राम कहानी shorts
पहला दिन
- २०वे तीर्थंकर मुनिसुव्रतनाथ के काल में उत्पन्न रामचंद्र और लक्ष्मण अयोध्या के इश्वाकुवंशी राजा दशरथ के पुत्र थे
- रघु (दशरथ के दादा) का पुत्र अनरण्य
- अनरण्य के दो पुत्र - अनन्तरथ और दशरथ
- अनरण्य और अनन्तरथ दीक्षा लेते हैं और १ माह के दशरथ को राज्यतिलक कर देते हैं
- राजा दशरथ की ४ रानी और ४ पुत्र
- कौशल्या से राम
- सुमित्रा से लक्ष्मण
- कैकई से भरत
- सुप्रभा से शत्रुघ्न
- जब रावण को ज्ञात हुआ के राजा दशरथ के पुत्र और राजा जनक की पुत्री के निमित्त से उसकी मृत्यु होगी, तो विभीषण (उसका छोटा भाई) द्वारा उन दोनों राजाओं को मारने का निर्णय लिया और गुप्तचरों को भेज दिया
- नारद जी ने ये बात राजा दशरथ को बताई
- राजा दशरथ के मंत्रीओ ने लाख के पु तले बनाये जो हूबहू उनके जैसे दीखते हो और इससे रावण के गुप्तचर ने वह पुतले का सर काटा और ऐसा मान लिया के राजा दशरथ को मार दिया
- राजा दशरथ और राजा जनक भेष बदलकर नगर के बाहर रहने लगे थे
दूसरा दिन
- विभीषण को अपने कृत्य का पश्चाताप होता हैं और न्याय निति का प्राण लेता हैं
- रावण की लंका और पातळ लंका का वंश इतिहास दूसरे तीर्थंकर अजितनाथ भगवान के समय से हैं हुआ। उसका इतिहास इस प्रकार हैं -
- राजा सहस्रनयन और राजा पूर्णमेघ में घमासान युद्ध हुआ
- राजा सहस्त्रनयन युद्ध में जीत गया और राजा पूर्णमेघ के पुत्र “मेघवाहन” को मारने के पीछे पड़ा, पर सहस्रनयन जब तीर्थंकर अजितनाथ के समवसरण में पंहुचा तो उसका वेर दूर हो गया
- मेघवाहन, जो शत्रु से भयभीत था उसकी सहायता में राक्षसों के इंद्र ‘भीम’ ने उसे रत्नमयी राक्षसद्वीप दिया और साथ में पातळ लंका भी दी। और कहा की जब भी शत्रु क ा भय हो तब पातळ लंका में जाकर रहना क्योंकि वह शत्रु का प्रवेश दुर्लभ हैं
- इसी वंश में आगे अनेक राजा हुए जिनका नाम “राक्षस” था जिसकी वजह से इस वंश का नाम राक्षस वंश हो गया
- ये सब “राक्षसवंशी” विद्याधर मनुष्य थे, राक्षस नहीं
- पातळ लंका में सुकेश नामक राजा हुए जिनकी इन्द्राणी नामक पत्नी से ३ पुत्र हुए माली, सुमाली और माल्यवान
- वो लंका पर निर्घात नाम का क्रूर विद्याधर राज करता था - जिसका वृतांत जब सुकेश राजा ने अपने पुत्रो को सुनाया तब उन्होंने लंका पर आक्रमण करके उसे जीत ली। विजयार्ध पर्वत की दिनों श्रेणी भी उन्होंने जीत ली। कुछ समय बाद राजा सुकेश ने दीक्षा ले ली और माली को राज्य दे दिया
- कुछ समय बाद राजा इंद्र (वह विजयार्ध की दक्षिण नगरी का राजा था) का बल पाकर कुछ विद्याधर लोग राजा माली की आज्ञा का उल्लंघन करने लगे
- राजा इंद्र ने उसकी पूरी नगरी स्वर्ग जैसी बनायीं थी, पत् नी का नाम शची रखा था, हाथी का नाम ‘ऐरावत’ आदि
- राजा माली अपनी अवहेलना को देख क्रोधित हो गया और उसने किष्किन्धापुर के वानरवंशी के साथ मिलकर राजा इंद्र पर आक्रमण की तयारी करी
- फिर उनके बीच घमासान युद्ध हुआ
- राजा माली को राजा इंद्र ने मार दिया और युद्ध जीतकर लंका का राज्य राजा विश्रवस को दे दिया
