदाकाल न होवेंगे, समाधान विवेक से पाइये,
जागृत रहो, जागृत रहो! स्व-पर विवेक जगाइए!

कथा ४ और ५

भाग्य और दुर्भाग्य हैं बस एक कल्पना,
वे तो फलते जीव की रूचि अनुसार,
‘भाग्यवान हूँ’, ‘अभागा हूँ’; यह तो ‘इच्छा’ का कहना,
‘इच्छा’ रहित वे बड़भागी जन करते मुक्ति प्रयाण!
क्या बंगला, गाडी, धन, वैभव ही बनाते तुम्हे भाग्यवान?
हा हा! तूने अनंत दुःख भोगे, अनादि से; नहीं हैं कुछ याद?
तृप्ति नहीं मिली तो भी, विवेकहीन कर रहा उनमे वास,
कैसा हैं यह भाग्य तुम्हारा? जो बिगाड़े तेरा भविष्य-वर्तमान!
क्या इन सब का न होना तुम्हे दुःखी हैं करता?
दीन हीन करके तुम्हे अभागा करता?
अरे मूरख! यह दीनता तज, अरे भगवन! तू निज को लख,
देव-शास्त्र-गुरु सत समागम का मिलना लगता तुम्हे सुलभ?
‘महादुर्लभ हैं’ यह सब विचार, बोधिदुर्लभ का करो प्रकाश!
रत्नत्रय ही सच्ची निधि है, रत्नत्रयधारी बड़भागी,
रत्नत्रय बिन जो भी कुछ है, भोगता उन्हें हैं अभागी!
भरतक्षेत्र के अधिपति सम्राट, भरत चक्री थे अभागी,
ऋषभदेव की दिव्यध्वनि तज, बोझा दिग्विजय का भारी,
कौन समझे उनकी मनोदशा को, उदासीन चित्त उर वैरागी,
छह खंड जीते अखंड किया, पर मन उनका था विभाजित,
कौन उच्छिष्ट भोजी अभागा न होता,
कौन चाहे जलना विषयाग्नि में?
भरत ने तो त्यागा उच्छिष्ट भोज को,
और २ ही घड़ी में भगवान हुए।
कब तक रहना संसार माहि, बने रहना **अभागी**?
चलो त्यागे **उच्छिष्ट भोजना**, भोगे आनंद स्व का ही!