Skip to main content

मंगलाचरण

सुरेश: भाई इस साल के “best businessman of the year” का अवॉर्ड भी तुम्हे ही मिला, बहुत बहुत शुभकामनाएं! वैसे तुम्हारी इस सफलता का राज़ क्या हैं?

प्रवेश: धन्यवाद भाई। सच कहूँ तो ये तो णमोकार मंत्र में कुछ अलग ही शक्ति है! कोई भी काम करने से पहले मैं इसका पाठ करता हूँ और आज तक इसने मुझे कभी भी निराश नहीं किया हैं बताओ!

सुरेश: क्या तुम्हें पता भी हैं के णमोकार मन्त्र में कीन्हे नमस्कार किया हैं? उनका स्वरुप क्या हैं? ऐसा मंगलाचरण करने का प्रयोजन क्या हैं?

प्रवेश: नहीं सुरेश भाई, ये तो मेरे दादाजी ने मुझे बताया था इसलिए मैं ज़्यादा दिमाग लगाए बिना णमोकार पढ़ लेता हूँ। इसमें कहाँ कोई नुक्सान हो रहा हैं? फायदा ही तो हैं!

सुरेश: अरे भाई! सबसे बड़ा नुक्सान तो तुम्हारी इस विषय की अज्ञानता ही हैं। फायदा तो तुम्हारा बस एक भ्रम हैं। मंगलाचरण का अर्थ होता हैं के “जो पाप को गाले और सुख उत्पन्न करे”। पर सुख कोई सांसारिक भोग सामग्री वाला सुख नहीं हैं, अपितु इसको करने से जो क्रोध आदि कषाय का मंदपना हुआ, उससे उत्पन्न सुख की बात हैं।

प्रवेश: तो क्या मंगलाचरण करने से मेरा कार्य सफल नहीं होगा?!

सुरेश: मंगलाचरण ही जो सांसारिक “इच्छा” से करोगे तो यह तो वास्तव में मंगलाचरण हैं ही नहीं। क्योंकि इसमें तो बस आप ने जीभ से कुछ शब्द बोले और मन में तो क्रोधादि कषाय ही थे। तोता भी तो राम-राम बोलता हैं, उसमे कैसा आश्चर्य? मंगलाचरण से तो कषाय मंद होता हैं। ५ परमेष्ठी का स्मरण कर अपने आत्मा के स्वभाव का चिंतन होता हैं। कोई किसी का क्या करे! जो बाहर में नोट इकट्ठी हो रही हैं वह तो आप के आत्मा से अत्यंत भिन्न हैं; आपके कुछ शब्द या इच्छा आपकी इस बाहरी सफलता का कारण कैसे बन सकती हैं?

प्रवेश: मैंने तो प्रत्यक्ष अनुभव किया हैं के काम अच्छा ही होता हैं!

सुरेश: भाई ये सब कर्म का खेल हैं। जो मंगलाचरण करने से कार्य सफल होने लगे तो फिर लोग “best manglacharan कर्त्ता” का अवॉर्ड न देते? ये सब बाहर की सफलताएँ तुम्हारे पुण्य कर्मों के आधीन हैं। इन सब में कर्तापन करके तुम्हारे लिए तुम बस एक भ्रमजाल ही गूँथ रहे हो। मंगलाचरण से काम अच्छे नहीं होते, मंगलाचरण ही अच्छा काम हैं!

प्रवेश: तो फिर क्यों सब लोग कोई भी अच्छे कार्य के पहले मंगलाचरण करते होंगे? क्या ये कुप्रथा हैं?

सुरेश: देखो, मंगलाचरण करने, ५ परमेष्ठी को नमस्कार करने से (उनके जैसी दशा प्राप्त करने के हेतु) से कषाय मंद होती हैं, उससे शांति का अनुभव होता हैं। इसलिए शुभ कार्य (जिसमें पापादि की तीव्रता न हो, मुख्यरूप से धार्मिक कार्य जैसे व्याख्यान, ग्रन्थ रचना, धार्मिक नाटक/कार्यक्रम, यात्रा आदि) उनके पहले मंगलाचरण करने के पीछे यही भावना हैं के इससे मोह की मंदता रहे और कार्य निर्विघ्न संपन्न हो। पर कोई भोगादि की कांक्षा नहीं हैं क्योंकि कर्म के उदय अनुसार ही फल मिलता हैं। सांसारिक कार्यो (जैसे विवाह आदि) में भी मंगल लोग करते हैं, तो उसका उद्देश्य बस इष्ट को याद करने और अपने परिणामों में शान्ति लाना ही हैं; कोई कार्य उससे सफल हो जाता हैं ऐसा नहीं हैं।

प्रवेश: अच्छा अब मुझे मंगल का सही अर्थ ज्ञात हुआ! मैं तो बस णमोकारादि के पाठ को ही धर्म मानता था और उससे कार्य सिद्ध होता हैं ऐसा सोचता था। पर यह ५ परमेष्ठी का स्वरुप क्या हैं?

सुरेश: जो आत्मा परम पद में स्थित हैं वह परमेष्ठी हैं। इस जीव का एक मात्र प्रयोजन सुख पाना हैं; और सच्चा सुख (मोक्ष) कैसे प्राप्त हो उसका नाम मोक्षमार्ग हैं जिसको अरिहंत परमेष्ठी ने प्रकाशित किया हैं और सिद्ध परमेष्ठी वह जीव हैं जिसने इस मोक्ष को प्राप्त किया हैं। आचार्य उपाध्याय और साधु परमेष्ठी इस मोक्षमार्ग पे चल रहे हैं।

प्रवेश: तो क्या मैं भी यह सुख को प्राप्त कर सकता हूँ?

सुरेश: हाँ बिलकुल! जैन धर्म इसी का तो नाम हैं। मंगलाचरण करने का प्रयोजन भी यही हैं; इन पांच परमेष्ठी का ध्यान करना, उनके स्वरुप का विचार करना और उनको देखकर अपना स्वरुप जानना। मोक्षमार्ग प्रकाशक ग्रन्थ के कर्ता प. टोडरमल जी उनके मंगल करने का प्रयोजन कहते हैं कि - “एक वीतराग-विशेषविज्ञान होने के अर्थी होकर अरिहंतादिकको नमस्कारादिरूप मंगल किया हैं”

प्रवेश: बहुत बहुत धन्यवाद भाई; अब मैं भी पांच परमेष्ठी का स्वरुप जानकर सच्चा मंगलाचरण करूँगा और इस मोक्षमार्ग में “प्रवेश” करके “सुरेश” होकर वास्तव में सफल हो जाऊंगा।