- माली का छोटा भाई सुमाली समय की नजाकत देखकर वानरवंशी और राक्षसवंशी को लेकर पातळ लंका पहुंच गया
- राजा सुमाली को रत्नश्रवा नाम का पुत्र हुआ जो मानस्तम्भिनी विद्या साधने के लिए पुष्पक वन में गया
- उसकी विद्या सिद्ध होते ही राजा व्योमबिन्दु की छोटी पुत्री “केकसी” प्रगट हुई और फिर उसने बल से उस वन में नगर बसाया और केकसी से विवाह किया
- उस केकसी का पुत्र रावण हैं
- एक रात्रि में केकसी ने ३ स्वप्न देखे जिसका फल उसने जब राजा से पूछा तब ज्ञात हुआ के उसे ३ महापराक्रमी पुत्र जन्म ने वाले हैं
- कुछ दिन बाद दशानन गर्भ में आये और उसका जन्मोत्सव मनाया गया
- एक दिन का छोटा सा बालक दशानन राजा इंद्र के हार से खेल रहा था जिसकी रक्षा नागकुमार देव करते हैं; उसमे उसके देश मुख दिखाई दिए जिससे उसका नाम दशानन रखा गया
- इसके पश्चात राजा रत्नश्रवा और रानी केकसी के वह वहाँ क्रमश भानुकरण (कुम्भकर्ण), चंद्र्नखा पुत्री और विभीषण का जन्म हुआ
तीसरा दिन
एक दिन दशानन, विभीषण और कुम्भकर्ण अपनी माता केकसी के पास बैठे थे तब उन्होंने अपने मौसेरे भाई वैश्रवण - जो राजा इंद्र का लोकपाल था उसे देखा। तब उन्हें ज्ञात हुआ के राजा इन्द्र ने उनके दादा के भाई माली को मारकर लंका जो जीत लिया था, और उनके दादा सुमाली दिन रात लंका की चाह में रहते हैं
ये सुनकर तीनो भाई के मन में लंका वापस जीतने का संकल्प हुआ और फिर वह अनेक विद्याएँ साधने जंगल में चले गए। तीनो भाई को अनेक विद्याएँ सिद ्ध हुई, पर उसमे दशानन को उसके अडिग तप के बल से अनेक विद्या सिद्ध हुई और अनावृत्त यक्ष ने उन्हें मदद करने के लिए वचन भी दिया।
ये सुनकर उनके पिता और दादा प्रसन्न हुए, और उन्होंने बताया के एक अवधिज्ञानी मुनि ने कहा था के उनका पौत्र (दशानन) लंका वापस लाएगा।
दशानन सर्व विद्याए सिद्ध करने फिरसे जंगल में साधना चला गया; और वहाँ राजा मय ने उन्हें देखकर अपनी पुत्री मंदोदरी का विवाह इससे करने का निर्णय किया।
फिर दशानन का विवाह मंदोदरी से हो जाता हैं - और उनके इंद्रजीत और मेघनाद नामक दो पुत्र होते हैं।
यहाँ भानुकर्ण भी अनेक राज्य जीतकर दशानन के राज्य में मिलाते गया; और उसने अपने मौसेरे भाई वैश्रवण के राज्य जिन अनेक राज्यों पर था वह भी जीत लिया।
इससे वैश्रवण क्रोधित होकर दूत से सन्देश भेजा के उसने भानुकर्ण की बालचेष्टा को माफ़ कर दिया हैं और उसके दादा के भाई माली के प्रति बुरे शब्दो ं का प्रयोग कर उत्साया।
दशानन क्रोधित होकर उससे युद्ध करने चला गया; और युद्ध भूमि में जब दशानन और वैश्रवण के रथ आमने सामने आये तब वैश्रवण को भाई-प्रेम उमड़ गया और उसने दशानन को गले मिलने बोला।
वैश्रवण का चित्त वैराग्यमय हो गया था पर रावण तो क्रोधित होकर उस पर आक्रमण करता हैं और उसको युद्ध में हरा देता हैं। वैश्रवण को होश आते ही, वैराग्य को प्राप्त हो दिगम्बर दीक्षा लेकर मोक्ष को प्राप्त हो जाता हैं!
