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Krambaddh Paryay

मध्य रात्रि का समय था। तेज बारिश हो रही थी। झंडू अपने कमरे में सो रहा था। अचानक से घर के दरवाज़े को कोई ज़ोर-ज़ोर से खटका रहा हो ऐसी आवाज आयी। बेचैनी और अधिरेपने से भरे उस दस्तक को सुनकर झंडू एकदम से जाग गया। भयभीत होकर उसने मुख्य किवाड़ की ओर धीरे से अपने कदम बढ़ाये। खिड़की से देखा तो एक भैंसा दिख रहा था। उसके बाजु में एक लम्बा-चौड़ा सा आदमी भी था जो वर्षा के आवरण में धुंधला से दिख रहा था।

“जरूर ही यह दूधवाले रामु भाई होंगे! मैं व्यर्थ ही परेशान हो रहा था।” - ऐसा सोचकर झंडू ने घर के द्वार खोले तो उसने जो दृश्य देखा उससे वह भयकारी आश्चर्य में पड़ गया!

झंडू (कापंते हाथ जोड़ कर) - आ…आप? य… यहाँ?

(झंडू उसे देखकर रोने लगता है। आँख से तो दुःख जल निकल ही रहा था, पर उसके साथ उसके कपाल से भी तनाव का जल बहने लगा।)

झंडू (हाथ जोड़ कर) - हे महाराज! क्या मेरा अंतिम समय आ गया हैं? आन था यह तो पता था पर इतनी जल्दी आ जायेगा? मुझे जीना है! मुझे आपके पास मत ले चलो! मैं हाथ जोड़कर आपसे विनती करता हूँ! (पीछे हटते हुए) आप जो कहोगे मैं वह करने को तैयार हूँ!

(भैंसे पर सवार, श्याम वर्ण, मुकुट, अनेक शस्त्र आदि चिन्हों से लक्षित वह व्यक्ति और कोई नहीं मृत्यु का देवता - “यमराज” (काल्पनिक) ही था)

यमराज - हा हा हा! आज मैं यहाँ तुम्हें लेने नहीं आया हूँ। बल्कि “मुझे तुम्हे कभी लेने न आना पड़े” ऐसी विधि बताने आया हूँ। माँ सरस्वती ने मुझे कहा कि तुम्हे मेरे बारे में अनेक मिथ्या-कल्पना हो गयी है? मेरे से तुम अत्यंत भयभीत हो गए हो? उन्होंने ही मुझे तुम्हारे पास भेजा है।

झंडू - पर महाराज! आप से कौन नहीं डरता? बड़े-बड़े शूरवीर योद्धा भी अंत समय में आपके सामने हार मान ही लेते है! मैं भी उन्हीमें से हूँ। मैं भी मृत्यु से भयभीत रहता हूँ।

यमराज - मैं तो अपने समय में ही जीव को शरीर से अलग करने ही जाता हूँ। मेरे पास तो उसकी सुव्यवस्थित सूचि है। तो तुम क्यों आकुलित हो रहे हो? हे वत्स, थोड़ा विस्तार से बताओ!

झंडू - पास में जो जंगल है न; वह बहुत ही भयानक है। मेरे खेत से वापस आने का रास्ता उस ही के पास से गुज़रता है। कई बार मैंने वहाँ से जंगली प्राणीओं की आवाज सुनी है।

जिनमंदिर में जिनमुखोद्भूत सरस्वती देवी माँ द्वारा कही “क्रमबद्ध पर्याय” की बात सुनकर थोड़ी शान्ति मिली थी। पर कल ही तत्वार्थसूत्र जी के स्वाध्याय में अकाल-मरण की चर्चा सुनकर भय लौट आया है। आप अकाल में आ जाते हो न?

यमराज - हे मृत्युंजय-स्वभावी! मेरे लिए अकाल क्या और काल क्या? जिस द्रव्य का, जिस क्षेत्र में, जिस समय पे, जैसा होना है सो निश्चित ही है - केवलज्ञान में प्रत्यक्ष झलक रहा है। तीनों काल की सर्व पर्याय खचित है!

