📄️ Tatvarthsutra Adhikaar 9
अनादि से विभावरूप परिणमन करता हुआ यह ज्ञायक भगवान आत्मा जब अपनी प्रभुता को स्वीकारे, जाने और उस प्रभुता का रसास्वादन करे तब जो प्राप्त स्वभाव हैं उसी की प्राप्ति होती हैं। बस इस प्रभुता के आंशिक प्रगटपने की दशा को ही संवर-निर्जरा कहते हैं।
📄️ Tatvarthsutra Adhikaar 10
केवलज्ञान प्राप्ति का उपाय