चौथा दिन
दशानन ने अनेक राज्य जीते और उनमे से किष्किन्धपुर सूर्यरज को और किष्कुपुर अक्षरज को दिया।
सूर्यरज के बालि और सुग्रीव नामक दो पुत्र हुए।
अक्षरज के नल और नील नामक दो पुत्र हुए।
बालि जब दशानन की आज्ञा भंग करने लगा तब दशानन और सबसे उसे खूब समझाया; उसे तो दशानन से युद्ध करना था पर फिर बोध पाकर इन सबसे विरक्त होके अपने छोटे भाई सुग्रीव को राज्य देकर - मुनिदीक्षा धारण करि।
सुग्रीव ने अपनी बहिन का दशानन से विवाह करवाया।
सुग्रीव का विवाह सुतारा से होता हैं; और उनके अंग और अंगद नामक दो पुत्र होते हैं।
खरदूषण, जो मेघप्रभ विद्याधर का पुत्र था; उसने दशानन की चंद्र्नखा का अपहरण करके पातळ लंका (अभी खरदूषण इस पातळ लंका का राज्य करता था) चला गया।
पहले दशानन खूब क्रोधित हुए पर मंदोदरी के समझाने पर उसका क्रोध शांत हुआ और चन्द्रनखा का विधिवत विवाह करवाया।
एक बार जब दशानन कैलाश पर्वत के ऊपर से जा रहे थे तब उनका विमान रुक गया, और उसका कारण उनको बालि मुनिराज होना ज्ञात हुआ। क्रोधित होकर उन्होंने पूरा कैलाश पर्वत उठाकर उनपर उपसर्ग करने का प्रयास किया तब बालि मुनिराज ने अपना पेअर का अंगूठा दबाया और दशानन जमीन के अंदर दबता गया। और वह जोर जोर से रोने लगे - इससे ही इनका नाम “रावण” पड़ा। उनकी पत्नी द्वारा जब मुनिराज मांगी तब उन्होंने अंगूठा छोड़ा और फिर रावण उनके पैरो में पद के विनयपूर्वक भक्ति करने लगा और प्रायश्चित लेकर पूजा स्तुति करने लगा। इससे प्रसन्न होकर धरणेन्द्र ने भी उनको अमोघविजय शक्ति दी।
पांचवा दिन
दशानन अब दिग्विजय के निर्णय किया; और अपने बहनोई खरदूषण को अपने सेना में आमंत्रित किया।
एक बार दशानन नर्मदा नदी के किनारे पर जिनेन्द्र पूजा कर रहे थे तब उनकी पूजा में विघ्नरूप गन्दा पानी आया जिसका कारण सहस्ररश्मि राजा को जाना। उससे युद्ध करके उसे हराया और उसे सेना में शामिल करने का प्रस्ताव दिया। सहस्ररश्मि इस प्रसंग से वैराग्य पाकर, अपने परममित्र राजा अनरण्य (अयोध्या के राजा, दशरथ के पिता) को सन्देश देकर मुनिदीक्षा लेकर मोक्ष पद प्राप्त करते हैं !
