Tatvarthsutra Adhikaar 9
अनादि स े विभावरूप परिणमन करता हुआ यह ज्ञायक भगवान आत्मा जब अपनी प्रभुता को स्वीकारे, जाने और उस प्रभुता का रसास्वादन करे तब जो प्राप्त स्वभाव हैं उसी की प्राप्ति होती हैं। बस इस प्रभुता के आंशिक प्रगटपने की दशा को ही संवर-निर्जरा कहते हैं।
स्वभावरूप परिणमन से विभाव की आंशिक अप्रगटता का नाम संवर हैं।
स्वभाव में स्थिर होने से स्वभाव की आंशिक प्रगटपने की वृद्धि और उसीसे विभाव की अप्रगटता होना निर्जरा हैं।
चूँकि चारित्र गुण थोड़ा-थोड़ा होके पूर्ण शुद्ध होता हैं; दूसरे शब्दों में कहे तो विभाव थोड़ा-थोड़ा होके अदृश्य होता हैं - इसीलिए आत्मा संवर और निर्जरा करते-करते पूर्णता अर्थात मोक्ष अर्थात स्वभाव को प्राप्त करता हैं।
मोक्षमार्ग में एक सीधा-सीधा नियम हैं कि - जितना हम अपने स्वभाव के समीप हो उतने ज़्यादा सुखी। तो इसका स्पष्ट अर्थ यह निकलता हैं कि संवर-निर्जरारूप परिणमन करने वाले जीव बहुत सुखी होंगे।
ऊपर वाली बात इसलिए कहना जरूरी था क्योंकि संवर-निर्जरा के बाह्य साधन जैसे समिति, गुप्ति, परीषहजय तप आदि को मिथ्यादृष्टि अपनी कमजोर और स्थूल बुद्धि से “कष्टकारक” समझ लेता हैं। त्यागी-तपस्वी जीवो को देख वह बाहर से प्रशंसा तो करता हैं पर अंदर तो यही सोचता हैं कि - “यह तो अपना काम नहीं, त्याग तो बहुत मुश्किल हैं”, “कितना sacrifice करना पड़ता होगा”, “तप की अग्नि में जलेंगे तो ही तो मोक्ष मिलेगा” “ये कितने दुखी होंगे, life में कोई entertainment ही नहीं। उदासीन जीव हैं” आदि आदि मिथ्या कल्पनाये बना देते हैं।
पर वास्तविकता इससे बहुत विपरीत हैं। ज्ञानी अज्ञानी से अनंतगुणे सुखी होते हैं। In fact, गुणाकार शून्य से करे तो तो शून्य ही हो जायेगा - इसलिए अनन्तगुणे कहना भी गलत होगा। अज्ञानी को लगता हैं कि वह थोड़ा सुखी हैं और दूसरे ज़्यादा सुखी हैं; थोड़ी धर्म बुद्धिवाला भगवन को उससे बहुत ज़्यादा सुखी हैं ऐसा मान लेगा पर वह स्वयं दुःखी हैं संसार में ऐसा अनुभव नहीं करेगा।
“मोक्षशास्त्र” - जो साक्षात मोक्षमार्ग का उद्घाटन करने वाला शास्त्र हैं - उसमे भगवान आचार्य उमास्वामी देव कैसे इन दोनों तत्त्वों को विवेचन करते हैं वह समझते हैं।
संवर तत्त्व
परिभाषा पे चर्चा
- आस्त्रव का निरोध संवर हैं अर्थात शुभाशुभ भावो का न आना और वीतराग-भावमय दशा होना संवर हैं।
- जब जीव संवरमय परिणमन करता हैं तब सहज ही, बिना जीव से कोई भी प्रकार का सम्बन्ध रखे, अपनी ही योग्यता से - नए कर्म के परमाणु का बंधन रुक जाता हैं। इसे द्रव्य संवर कहते हैं।
- ध्यान देने वाली बात - जीव के परिणामों का और कर्म का निमित्त नैमित्तिक सम्बन्ध हैं। कुछ परिणामो के कारण कर्म नहीं आये ऐसा नहीं हैं।
संवर के कारण
- गुप्ति - मिथ्यात्व ादि विकारी भावो से आत्मा की रक्षा
