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गुणस्थान-प्रवेशिका

गुणस्थान के विषय में प्रवेश के लिए गुणस्थान-प्रवेशिका पुस्तक का अध्ययन बहुत लाभकारी हैं, पर गुणस्थान का मेरे में प्रवेश नहीं हैं।

क्यों? क्योंकि मैं तो एक ज्ञायक भाव हूँ। भगवान आत्मा हूँ। परिपूर्ण गुणस्थानातीत हूँ। गुणस्थानातीत होऊंगा नहीं, हूँ। वर्तमान में ही मेरा प्रभु निरंतर स्वाभाविक अनुभव दे रहा हैं तो मैं अपनी विभाव पर्यायों को देख अपने अभेद में भेद क्यों करुँ? गुणस्थान मेरे गुणों की शुद्धता के स्थान नहीं नहीं, अपितु मेरे गुणों की पर्यायों की दशा के नाम हैं। मेरे सारे गुण सुरक्षित हैं। मैं और मेरे गुण में कौनसा भेद हैं? इसलिए मैं अनंत गुणों से संपन्न हूँ; पूर्ण ही हूँ।

पर पर्याय में तो अशुद्धता हैं न?

गुणों की पर्याय तो अपनी तत समय की योग्यता से सहज प्रगट हो रही हैं। मेरे ज्ञान में प्रतिबिंबित वह तथाकथित “अशुद्ध” पर्याय मेरे ज्ञान की स्वच्छता का जयघोष कर रही हैं। अर्थात मेरी ही स्वच्छता और शुद्धता का प्रमाण उन अशुद्ध पर्यायों के प्रतिबिम्ब की देन हैं। अशुद्धता तो लोक में कितनी सारी हैं? उनसे मेरा क्या कम हो गया? वैसे ही यह पर्यायगत अशुद्धता से मेरा क्या बिगड़ गया? ये अशुद्ध पर्यायों से मेरा बस ज्ञाता-ज्ञेय सम्बन्ध हैं। हाँ, यह बात में कोई दो राय नहीं हैं कि वर्तमान में मेरी पर्याय तो मलिन हैं ही! विभावरूप ही हैं!

हॉं, तो उसे तो शुद्ध करने का उपाय करो!

शुद्ध करने के उपाय; उसे शुद्ध करने की चेष्टा ही उस विकारी पर्यायों का कारण हैं, ऐसा कहो! प्रत्येक पर्याय तो सहज अपनी योग्यता से प्रगट हो रही हैं। मैं अपनी पर्याय का कर्ता हूँ, या कहो मैं स्वयं का कर्ता तो हूँ पर उन पर्यायों का; या अपने में कोई फेरफारता नहीं हूँ! इसे शुद्ध करना अर्थात इसे बदलने की इच्छा। और इच्छा करना अर्थात व्यवस्थित व्यवस्था को अव्यस्थित मान उसे ठीक करने के लिए बस “दिवास्वप्न”-जैसे विकल्प करते रहना; जिसे शास्त्रीय भाषा में अनध्यवसाय भी कहा जाता हैं। क्योंकि वस्तु का परिणमन तो स्वतंत्र हैं। इसे बदलने की इच्छा करना अर्थात अपने ज्ञान की स्वच्छता पर कलंक डालना! चरित्रवान ऐसे मेरे स्वरुप पर कलंक डालने वाली वृत्ति मिथ्या हो! हाँ, जो मेरी वृत्ति बाहर हैं, राग आदि कषायों में भटक रही हैं; उसका स्वयं में स्थिर होना ही एकमात्र उपाय हैं। होना कहा, करना नहीं! पर यह उपाय में बस अपने को ज्ञाता-द्रष्टा देख उसमे समा जाना ही हैं - और कुछ नहीं! बस इससे ही गुणस्थानातीत हुआ जाता हैं!

बस इतना सा करने से ही गुणस्थान चढ़ जायेंगे?

और जीव कर क्या सकता हैं? स्वयं अकर्ता हैं ऐसा श्रद्धान करे और फिर उस अकर्ताभाव का अनुभव करते-करते पूर्णता प्रगट हो वही मोक्षमार्ग हैं। गुणस्थान कोई इमारत थोड़ी हैं जिसकी सीढ़ी पर चढ़ सके? अपने आत्मा में कौनसी सीढ़ी हैं जो चढ़ पाए? वास्तव में गुणस्थान की चर्चा व्यवहार से हैं। क्योंकि स्व में भेद और पर से अभेद करके कथन करना व्यवहार की शैली हैं।

अच्छा तो फिर कर्म आदि से गुणस्थान को समझने की कहाँ जरूरत हैं?