इस बात को सुनकर राजा अनरण्य और उनके पुत्र अनंतरथ भी दीक्षा लेते हैं।
राजा दशानन ने पापी और पशु हिंसा में आसक्त राजा मरुत को उसके आधीन होने का सन्देश भेजा तब दूत ने नारद जी को राजा मरुत के राज्य में बेहोश देखा; तब दशानन ने उस पापी को पकड़ा और बंदी बना दिया; और नारद जी को भी छुड़ाया।
राजा मरुत ने ने अपनी पुत्री कनकप्रभा का विवाह दशानन से कर दिया और फिर उनकी कृतचित्र नामक पुत्री हुई। दशानन ने अपनी पुत्री का विवाह मथुरा के राजा हरिवाहन के पुत्र मधु के साथ किया।
राजा दशानन राजा इंद्र को जीतने के लिए दुर्लंघ्यपूर में आये। राजा इंद्र पाण्डुक शिला के दर्शन के लिए गए थे तो उन्होंने वहां के लोकपाल नलकुंवर को नगर की रक्षा करने के लिए रखा।
उस नगर में ऐसे कोट आदि बने थे के उसमे किसीका भी प्रवेश दुर्लभ था।
नलकुंवर की पत्नी ने अपनी दासी से राजा दशानन को उसका उनके प्रति अनुराग और वासना प्रगट की। पहले तो रावण ने बीच में ही रोक कर इंकार कर दिया पर विभीषण ने राज्य जीतने के कारण नलकुंवर की पत्नी से विवाह करने का सुझाव दिया; और उसके अनुसार दश ानन से विवाह कर लिया।
इससे उसे अंदर प्रवेश मिल गया और नलकुंवर को बंदी बना दिया; और फिर दुर्लंघ्यपूर नगर जीत लिया। फिर उसके आयुधशाला में चक्र-रत्न प्रगट हुआ।
दशानन फिर विजारद्ध पर्वत की ओर गया और वह राजा इंद्र से युद्ध करने के लिए तैयार हो गया। फिर रावण और इन्द्र के बीच घमासान युद्ध हुआ। उसमे राजा इंद्र परास्त हो गया और उसे पकड़कर राजा दशानन से उसे अपने दादा आदि के पास लेकर अपना बदला पूरा किया।
दशानन ने फिर उसे गले लगाया और उसे छोड़ दिया। राजा इंद्र जब रतनपुर वापस लौटा तब भी उसके मन में जो उसके साथ हास्यस्पद हार हुई वही बात चल रही थी। उसने ऐसा सोचा के हार के पश्चात भी मुझे मित्र जैसा स्वीकार किया; उसमे मुझे राह दिखाई; अब तो मैं दिगम्बर मुनि दीक्षा धारण करूँगा।
ऐसे, राजा इंद्र ने दीक्षा धारण करके, घोर तप करके मोक्ष पद को प्राप्त होकर अनंत काल तक सिद्ध शिला में बिराजमान हो गए।
छठवा दिन
समस्त राजाओं को वश कर दशानन सुखपूर्वक राज्य कर रहा था। राजा अनन्तरथ (राजा दशरथ के बड़े भाई) जिन्होंने दीक्षा ली थी उन्हें केवलज्ञान प्रगट हुआ। उन अनंतवीर्य केवली के समवसरण में दशानन उनके भाई विभीषण और भानुकर्ण दर्शन हेतु गए। इस समवसरण में दशानन ने यह नियम लिया के “कोई परनारी भले कितनी ही रूपवती क्यों न हो, यदि वह मुझे नहीं चाहेगी तो मैं उसका बलात सेवन नहीं करूँगा, उसके साथ जबरदस्ती नहीं करूँगा”
राजा वरुण दशानन की आज्ञा का उल्लंघन करने लगा; और फिर उसने राजा दशानन को युद्ध के लिए उत्साया और दशानन ने बिना देवाधिष्ट अस्त्र यह युद्ध जीतने की प्रतिज्ञा की।
इस युद्ध के बीच में उसके बहनोई खरदूषण को राजा वरुण ने बंदी बना दिया। उसे बचाने के लिए दशानन राजा प्रह्लाद को मदद के लिए दूत भिजवाया। राजा प्रह्लाद ने तुरंत ही अपने पुत्र राजा पवनंजय को दशानन की सहायता के लिए भेजा।
इस प्रकरण में राजा पवनंजय और सती अंजना की कथा को शामिल लिया हैं।
