चलो शिखरजी
पापा: बेटा आकाश और अनुभव! आज तुम दोनों का पेपर कैसा गया?
आकाश: एकदम बढ़िया गया पापा।
अनुभव: मेरा भी अच्छा रहा! आज तो हमारी सारी परीक्षा पूरी हो गयी! आज से दिवाली की छुट्टिया शुरू!
आकाश: हाँ, और अ क्षत भैया तो कह रहे थे कि ९वी की छुट्टिया स्कूल लाइफ की आखरी छुट्टिया होती हैं। उसके बाद तो बस पढ़ाई ही पढ़ाई! इसलिए हम दोस्त दिवाली पे घूमने जाने का सोच रहे हैं!
पापा: वाह! बहुत अच्छे! कहाँ जाने का विचार हैं?
आकाश: हम सब ने सोचा हैं कि हम सम्मेद शिखर जी जायेंगे! वहाँ का मौसम तो पापा, क्या कहना! सब जगह हरियाली ही हरियाली होती हैं!
अनुभव: और ये देखो! (फ़ोन में फोटो दिखाते हुए) शिखरजी कितना ऊँचा पहाड़ हैं! मैंने तो सुना हैं यहाँ सब लोग सुबह ३ बजे चढ़ना शुरू करते हैं! इस पर ट्रैकिंग करने में तो बहुत मजा आएगा! जीवन में ऐसे एडवेंचर तो करने ही चाहिए!
आकाश: और इतने श्रम के बाद जब हम भगवान पार्श्वनाथ की टोंक पर पहुँच जायेंगे तो क्या गजब का एक्सपीरियंस होगा!
अनुभव: और पापा आप हमारे खाने-पिने रहने करने की बिलकुल चिंता मत करना! वहाँ अब पहले जैसा नहीं रहा। ५ स्टार होटल जैसी व्यवस्था हो गयी हैं अब तो! मस्त खाएंगे, पिएंगे और आराम से रहेंगे। और वहां प्रकृति के सौंदर्य का लुफ्त उठाएंगे!
पापा: बच्चों, शिखर जी कोई पर्यटक स्थल नहीं हैं। यह तो हमारा पवित्र धार्मिक शाश्वत तीर्थ हैं!
आकाश: हाँ पापा! वह तो हमे ज्ञात हैं ही। हम रोज महा-अर्घ में इन सब तीर्थो को याद करते ही हैं न! और मैंने तो सुना हैं कि सम्मेद शिखर जी की वन्दना करने से पुण्य भी होता हैं?
अनुभव: हाँ! ऐसे तो हमारा डबल फायदा हो जायेगा न! घूमना-फिरना भी हो जायेगा और दर्शन करके थोड़ा दसवीं की परीक्षा के लिए पुण्य भी मिल जायेगा!
पापा: हमारे तीर्थ क्षेत्र विषय कषाय को पोषने के स्थान नहीं हैं। वहां तो आत्मा की आराधना करने लोग जाते हैं। घूमने फिरने नहीं! तीर्थ तो महापुरुषों की साधना और मोक्ष भूमि हैं! वहां जाके पाप और सांसारिक भोगादि थोड़ी करना चाहिए! इनमे तो सिर्फ दुःख ही हैं। वहां जाके तो जिनने सच्चा सुख प्राप्त किया वैसा बनने के लक्ष्य से जाय जाता हैं।
आकाश: तो वहाँ पर पुण्य नहीं मिलता?
पापा: अरे! पुण्य इकठ्ठा करने की इच्छा से तो पाप बंधता हैं। जो तत्त्वविचार, भेदज्ञान और आत्मा की आराधना करते हैं उन्ही को सहज ही उत्कृष्ट पुण्य बंधते हैं।
अनुभव: अच्छा! ऐसी बात हैं!
पापा: हाँ! बच्चों तुम्हे पता हैं आज सुविधाओं की लालसा के कारण हमारे तीर्थों की क्या दशा हुई हैं? अनेक अभक्ष्य होटल खुल गयी हैं, व्यसन आदि के कार्य होने लगे हैं और हमारे तीर्थो पर आज कल अन्य लोग कब्ज़ा भी करने लगे हैं!
आकाश: कब्ज़ा? कैसे!
पापा: देखो, आज तुम लोग पर्यटन करने गए। वहां फोटो लोगे, मस्ती करोगे, खाना खाओगे और वही सब सोशल मीडिया पर डालोगे। अभी दुनिया भर के लोगो को तो यही लगेगा कि जै नी लोग तो उनके तीर्थो पर जाके ट्रैकिंग ही करते हैं। और यही लोग आज हमारे तीर्थो पर आकर उसकी पवित्रता नष्ट करते हैं।
अनुभव: हाँ! और शायद इसकी वजह से ही फिर उनका इस क्षेत्र पर मौज शोख के लिए आना जाना बढ़ जाता होगा। और फिर यही लोग अपने देवी देवता की पूजा के नाम पर हमारे ही मंदिर को हड़प लेते हैं!