व्यवहार निश्चय को बताने वाला होने के कारण अकार्यकारी नहीं हैं! गुणस्थान की चर्चा बहुत जरूरी हैं क्योंकि -

  • आत्मा के गुणों का परिणमन समझना या समझाना वाणी से पार हैं। उसके उतार चढ़ाव के विषय में वर्णन के लिए कर्म और गुणस्थान के भेद-प्रभेद समझना बहुत जरूरी हैं
  • गुणस्थान से मोक्षमार्ग का स्वरुप स्पष्ट हो जाता हैं। आत्मा में शुद्धता की वृद्धि किस प्रकार होती हैं वह निश्चित हो जाता हैं। जो यह न हो तो सब अपनी मनमानी के अनुसार मोक्षमार्ग मानने लगे
  • अपितु १४ गुणस्थान स्वानुभूति की चढ़ती दशाये हैं; पर उसका भावभासन वाणी या शब्दों द्वारा नहीं हो सकता। इसलिए फिर कोई भी अपने आप को आत्मानुभवी कहलाने लगे, या मनवाने लगे तो उसका फिर कोई प्रमाण नहीं रहेगा। गुणस्थान से हम सटीक निर्णय कर सकते हैं कि किस पद में कैसा स्वरुप होता हैं।
  • कर्म सिद्धांत से गुणस्थानों का वर्णन एकदम निश्चयात्मक और पूर्णरूप से हो जाता हैं। अनेक प्रकार के जीव के परिणामो को कर्म सिद्धांत की मदद से सरल रीती से समझाए जा सकते हैं।

इसलिए गुणस्थानों का स्वरुप समझना अत्यंत आवश्यक हैं! इसके बिना गुणस्थानातीत दशा की महिमा नहीं आ सकती! अब अलग-अलग प्रकार से गुणस्थान को समझते हैं।

गुण से भेद कथन

पहले तो जीव अभेद ज्ञायक हैं; उसका श्रद्धा और चारित्र आदि गुणों में भेद किये। क्योंकि संसार का मूल कारण वस्तु को विपरीत मानना (श्रद्धागत दोष) और फिर उसमे इष्ट अनिष्ट की कल्पना करके दुःखी होना।(चारित्रगत दोष)

पर्याय से भेद कथन

फिर इन गुणों की पर्यायों के स्वभाव-विभाव परिणमन की अपेक्षा से मुख्यरूप से १४ स्थान/भेद हुए जिसका नाम गुणस्थान हैं। यहाँ उपदेश मोक्षमार्ग का हैं, इसलिए विभाव से स्वभाव तरफ जाने की यात्रा को गुणस्थान चढ़ना कहा।

कर्म से अभेद कथन

अनादि से इस जीवने निमित्त को ही कर्ता माना हैं। इसलिए वह निमित्त की उपस्थिति बताने पर जल्दी बातें समझ आ जाता हैं। जैसे “घड़ा स्वयं अपनी योग्यता से मिटटी से बना हैं” वह जल्दी नहीं पचती, पर “कुम्हारने घड़ा बनाया” ऐसा कहते ही बात समझ आ जाता हैं।

वैसे ही - “आत्मा अपने में लीन होकर मोक्ष दशा प्राप्त कर्ता हैं”, पर लीनता का भावभासन नहीं होता इसलिए जो ऐसा कहे कि - “आत्मा सर्व कर्म बंधन क्षय करके, कर्म मुक्त सिद्ध दशा प्राप्त करता हैं” - यह बात जल्दी समझ आ जाती हैं। इसके पीछे का कारण यह इस जीव की कर्ताबुद्धि ही हैं।

“तत समय की योग्यता सीधी समझ नहीं आने के कारण कर्म के उदय आदि का निमित्त दिखाकर आत्मा की पर्यायों के सहज परिणमन को समझाया जाता हैं।”

यहाँ कर्म पुद्गल का उदय होना और आत्मा का विभावरूप परिणमन दोनों में कोई भी connection नहीं हैं। जैसे “कौए का बैठना और डाल का टूटना” हैं वैसे ही “कर्म का उदय होना और आत्मा का विभावरूप परिणमन होना” हैं। दोनों ही स्वतंत्ररूप से परिणामित हो रहे हैं बस देखने वाले को यह भ्रम हैं कि यह कर्म ने आत्मा को मलिन किया!