- समिति - मिथ्यात्वादि विकारी भावो से आत्मा की रक्षा के साथ प्रवृत्ति
- धर्म - जिन्हे धारण करने से आत्मा सांसारिक दुखो से मुक्त हो जाता हैं
- अनुप्रेक्षा - संसार, शरीर और भोगो की निस्सारता का चिंतन
- परीषहजय - भूख, प्यास आदि कष्टों को शांतभाव से जीतना
- चारित्र - सम्यग्दर्शन, ज्ञान पूर्वक आत्मध्यान और आत्मलीनता
गुप्ति
- मन वचन और काय के उपयोगो से युक्त न होकर अपने आत्मा में लीन होने का पुरुषार्थ ही गुप्ति हैं
- छठे गुणस्थान में शुद्ध परिणति होती हैं, इसलिए शुभोपयोग तो होता ही हैं। और शुभोपयोग वाली दशा में पूर्ण रूप से मन, वचन और काय के परिणामो से मुक्त नहीं हुआ जा सकता। वह ७वे गुणस्थान में ही सम्भव हैं। तो फिर क्या करे? ५ समिति का पालन मुनिराज सावधानी और निर्दोषरूप से करते हैं।
समिति
- सम्यक ईर्या सम िति - चार हाथ जमीन आगे देखते हुए जीव हिंसा न हो उस भाव से गमन करना
- सम्यक भाषा समिति - हित मीत प्रिय वचन और संदेह रहित वचन
- सम्यक एषणा समिति - एक बार नवधा भक्ति पूर्वक आहार लेना
- सम्यक आदाननिक्षेपण समिति - शास्त्र, कमंडल और धर्म के उपकरणों की देखभाल कर, पीछी से जीवो से रहित कर रखना उठाना
- सम्यक उत्सर्ग समिति - त्रस और स्थावर जीवो को बढ़ा न पहुंचे उस तरह से मल मूत्र का क्षेपण करना
विशेष ध्यान देने वाली बात - निश्चय अर्थात वास्तव में क्योंकि गुप्ति-समिति संवर का कारण हैं इसलिए वह वीतरागभावरूप हैं, अनुभूतिस्वरूप हैं, शुद्धोपयोगरूप हैं। बाह्यक्रिया में मुनिराज आसक्त नहीं होते। वे भाव तो शुभभाव हैं, बंध का कारण हैं।
धर्म
- उत्तम क्षमा आदि दश धर्म चारित्रगुण की निर्मल दशाएं हैं जो सम्यग्दृष्टि को ही प्रगट होती हैं। क्यो ंकि श्रद्धा के सम्यक हुए बिना चारित्र की शुद्धता सम्भव नहीं हैं।
- इसलिए उत्तम शब्द सम्यक दर्शन और ज्ञान का सूचक हैं। जब ‘उत्तम संयम’ ऐसा कहा जाए तब सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्र तीनो इसमें समा गए। अर्थात पूरा मोक्षमार्ग आ गया।
- ‘उत्तम’ उपसर्ग से रहित सिर्फ ‘क्षमा’ आदि मोक्षमार्ग नहीं हैं।
- यहाँ दशधर्म मुनिराज की मुख्यता से कहे गए हैं; जिसमे ३ कषाय चौकड़ी का अभाव होता हैं।
बारह अनुप्रेक्षा
- बारह भावनाये वैराग्यवर्धक और मुक्तिपथ के पाथेय हैं
- अनित्य आदि पहली ६ भावनाएँ ‘वैराग्यपरक’ हैं तो आस्त्रव आदि अंतिम की ६ भावनाये ‘तत्त्वपरक’ हैं
- अनुप्रेक्षा अर्थात बार-बार चिंतन करना। यह आत्मार्थी जीव के भोजन समान हैं।
- अनुप्रेक्षा ज्ञानात्मक हैं, विकल्पात्मक हैं - ध्यानात्मक नहीं।
बाइस परीषहजय
- शांत भाव से बाहर में आये हुए परिषह अर्थात विघ्न, अंतराय, पीड़ा, कष्ट आदि को सहना ही इन परीषहों पर विजय प्राप्त करना हैं।
- लोक में एक राजा दूसरे राजा को हराकर विजय प्राप्त करता हैं तब युद्ध के समय उसे कितना कष्ट, दुःख, चोट लगती हैं। पर मुनिराज तो परीषहों पर विजय सहज रहकर, अपने ज्ञानानंद भगवान आत्मा के ज्ञान-ध्यान में रत रहकर सुख का अनुभव करते करते जीत लेते हैं।