आकाश: सही बात हैं। गिरनार, मांगी-तुंगी, मन्दारगिरि, गोम्मटगिरि आदि अनेक तीर्थ पर लोग अवैद्य तरीके से अपना अस्तित्व जमा रहे हैं। हमारे ही तीर्थ हमसे ही छीने जा रहे हैं! ये सब तो हमारी ही गलती हैं!
पापा: वास्तव में इतने दौड़-धाम भरे जीवन में हमारा उपयोग आत्मा में नहीं लग पाता। इसलिए ऐसे तीर्थ पर जाकर हम निश्चिंत होकर साधना कर सकते हैं। ऐसे धार्मिक तीर्थ व आयतन तो हम जैसे श्रावकों के मोक्षमार्ग में निमित्त बनते हैं!
अनुभव: तो फिर पापा हमें तीर्थक्षेत्र पर जाके क्या करना चाहिए? कैसे रहना चाहिए? वहाँ तो सुविधाएँ भी इतनी नहीं होती।
पापा: "सुविधाओं की दुविधा त्यागो, निज हित का पुरुषार्थ करो" - ऐसे पवित्र तीर्थो में वंदना कर हमें सिद्ध भगवान जैसा बनने का पुरुषार्थ करना चाहिए। सदाचार, शील और शांति से रहना चाहिए। जिनदर्शन, स्वाध्याय आदि में समय लगाना चाहिए। बने उतना समय विषय भोगो में कम लगाना चाहिए।
आकाश: हाँ, तो फिर हमें धार्मिक क्षेत्र पर पर्यटन कभी नहीं करना चाहिए! पहाड़ के ऊपर खाना, पीना, फोटो खींचना, जूते पहनकर चढ़ना, फिल्मी गाने बजाना, ट्रैकिंग करना आदि तो बिलकुल नहीं करना चाहिए। कोई कर रहा हो तो उसे रोकना भी चाहिए।
पापा: बिलकुल! सिर्फ इतना ही नहीं! तीर्थयात्रा के बीच में बने तो कोई अन्य पर्यटन स्थल में घूमने का भी टालना चाहिए। क्योंकि यह विषय भोग तो विशुद्धता के घातक हैं!
अनुभव: अब हमे समझ में आ गया। सम्मेद शिखर जी आदि तीर्थो पर कोई भी प्रकार की सांसारिक क्रिया नहीं करनी चाहिए और धार्मिक मर्यादा रखनी चाहिए।
आकाश: फिर तो हम शिखर जी तो नहीं जा पाएंगे घूमने। हाँ, पर हम लदाख जरूर जा सकते हैं! वहां तो बहुत मजा आएगा।
पापा: (हंसकर) अरे बच्चो! कौन कहता हैं कि तीर्थ क्षेत्र पे जाके आनंद नहीं होता? वहां पर तो घूमने-फिरने की जगहों से अनंतगुना आनंद होता हैं!
अनुभव: आनंद? सच में? कैसे? मुझे तो लगता था कि ऐसी तीर्थ यात्रा तो बूढ़ों के लिए होती हैं। बहुत ही सीरियस वातावरण रहता होगा न!
पापा: अरे! आत्मा तो स्वभाव से ही आनंदमयी हैं! आनंद कैसे नहीं होगा? जो क्षेत्रों से लाखो जीव मोक्ष गए हो ऐसे अद्भुत क्षेत्र पर जाकर किसे शांति न मिले? तनाव भरे जीवन से दूर होने से यहाँ विशेष धर्म में रूचि लगती हैं। साधर्मी वात्सल्य भी बढ़ता हैं। दर्शन, पूजन, स्वाध्याय, भक्ति, दान आदि करके परिणामो में निर्मलता आती है। और जरूर से कुछ न कुछ सिखने समझने को मिलता हैं; और जीवन को एक नयी दिशा भी मिलती हैं।
आकाश: हाँ पापा! एकदम सही बात बताई आपने। पंच परावर्तनरुपी संसार में इस जीव को कौनसा स्थान घूमने को रह गया? "भव वन में जी भर घूम चूका, कण-कण को जी भर-भर देखा"! सच में! धार्मिक यात्रा करना ही उत्तम हैं!
अनुभव: हाँ! हम हमारी छुट्टियों में श्री सम्मेद शिखर जी हैं जायेंगे! वहाँ अनंतानंत सिद्ध भगवंतो को नमन कर हम भी भगवान बनेंगे!
आकाश: चलो शिखरजी! चलो शिखरजी!
अनुभव: चलो शिखरजी! चलो शिखरजी!