(लिस्ट दिखाते हुए) और इसीलिए तो मेरा काम बहुत ही निराकुलतामय है। अनादि से अनंत काल तक के सारे जीवों की मृत्यु के समयों की सूचि मेरे पास है। मेरा दैनिक कार्यक्रम एकदम सुनिश्चित रहता है।

झंडू (स्मित सहित विचार करते हुए) - जो आप योग्य काल में ही आते हो - अर्थात मृत्यु अपने समय में ही होता है; तो फिर मैंने जो अकाल मरण की बात सुनी थी उसका सच्चा अर्थ क्या था?

(माँ जिनवाणी वहाँ प्रगट होती है। झंडू और यमराज दोनों उन्हें आनंदित होकर नमन करते है)

माँ जिनवाणी - हे ****पुत्र, अकाल मृत्यु का अर्थ “असमय में मरण होना” ऐसा नहीं है। जो ऐसा होता तो फिर “असमय में जन्म”, “असमय में युवानी” आदि क्रियाये होनी चाहिए, जो नहीं होती। अकाल मृत्यु का सम्बन्ध आयुकर्म के अपकर्षण से है, वास्तविकता से नहीं।

झंडू - ये अपकर्षण क्या होता है?

माँ जिनवाणी - पहले तो यह समझना पड़ेगा कि -

आयुष्य २ प्रकार का होता है

१. भुजयमान - जो वर्तमान में भोगा जा रहा हो

२. बध्यमान - जो इस भव में बंध कर अगले भव में भोगा जायेगा

अपकर्षण का अर्थ - पहिले बांधी हुए कर्म की स्थिति का घट जाना अपकर्षण है।

तत्त्वार्थसूत्र जी में कहा है -

औपपादिकाचरमोत्तमदेहासंख्येयवर्षायुषोऽनपवर्त्यायुषः ॥53॥

औपपादिक देहवाले देव व नारकी, चरमोत्तम देहवाले अर्थात् वर्तमान भव से मोक्ष जानेवाले, भोग भूमियाँ तिर्यंच व मनुष्य अनपवर्ती आयु वाले होते हैं। अर्थात् उनकी अपमृत्यु नहीं होती।

इसका अर्थ ये होता है कि -

बध्यमान आयु में अपकर्षण सभी जीवों का हो सकता है;

पर भुज्यमान आयु का अपकर्षण सिर्फ कुछ जीवों का होता है और कुछ का नहीं (ऊपर बताये अनुसार)।

अकाल मृत्यु बस इसीलिए कहा जाता हैं कि जितनी स्थिति बाँधी थी; अपकर्षण के कारण स्थिति के घट जाने से कर्म अपेक्षा से पूर्व निर्धारित समय से पहले मृत्यु हो गया। वास्तविकपने से मृत्यु जिस समय होना था उस ही समय हुआ; और उसके अनुसार ही आयु कर्म में अपकर्षण आदि हुआ। और तो और विषभक्षण आदि बाह्य कारण भी मृत्यु होनी थी इसलिए उपस्थित हुए।

यमराज - सही बात! मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मुझे जीव को मरणशैया से लेने जाना है या बाघ के मुँह में से! न मुझे इस बात से कोई मतलब है कि कर्म परमाणुओं की क्या स्थिति हुई! मैं तो बस एक सत्य हूँ; संसारी मिथ्यादृष्टि विषयासक्त जीवो के अहंकार को चूर्ण करने वाला एकमात्र सत्य। परिग्रही मुर्खजन को एक साथ सब छूट जाने के अहसास को देनेवाला एकमात्र सत्य। लोग मुझे “कटु” कहते है; पर “कटुता” मेरे में नहीं उनकी चेष्टा में है।

झंडू (हाथ जोड़ कर) - हे स्याद्वादी माँ! मेरा अकाल मृत्यु के विषय में जो भ्रम था सो दूर हो गया है! ****अब समझ में आया कि अकाल में ‘अ’ का अर्थ “काल से अन्य किसी दूसरे कारण की मुख्यता से हुआ हो वैसा मरण” है! जैसे पर्वत से गिर जाना, शेर द्वारा खा जाना आदि अकाल मरण है और कोई बूढ़े व्यक्ति की मृत्यु शांत परिणाम से हो जाये तो वह काल के प्रताप से हुआ ऐसा कहा जाता है।

ऐसी मृत्यु नामक क्रिया होने में कौन-कौन से कारण होते है?