- मिथ्यादृष्टि बाह्य कष्ट देखकर “दुःख” मानता हैं और मुनिराज अंतर की मस्ती में उन बाह्य पदार्थो को बस पुद्गल के परमाणु देख समता धरते हैं।
- एक साथ १ से लेकर १९ परिषह हो सकते हैं
चारित्र
- सामायिक - समस्त सावद्ययोग का अभेदरूप त्याग
- छेदोपस्थापना - सामायिक से डिगने पर प्रायश्चित और पुनः संयम धारण करना
- परिहारविशुद्धि - प्राणी हिंसा की पूर्ण निवृत्ति होने से विशिष्ट विशुद्धि
- सूक्ष्मसम्प्राय - सूक्ष्मकषाय के होने से सूक्ष्म समप्राय नाम का दसवे गुणस्थान में होने वाला चारित्र
- यथाख्यात चारित्र - समस्त मोह कर्म का उपशम/क्षय से प्रगट स्वभाव
निर्जरा तत्त्व
तप निर्जरा का कारण होता हैं। सभी तपो का केंद्रबिंदु तो एक शुद्धोपयोगरूप वीतरागभाव ही हैं। भेदरूप से तप १२ प्रकार के कहे गए हैं। उसमे ६ अंतरंग हैं और ६ बहिरंग। सभी तप में वीतराग भाव की वृद्धि होनी ही चाहिए - तो ही वह तप हैं। मात्र बाह्य आचरण का नाम तप नहीं हैं। मात्र शुभ परिणामो का होना भी तप नहीं हैं।
बहिरंग तप
१. अनशन
- उपवास आत्मस्वरूप के समीप ठहरने का नाम हैं
- चार प्रकार के आहार का त्याग करना
२. अवमौदर्य
- संतोष और स्वाध्याय की सुखपूर्वक सिद्धि के लिए अल्पाहार लेना
- एकाशन या ऊनोदर भी कहा जाता हैं
३. वृत्तिपरिसंख्यान
- भो जन को जाते समय अटपटी प्रतिज्ञाएं लेना
४. रसपरित्याग
- षटरस में से एक, दो या ६हो का त्याग
५. विविक्त शय्यासन
- निर्दोष एकांत स्थान में प्रमाद रहित सोने-बैठने की वृत्ति
६. कायक्लेश
- आत्मसाधना में होने वाले शारीरिक कष्टों की परवाह नहीं करना
अंतरंग तप
७. प्रायश्चित
- ९ भेद
- आलोचना - गुरु से अपने प्रमाद का निवेदन करना
- प्रतिक्रमण - मेरा दोष मिथ्या हो - ऐसा निवेदन
- तदुभय - आलोचना + प्रतिक्रमण
- विवेक - सदोष आहार और उसके उपकरणों का संसर्ग होने पर उनका त्याग
- व्युत्सर्ग - कुछ समय कायोत्सर्ग करना
- तप - अनशन आदि तप करना
- छेद - दिन, पक्ष माह आदि के लिए दीक्षा का छेद
- परिहार - कुछ समय के लिए संघ से निकाल देना
- उपस्थापना - पुरानी दीक्षा को छेद नवीन दीक्षा धारण करना
८. विनय
- ४ भेद
- ज्ञान विनय
- निश्चय - ज्ञान विनय
- उपचार - ज्ञानी का विनय
- दर्शन विनय
- निश्चय - दर्शन विनय
- उपचार - सम्यग्दृष्टि का विनय
- चारित्र विनय
- निश्चय - चारित्र विनय
- उपचार - चारित्रवंतो का विनय
- उपचार विनय - उपर्युक्त ज्ञान-दर्शन-चारित्र विनयों के धारक देव-शास्त्र-गुरु का विनय
- ज्ञान विनय
- सबसे बड़ा पुण्य - १६ कारण भावना में विनयसम्पन्नता से तीर्थंकर प्रकृति का बंध
- सबसे बड़ा पाप - वैनयिक मिथ्यात्व सबसे बड़ा पाप हैं
९. वैयावृत्ति
- आचार्य उपाध्याय साधू आदि देश भेद वैयवृत्त्य तप के हैं जिसमे उनकी वैयावृत्ति करना
