धर्म के दश लक्षण
- आ. डॉ. प. हुकमचंदजी भारिल्ल
‘धर्म’ शब्द कान पे पढ़ते ही लोगो के मन में पूजा, आरती, माला, कथा आदि का चित्र बन जाता हैं। कुछ लोग तो कहते हैं की ‘धर्म’ अर्थात कर्त्तव्य; और सभी को अपना कर्तव्य निष्ठा से निभाना चाहिए ऐसा उपदेश देते हैं। पर क्या आपको ज्ञात हैं की वास्तव में धर्म किसका नाम हैं?
वस्तुस्वभावत्वार्द्धम:
“वस्तु का स्वभाव धर्म है।”
- प्रवचनसार (तत्त्वप्रदीपिका)
वस्तु के स्वभाव को धर्म कहते हैं; जैसे अग्नि का धर्म उष्णता हैं, जल का धर्म शीतलता हैं; वैसे ही आत्मा का धर्म उसका स्वभाव अर्थात अनंत गुण - ज्ञान, दर्शन, सुख आदि हैं।
आत्मा के धर्म / स्वभाव के परिप्रेक्ष में कुछ आगम प्रमाण प्रस्तुत हैं -
अहिंसालक्षणो धर्म:।
“धर्म अहिंसा आदि लक्षण वाला है।”
- राजवार्तिक
देशयामि समीचीनं धर्मं कर्मनिवर्हणम् । संसारदु:खत: सत्त्वान् यो धरत्युत्तमे सुखे।
जो प्राणियों को संसार के दु:ख से उठाकर उत्तम सुख (वीतराग सुख) में धारण करे उसे धर्म कहते हैं। वह धर्म कर्मों का विनाशक तथा समीचीन है।
- रत्नकरंड श्रावकाचार
इस प्रकार जिनागम में अनेक जगह पर निश्चय और व्यवहार धर्म की चर्चा की गई हैं। धर्म का लक्षण बताते हुए आचार्य लिखते हैं -
दशलक्ष्मयुत: सोऽयं जिनैर्धर्म: प्रकीर्तित:।
“जिनेंद्र भगवान् ने धर्म को दश लक्षण युक्त कहा है”
- ज्ञानार्णव
जिनेन्द्र देव ने धर्म को दश लक्षण वाला बताया हैं। मुख्यरूप से यह दश लक्षण धर्म का कथन मुनिराज भगवन्तो की प्रधानता से किया जाता हैं; परन्तु श्रावक को भी इनका अपनी शक्ति और आगम अनुसार सेवन करना चाहिए।
जिनशासन में पर्व ३ प्रकार के बताये गए हैं
१. शाश्वत (त्रैकालिक)
२. सामयिक (तात्कालिक) -> १. व्यक्ति विशेष और २. घटना विशेष
‘दश लक्षण पर्व’ ‘शाश्वत पर्व’ हैं; जो अनादि अनंत काल तक रहने वाला हैं।यह साल में तीन बार आता हैं १. भाद्रपद सुद ५ से १४
२. माह सुद ५ से १४