पर ध्यान देने वाली बात एक और भी हैं। निमित्त का निमित्तरूप से ज्ञान होना भी जरूरी हैं। कर्म सिद्धांत जैन धर्म का प्राण हैं। जीवन की सारी घटनाओं का उत्तर कर्म सिद्धांत से दिए जा सकते हैं। कर्म परमाणु का होना और आत्मा से बंधना यह वास्तविकता हैं, कोई बनी-बनाई theory नहीं हैं, काल्पनिक नहीं हैं, fiction नहीं हैं। इसलिए कर्म निमित्तरूप से आत्मा को स्वभाव परिणमन नहीं करने देते। इसलिए जीव जब भी संसार में पाया जायेगा कर्म परमाणु की सेना से हमेशा बंदी बनाया ही पाया जायेगा! फिर भी…दोनों स्वतंत्र हैं! अपने-अपने में हैं! कर्म को बताकर आत्मा को दिखाया जाता हैं, इसलिए कर्म आदि का वर्णन भी मोक्षमार्ग में बहुत कार्यकारी हैं।

शरीर से अभेद कथन

अज्ञानी जीव को कर्म भी कहाँ दीखते है! दीखता तो सिर्फ शरीर हैं। अरे दीखता नहीं, उसे ही तो देखता रहता है; दिन-रात उसे की तो देख-रेख करता हैं। दूसरों के भी शरीर की चेष्टाएँ देखकर ही तो राग-द्वेष करता हैं।

तो फिर मोक्षमार्ग में कौन कितना आगे हैं वह पता लगाने के लिए कोई और तो रास्ता होना चाहिए! कोई पैमाना तो हो जिससे कुछ अंदाजा लगाया जा सके कि यह जीव का पद कौनसा हैं। तो उसके लिए शरीर की अपेक्षा से भी भेद करके स्थूल प्रकार से भी गुणस्थान को समझाया जाता हैं। कोई मन, वचन और काया से जीव कौनसे गुणस्थान का निर्णय नहीं हो सकता, पर जो जिस गुणस्थान में जीव हो उसके अनुसार बाहर में कुछ मन, वचन और काय की वृत्तियाँ जरूर देखि जाती हैं। कौन पूज्य हैं, कौन आदर्श हैं, कौनसी दशा त्यागने योग्य हैं, मोक्षमार्गी जीव का आचरण कैसा होता हैं, आदि इससे ही समझ सकते हैं। मन-वचन-काय की वृत्ति और आत्मा के परिणामों में निमित्त-नैमेत्तिक सम्बन्ध हैं। कोई अन्याय, अनीति, अभक्ष्य खाने वाला और व्यसनोमुग्ध व्यक्ति कभी सम्यग्दृष्टि नहीं हो सकता। कोई तीव्र क्रोधी, मानी, लोभी, कामी कभी भी मुनि नहीं हो सकता। मुनिराज की समिति, गुप्ति, महाव्रत आदि में शरीर की क्रिया आदि से वर्णन हैं। इस प्रकार सभी गुणस्थानों में शरीर की अपेक्षा से कई भेद भी देखे जाते हैं।

संयोगो से अभेद कथन

जब शरीर को आत्मा माना हैं, तो उस शरीर से सम्बन्ध रखने वाले स्त्री, पुत्र, माता पिता आदि परिवारजन और गाड़ी, मकान, पैसा, खाना, पीना आदि से भी अपनत्व मान ही लेता हैं। इसलिए संयोगों की अपेक्षा समझाया जाने पर सुगमता से भावभासन हो जाता हैं। जैसे - “मैं ध्रुव हूँ” यह बात जल्दी समझ नहीं आती पर “सारे संयोग अनित्य अशरण हैं, संसार असार हैं” आदि बात क्योंकि उनसे बहुपरिचित अनुभव हैं इसलिए आसानी से गले उतर जाती हैं।

“जो संसार विषे सुख होता, तीर्थंकर क्यों त्यागे” - संसार के विषय भोग ऊपर ऊपर गुणस्थानों में चढ़ते-चढ़ते घटते हुए दिखाई देते हैं। जो परिग्रह बढ़ता दिखे तो समझ लेना चाहिए कि हम मोक्ष से दूरी बढ़ा रहे हैं। इसलिए ४थे में परिग्रह से अपनत्व का त्याग होता हैं, ५वे में परिग्रह का त्याग शुरू होता हैं, छठवें-सातवे में पूर्ण बाह्य परिग्रह का त्याग होता हैं और फिर आगे-आगे कम होते सारा परिग्रह छुटके पूर्ण दशा प्रगट होती हैं। वस्त्र सहित मुनि कभी नहीं हो सकते यह संयोगो की अपेक्षा ही तो कथन हैं! मुनिराज के २२ परिषह, समिति, गुप्ति, आहार चर्या आदि की चर्चा भी इसी में शामिल हैं।

इसप्रकार हमने देखा कि गुणस्थान का वर्णन

  • अभेद,
  • गुणभेद करके,
  • पर्यायभेद करके
  • कर्म से अभेद करके
  • शरीर से अभेद करके
  • संयोगो से अभेद करके