१०. स्वाध्याय
- वांचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय और धर्मोपदेश
११. व्युत्सर्ग
- २ भेद
- आत्मा से अत्यंत भिन्न धन-धान्यादि पदार्थो का त्याग करना - बाह्य उपाधि त्याग नामक व्युत्सर्ग
- क् रोध मान माया लोभादि भावो का त्याग करना अभ्यंतर उपाधि त्याग नामक व्युत्सर्ग
- व्युत्सर्ग तप और अन्य त्याग से भिन्नता
- परिग्रहत्याग महाव्रत - गृहस्थ सम्बन्धी उपाधि का त्याग
- उत्तम त्याग धर्म में - आहार आदि विषयक आसक्ति के कम करने की मुख्यता
- व्युत्सर्ग प्रायश्चित में परिग्रह त्याग, धर्म में लगनेवाले दोष के परिमार्जन की मुख्यता
- व्युत्सर्ग तप में - वसतिका आदि बाह्य व मनोविकार तथा शरीर आदि अभ्यन्तर उपाधि में आसक्ति के त्याग की मुख्यता
१२. ध्यान
- स्व में एकाग्र होना - ध्यान तप हैं
- समस्त तपो का सार यह हैं। अन्य सब तप इसी ध्यान तप की सिद्धि के लिए हैं!
- ध्यान के ४ भेद
- आर्तध्यान - दुःख-पीड़ारूप चिंतवन
- अनिष्टसंयोगज
- इष्टवियोगज
- वेदनाजन्य
- निदानज (भविष्य की कल्पना में तल्लीन होना)
- रौद्रध्यान - निर्दयता/क्रूरता में होनेवाले आनंदरूप परिणाम
- हिंसानंदी
- मृषानंदी (असत्य)
- चौर्यानंदी
- परिग्रहानंदी
- धर्मध्यान - धर्म सहित ध्यान को धर्मध्यान कहते हैं
- ४ भेद
- आज्ञाविचय - आगम की आज्ञा के अनुसार श्रद्धापूर्वक गहन विचार करना
- अपायविचय - मुक्तिमार्ग के विरोधी कौन हैं और उसे छूटने के उपाय का गहन चिंतवन
- विपाकविचय - कर्म के फल आदि के सम्बन्ध में विचार करना
- संस्थानविचय - तीन लोक सम्बन्धी विचार
- निश्चय धर्म ध्यान - देशनलब्धिपूर्वक जाने हुए निज भगवान आत्मा का अवलोकन करना, जानना और उसमे उपयोग का एकाग्र करना
- सिर्फ सम्यग्दृष्टि को ही होता हैं
- ४ भेद
- शुक्लध्यान
- ४ भेद
- पृथक्त्ववितर्क
- एकत्ववितर्क
- सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति
- व्युपरत क्रियानिवर्ति
- श्रेणी चढ़ने के पूर्व - धर्मध्यान
- श्र ेणी चढ़ते समय - पहले २ प्रकार के शुक्लध्यान
- १३ और १४वे गुणस्थान में - दूसरे २ प्रकार के शुक्लध्यान
- ४ भेद
- आर्तध्यान - दुःख-पीड़ारूप चिंतवन
सभी तप उत्तरोत्तर अधिक महत्वपूर्ण और उत्कृष्ट हैं। ध्यान तपो में सर्वश्रेष्ठ हैं - जिसे मात्र एक अन्तरमुहर्त धरने से निश्चित ही केवलज्ञान की प्राप्ति होती हैं।
असंख्यातगुणी निर्जरा
- सम्यग्दृष्टि आदि अनेक प्रकार के जीव की अवस्थाओं का उल्लेख हैं जो अनंतगुणी निर्जरा करते हैं
- मूल में - जो जीव अपने ज्ञायक भगवान आत्मा का आश्रय लेता हैं वह नियम से शुद्धभाव/शुभपरिणति रूप होकर कर्मो निर्जरा करता हैं।
निर्ग्रन्थ मुनि
- प्रकार: पुलाक, बकुश, कुशील, निर्ग्रन्थ और स्नातक
- विशेषता: संयम, श्रुत, प्रतिसेवना, तीर्थ, लिंग, लेश्या, उपपाद और स्थान के भेद से पुलाक आदि मुनिराज में भेद हैं