माँ जिनवाणी - हे भव्य! सिर्फ मृत्यु का ही नहीं; कोई भी कार्य होने में ५ कारण की उपस्थिति नियम से होते है - जिसे शास्त्रीय भाषा में “समवाय” कहा जाता है। जो इसे मृत्यु पर घटाए तो -

१. स्वभाव - मरण पुद्गल का नहीं, आकाश का नहीं; जीव का होता है। उसमे भी मुक्त जीव का नहीं सिर्फ संसार जीव का होता है।

२. निमित्त - आयु कर्म, रोग, विषभक्षण आदि

३. पुरुषार्थ - जीव की उस समय की पर्याय ही उसका पुरुषार्थ है। संक्लेश परिणाम सहित हो तो मिथ्या पुरुषार्थ और जो स्वभाव सन्मुख दृष्टि हो तो सम्यक पुरुषार्थ।

४. काल लब्धि - जिस समय में मरण नामक कार्य हुआ वह

५. भवितव्यता - मृत्यु नामक कार्य होने की योग्यता / होनहार

झंडू - इतने सारे कारण को एक साथ कौन लाता है?

माँ जिनवाणी - जब कार्य होता है, ये पांचो समवाय स्वयं ही उपस्थित होते ही है। कोई इन्हे खिंच कर लाता नहीं है। यही तो वस्तु का अद्भुत स्वरुप है!

झंडू - अहो! कैसा अलौकिक हैं यह वस्तु तत्त्व का स्वरुप! फिर भी, मुझे एक प्रश्न है। जो सब पर्याये क्रमनियमित है तो फिर मुझे पुरुषार्थ क्या करना होगा?

माँ जिनवाणी - हे ध्रुव! जैसे तुम द्रव्य और गुण से अचल हो वैसे ही एक समय की पर्याय से भी अचल हो! तुम अपनी पर्यायो के कर्ता तो हो पर फेरफार कर्ता नहीं हो! ऐसे क्रमबद्ध पर्याय का सम्यक निर्णय करना ही वास्तव में पुरुषार्थ है। कुछ करने का विकल्प ही तुम्हे स्वभाव से दूर रख रहा है। इसलिए एकदम निर्भार हो जाओ और अपने को ज्ञाता-दृष्टा मात्र देखो!

झंडू (जिनवाणी माँ को नमन करके यमराज को कहता है) - हे यमराज! आपका बहुत बहुत धन्यवाद! अब मैं आपसे बिलकुल भी भयभीत नहीं हूँ!

यमराज - हे अजर-अमर! मेरे से वही डरते हैं जो अपराध करते है। नहीं तो मुझे (मृत्यु) निरपराधी ज्ञानी जीव अपना मित्र क्यों कहते? उनके तो परम समाधी रत्न के सामने मैं अपना मुकुट उनके चरणों में नतमस्तक पूर्वक अर्पित करता हूँ। आखिर मृत्यु के देवता को एक शाश्वत ज्ञायक के अलावा कौन झुका सकता है!

आप अब मुझसे नहीं डरते, यह सुनकर आनंद हुआ। हमारी कभी भी मुलाकात न हो ऐसी मंगल भावना से मैं अब आगे बढ़ता हूँ!

(यमराज अपने भैंसे पर बैठकर आकाशमार्ग में अदृश्य हो जाता है)

झंडू (बार बार नमन करते हुए)- हे द्वादशांगी माता! आपकी महिमा सचमे अपरमपार है! मुझे मेरे अकर्ता स्वरुप की सम्यक प्रतीति हो गयी हैं! अब मैं आपके द्वारा बताये मुक्ति के मार्ग पर चलने में पूर्ण रूप से निशंकित हो गया हूँ! मैं सर्व प्रकार से निर्भय हो गया हूँ। जिनवाणी माता की जय हो! जिनवाणी माता की जय हो!

(जिनवाणी माँ आशीर्वाद देकर अदृश्य हो जाती है)

उतने में, मिथ्यात्वरुपी विभावरी बीतने पर झंडू ज्ञानरूपी सूर्योदय का अवलोकन करता है।

तत्त्वज्ञानरुपी झरने और मुक्त पक्षिओं ने अपनी ध्वनि द्वारा यह दृश्य का वर्णन कुछ इस प्रकार किया -

“है ज्ञान-सूर्य का उदय जहां, मंगल प्रभात कहलाता है।

मिथ्यात्व महातम हो विनष्ट, सम्यक्त्व कमल विकसाता है।”

  • मंगल प्रभात, ब्र. प. रविंद्र जी आत्मन