पवनंजय की अंजना से सगाई हुई थी। जब उन्हें अंजना को देखने की तीव्र इच्छा हुई तब वह राजा महेंद्र के महल (अंजना के वहां) पहुंचे। यहाँ अंजना अपनी सखियों के पास बैठी थी तब वहां पवनंजय की प्रशंसा हो रही थी।
तब एक सखी ने बात काटी और अन्य राजा विद्युत्प्रभ की प्रशंसा की और बोला के क्योंकि विद्युत्प्रभ पवनंजय से बहुत ज़्यादा पराक्रमी हैं ; वह मुनि बननेवाले हैं ऐसा सुनकर ही राजा महेंद्र ने अंजना का विवाह विद्युत्प्रभ से नहीं अंजना से करने का निर्णय किया हैं। अंजना तो पवनंजय के विचार में ही अनुरक्त थी और वह लज्जावश होकर चुप ही रही। पवनंजय जो यह बाते सुन रहे थे उन्हें ऐसा भ्रम हुआ के अंजना किसी और को चाहती हैं और इसलिए उससे विवाह करना ठीक नहीं। ये संदेह के कारण राजा पवनंजयने अंजना से विवाह न करने का निर्णय किया और यह ब ात सभी जगह फ़ैल गई।
पति से परित्यज्य अंजना अपने महल में एकाकी समय व्यतीत करने लगी। जब पवनंजय दशानन के बुलावे पर जा रहे थे तब उन्होंने चकवे-चकवी का विलाप सुनाई दिया और उनको अपने किये पर पछतावा हुआ; और फिर शीघ्र ही वह अंजना से मिलने जाते हैं।
अंजना से वह छुपकर मिलते हैं और कई दिन साथ में व्यतीत करते हैं। पवनंजय यह बात लज्जावश होनेके कारण अपने माता पिता को नहीं बताते और उनका और अंजना का प्रच्छन्न मिलान हुआ था इस बात के प्रमाण रूप दुसरो को बताने के लिए अंजना को अपने नाम की मुद्रा देते हैं।
कुछ दिन बाद अंजना को गर्भ प्रगट होता हैं। उनके ससुराल वाले अंजना की बात नहीं मानते; और न मायके में अंजना की बात को कोई स्वीकार करने के लिए तैयार होता हैं। परिणामरूप अंजना को अपनी सखी बसंतमाला के साथ जंगल में अकेले रहना पड़ता हैं।
जंगल में उन्हें दिगम्बर मुनिराज के दर्शन होते हैं; जिनके निमित् त से अंजना को ज्ञात होता हैं के वह एक महाप्रतापी चरमशरीरी पुत्र को जन्म देगी। थोड़े ही दिनों बाद उनकी कुंख से एक सुन्दर तेजस्वी बालक का जन्म होता हैं। आकाशमार्ग से अंजना के मामा - राजा प्रतिसूर्य विमान में आते हैं और उसे पहचान कर उनके हनुरूद्वीप में ले जाने के लिए विमान में अंजना और बालक को बिठाते हैं। रास्ते में गोदी में बैठा बालक उछलके एक शिला पर गिरा और वह शिला चकनाचूर हो गई; और बालक प्रसन्न दिख रहा था। यह देखकर राजा प्रतिसूर्य ने इस बालक का नाम श्रीशैल रख दिया। हनुरूहद्वीप में रहने के कारण यह बालक हनुमान नाम से जाना जाने लगा।
यहाँ पवनंजय जब वापस आये तब अंजना को न पाकर आकुल-व्याकुल हो गए; बहुत ढूंढने के बाद उनका मिलाप अंजना से हुआ और फिर वह सुखपूर्वक राज्य करने लगे। हनुमान भी जैसे जैसे बड़े हो रहे थे वह प्रतिभाशाली और पराक्रमी राजा बन रहे थे। दशानन ने भी उनकी बहुत प्रशंसा की। दश ानन ने अपनी बहिन चन्द्रनखा की पुत्री अनंगकुसुमा का विवाह हनुमान से किया। अनेक राजाओ ने उनकी पुत्री का विवाह हनुमान से किया और इस प्रकार उनकी १००० रानिया थी।
अनेक राजाओ ने अपनी पुत्री का विवाह दशानन ने करवाया और इस प्रकार उसकी १८००० रनिया थी। दशानन सुग्रीव, हनुमान और सभी राजाओ की सहायता से तीन खंड को जीत कर, अर्धचक्री पद से सुशोभित सुखपूर्वक राज्य करना लगा।