किया जा सकता हैं। अब हम संक्षिप्त में १४ गुणस्थान का स्वरुप देखेंगे -

अभेदश्रद्धाचारित्रकर्मशरीरसंयोग
मिथ्यात्वज्ञायकअशुद्धअशुद्धदशन और चारित्रमोह का उदयशरीर को अपना मानता हैं। 
पंच इन्द्रिय के भोगो में लीन रहता हैं। अभक्ष्य भक्षण भी करता हैं। ५ पाप में तन्मय होता हुआ स्वरुप को भुला हुआ हैं।विषय कषाय में रत संसार के सभी भोगो को भोगना चाहता हैं। गाडी, मकान, परिवार, मित्र, पैसा आदि में अपनत्व करके इष्ट अनिष्ट कल्पना से निरंतर दुःखी रहता हैं।
सासादनज्ञायकअशुद्धमिथ्याचारित्रदशन और चारित्रमोह का उदय
मिश्रज्ञायकसम्यग्मिथ्यात्वमिथ्याचारित्रदशन और चारित्रमोह का उदय
अविरत सम्यक्त्वज्ञायकशुद्ध (सम्यक्त्व)३ चौकड़ी कषाय का उदयदर्शन मोहनीय  का उपशम/क्षय 
चारित्र मोहनीय का उपशम, क्षय और उदयअन्याय अनीति और अभक्ष्य का त्याग, ८ अंग, ६ अनायतन, ३ मूढ़ता आदि २५ दोष रहित
देशसंयतज्ञायकशुद्ध२ चौकड़ी कषाय का उदयदर्शन मोहनीय  का उपशम/क्षय 
चारित्र मोहनीय का उपशम, क्षय और उदय११ प्रतिमाये, १२ व्रत आदि
क्षुल्लक-ऐलक, आर्यिका दीक्षा, समाधि, द्रव्यलिंग मुनिदीक्षा, संघ आदि
प्रमत्तविरतज्ञायकशुद्ध१ चौकड़ी कषाय का उदयदर्शन मोहनीय  का उपशम/क्षय 
चारित्र मोहनीय का उपशम, क्षय और उदयमहाव्रत, समिति, गुप्ति आदि २८ मूलगुण, आहारचर्या, परिषहजय, संयम, तप, त्याग, ध्यान, पठन-पाठन, सेवा, वैयावृत्ति, धर्म उपदेश, संघ, समाधि आदि
अप्रमत्तविरतज्ञायकशुद्ध१ चौकड़ी कषाय का उदय + शुद्धोपयोग दशादर्शन मोहनीय  का उपशम/क्षय 
चारित्र मोहनीय का उपशम, क्षय और उदयपद्मासन-खड्गासन,
वज्रऋषभ नाराच संहनन, उत्तम संस्थान, पुरुष देह, योग्य निरोगी शरीर, ध्यान की एकाग्रता आदि।
अपूर्वकरनज्ञायकशुद्ध१ चौकड़ी कषाय का उदय + शुद्धोपयोग दशादर्शन मोहनीय  का उपशम/क्षय 
चारित्र मोहनीय का उपशम, क्षय और उदय
अनिवृत्तिकरणज्ञायकशुद्ध१ चौकड़ी कषाय का उदय + शुद्धोपयोग दशादर्शन मोहनीय  का उपशम/क्षय 
चारित्र मोहनीय का उपशम, क्षय और उदय
सूक्ष्मसाम्प्रायज्ञायकशुद्धसंज्वलन लोभ का उदय + शुद्धोपयोग दशादर्शन मोहनीय  का उपशम/क्षय 
चारित्र मोहनीय का उपशम, क्षय और उदय
उपशांत मोहज्ञायकशुद्धऔपशमिक यथाख्यात चारित्रमोहनीय का उपशम हैं
क्षीण मोहज्ञायकशुद्धक्षायिक यथाख्यात चारित्रमोहनीय क्षय,
अन्य घाति अघाति कर्मो का उदय
सयोग केवलीज्ञायकशुद्धयथाख्यात चारित्रअघातिपरम औदारिक शरीरसमवसरण, गन्धकुटीर, श्रोता, देव आदि हो सकते हैं
आयोग केवलीज्ञायकशुद्धपरम यथाख्यात चारित्रअघातिपरम औदारिक शरीरसमवसरण, गन्धकुटीर, श्रोता, देव आदि हो सकते हैं
सिद्ध दशाज्ञायकशुद्धशुद्धकर्म रहित दशाअशरीरी दशाकिसी से कोई सम्बन्ध नहीं